एनवीडिया का नाम सुना है? अल्फाबेट, गूगल, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट या अमेजन? ये दुनिया की टॉप टेक कंपनियां हैं, जिनकी तूती बोलती है। इनमें से एक भी भारत की नहीं है। टेनसेंट, अलीबाबा, हुवावे, बाइटडांस, शाओमी, सीएटीएल या लेनेवो का नाम सुना है? ये भी लीडिंग ब्रांड हैं लेकिन इनका भी हिंदुस्तानी कनेक्शन नहीं है। अमेरिका, चीन, ताइवान, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों से हम इतने पीछे हैं कि ये देश, हमसे, विज्ञान और तकनीक से जुड़े उपकरण नहीं खरीदते हैं, उल्टे हम इनके खरीदार हैं। खरीदार भी ऐसे कि इनकी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा, भारतीय व्यापार से आता है। 

ऐसा नहीं है कि भारतीयों के वैज्ञानिक चेतना का अभाव है या भारत के शैक्षणिक संस्थान, बेहतर विद्यार्थी तैयार नहीं कर पा रहे हैं। अल्फाबेट एंड गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सुंदर पिचाई ने IIT खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। सत्या नडेला माइक्रोसॉफ्ट के CEO हैं, उनकी पढ़ाई मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से हुई है। 

शांतनु नारायण एडोब के CEO हैं, उस्मानिया यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। अरविंद कृ्ष्णा IBM को लीड कर रहे हैं, IIT कानपुर के स्टूडेंट रहे हैं। नील मोहन, निकेश अरोड़ा, जयश्री उल्लाल, संजय मेहरोत्रा और लीना नायर जैसे कई नाम ऐसे हैं, जो भारतीय मूल के हैं, टॉप कंपनियों के CEO हैं। इशारा साफ है कि भारत के पास दिमाग तो है लेकिन दिमाग इस्तेमाल करने लायक कंपनियां कम हैं, अवसर कम हैं, सबकी प्रतिभा को सही दिशा मिल जाए, इस लायक माहौल कम है। ऐसा हम नहीं, नीति आयोग की रिपोर्ट कह रही है।

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भारत रिसर्च और डेवलेपमेंट के लिए कितना उदार है?

साल 2026 में नीति आयोग ने 'ईज ऑफ डूइंग रिसर्च एंड डेवलेपमेंट इन इंडिया' नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट पूरे देश में वैज्ञानिकों, संस्थान प्रमुखों, उद्योग जगत और नीति विशेषज्ञों से हुई व्यापक बातचीत और तथ्यों पर आधारित है। रिपोर्ट कहती है कि भारत के पास युवा प्रतिभा है, भारत के पास नॉलेज प्रोडक्शन की अच्छी क्षमता है, लेकिन प्रशासनिक जटिलताएं, फंडिंग की कमी और प्रक्रियागत अड़चनें इस क्षमता को पूरी तरह उभारने में बाधा बन रही है।

हम क्यों बेहतर नहीं हैं? फंडिंग के झोल से समझिए 

भारत, जिन क्षेत्रों में संसाधन कम लगते हैं, बौद्धिकता ज्यादा, उन क्षेत्रों में कमाल कर रहा है। भारत रिसर्च में बेहतर है, पेटेंट में बेहतर है, ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान के बाद चौथे पायदान पर है। पहले रैंकिंग खराब थी, अब सुधार नजर आ रहा है। भारत का ग्रॉस एक्सपेंडीचर ऑन रिसर्च एंड डेवलेपमेंट (GRED), ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) का सिर्फ 0.65 फीसदी हिस्सा है। भारत की GDP करीब 4.15 लाख करोड़ डॉलर के आसपास है। सोचिए इसका सिर्फ 0.65 फीसदी हिस्सा, भारत रिसर्च और डेवलेपमेंट पर खर्च कर रहा है। 

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'ईज ऑफ डूइंग रिसर्च एंड डेवलेपमेंट इन इंडिया' के मुताबिक यह विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है। रिपोर्ट बताती है कि अगर सही सुधार किए जाएं तो भारत असीमित संभावनाओं को छू सकता है। भारत सिर्फ ज्ञान का ही प्रोडक्शन सेंटर नहीं बनेगा, बल्कि टेक्नोलॉजी में भी उन्हीं देशों की तरह काम कर सकता है, जिन पर हम निर्भर है। हैरानी की बात यह है कि एक तरफ दुनिया AI और टेक की रेस में जी जान से जुट पड़ी है, भारत रिसर्च और डेवलेपमेंट पर सिर्फ 0.65 प्रतिशत खर्च के साथ स्थिर बना हुआ है। 

दुनिया रिसर्च और डेवलेपमेंट पर कितना खर्च कर रही है?

ग्रॉस एक्सपेंडीचर ऑन रिसर्च एंड डेवलेपमेंट (GRED) पर अमेरिका और चीन जैसे देश जितना खर्च करते हैं, भारत वैसा खर्च करता ही नहीं है। अमेरिका का GRED वहां की GDP का 3.5 फीसदी हिस्सा है। चीन 2.4 फीसदी खर्च करता है और दक्षिण कोरिया 4.5 फीसदी। इन देशों की तुलना में भारत का खर्च, न के बराबर है।

IMF के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका 28.8 ट्रिलियन डॉलर के साथ अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। चीन की अर्थव्यवस्था 18.7 ट्रिलियन डॉलर है। भारत  की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन तक पहुंच जाए, यह सरकार का लक्ष्य है, वह भी अगले 4 से 5 साल में। 

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कहां चूक जाता है भारत?

भारत में रिसर्च और डेवलेपमेंट का करीब 64 फीसदी हिस्सा, सरकारी सोर्स से आता है। प्राइवेट और परोपकारी संस्थाओं का योगदान सीमित है, करीब 36 प्रतिशत में बाकी सेक्टर का दान शामिल होता है। प्रीमियर संस्थान, जैसे IIT और अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) जैसी फंडिंग को 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा मिल जाता है, जबकि राज्य और छोटो संस्थान फंडिंग के लिए तरसते हैं। जबकि वैज्ञानिक अनुसंधान को अगर शुरुआत में ही दिशा मिले तो हालात ज्यादा बेहतर हों।   

अच्छा क्या है?

फंडिंग की कमी के बावजूद भारत के बारे में ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (GII) 2025 की रिपोर्ट कहती है कि भारत कम इनपुट में ज्यादा अच्छा आउटपुट दे रहा है। रिपोर्ट में एक चेतावनी भी दी गई है कि अगर निवेश और सुधार नहीं हुए तो यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं रहेगी।

भारत कहां चूक जाता है?

भारत में फंड आवेदन प्रक्रिया जटिल है। पोर्टल हैं लेकिन फंड अप्रूवल में महीनों से लेकर साल तक लग जाते हैं। फंड रिलीज में देरी आम है। वित्तीय वर्ष के अंत में फंड वापस खींच लिए जाते हैं, जिससे रिसर्च रुक जाती है। अगर अमेरिका और चीन जैसे देश हमारे प्रतिद्वंद्वी हैं तो हमें उनकी तरह रिसर्च और डेवलेपमेंट पर पैसे भी उन्हीं की तरह खर्च करने होंगे।

जिन क्षेत्रों में नजर आ रहा है सुधार 

भारत ने 2 दशक में साइंस और टेक्नोलॉजी में संघर्ष कर रहा है। रिसर्च पब्लिकेशन की संख्या बढ़ी है, पेटेंट फाइल ज्यादा हुआ है, स्टार्टअप के लिए इकोसिस्टम बना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडियन साइंस कांग्रेस में बार-बार 'ईज ऑफ डूइंग साइंस' पर जोर दिया है। साल 2023 में इसे ज्यादा बेहतर करने के लिए ANRF की स्थापनाकी। साल 2025 में रिसर्च डेवलेपमेंट एंड इनोवेशन फंड (RDIF) शुरू किया। वैज्ञानिक वैज्ञानिक विभागों के लिए जनरल फाइनेंशियल रूल्स (GFR) में छूट दी गई।

अब 'वन नेशनल वन सब्सक्रिप्शन' की मदद से साइंस और दुनियाभर की आधुनिक पत्रिकाओं तक पहुंच आसान हुई है। नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि सिर्फ ये इंतजाम काफी नहीं हैं। जमीनी स्तर पर वैज्ञानिकों की राह इतनी मुश्किल बनी हुई है कि उन्हें अपनी प्रतिभाओं के सही इस्तेमाल के लिए भारत छोड़कर विदेश का रुख करना पड़ रहा है। 

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क्या चुनौतियां सामने आ रहीं हैं?

  • फंडिंग: नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक किसी प्रोजेक्ट के मूल्यांकन में ज्यादा लंबा समय लगता है। फंड 3 से 6 महीने में रिलीज होता है, कई बार साल तक।
  • बजट: छोटी खरीदारी के लिए भी जनरल फाइनेंशियल रूल्स का पालन करना पड़ता है, GST की मार रिसर्च और डेवलेपमेंट उपकरणों पर ज्यादा है, बार-बार यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा करना पड़ता है। 
  • ह्युमन रिसोर्स: तंत्र कमजोर है। PhD फेलोशिप तो बढ़ी है, लेकिन पोस्ट PhD सपोर्ट न के बराबर है। फेलोशिप आने में देरी होती है, भर्ती में अड़चनें हैं और राज्य संस्थानों में बड़ी संख्या में रिक्त पदों पर समय से भर्ती ही नहीं होती।
  • पलायन: अवसर न मिलने से अच्छे वैज्ञानिक प्राइवेट सेक्टर या विदेश चले जाते हैं क्योंकि सरकारी वेतनमान और करियर आकर्षक नहीं रह गए हैं। संस्थागत स्तर पर रिसर्च और डेवलेपमेंट ऑफिस अक्सर कमजोर होते हैं या नहीं होते हैं। 
  • टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस: किसी प्रोजेक्ट के लिए खरीदारी समय से हो नहीं पाती है, भर्ती नहीं होती है। वैज्ञानिक उपकरण को तरसते हैं, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस (TTO) प्रभावी नहीं होता है। लैब में बनी टेक्नोलॉजी, प्रोडक्ट तक नहीं पहुंच पाती। राज्य संस्थानों में इंफ्रास्ट्रक्चर, फंडिंग और रिसर्च कल्चर कमजोर है।
  • समय: शिक्षक पढ़ाने में व्यवस्त हैं, रिसर्च के लिए समय का अभाव है। 

कैसे बेहतर हो सकता है?

'ईज ऑफ डूइंग रिसर्च एंड डेवलेपमेंट इन इंडिया' की रिपोर्ट कहती है कि अगर भारत को अगर शोध और विकास में उन्नति करनी है तो नियमों के तय दायरे से बेहतर निकलना होगा। भारत में शोध की प्रवृत्ति नियम केंद्रित है, जबकि भरोसा और नतीजों पर आधारित काम होना चाहिए। वैज्ञानिकों को रिसर्च करने की जगह फाइलों, अकाउंट्स और ऑडिट में दिमाग खपाना पड़ता है।

सितंबर 2019 याद है? भारत का महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 असफल हुआ था। विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरने से पहले चंद्रमा से 2.1 किलोमीटर की दूरी पर इसरो से संपर्क खो बैठा ता और क्रैश हो गया था। भारत में ISRO की खूब आलोचना हुई थी। लोग अमेरिका और चीन से तुलना करके कोसने लगे थे। यह साफ नतीजा निकला कि देश में असफलताओं से सीखने और नए जोखिम लेने की संस्कृति कमजोर है। सुविधाओं के अभाव में भारतीय सोचते बेहतर हैं लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए उनके पास प्लेटफॉर्म कमजोर हैं। 

किस हाल में है रिसर्च और डेवलेपमेंट इंडस्ट्री?

'ईज ऑफ डूइंग रिसर्च एंड डेवलेपमेंट इन इंडिया' की रिपोर्ट कहती है कि जिन उत्पादों को शोध और विकास के नजरिए से तैयार किया जाता है, उनके खरीदार कम हैं। प्रयोगशालाओं के की रिसर्च को खरीदने के लिए इच्छुक उद्योग, अभी भारत में कम हैं। संस्थाओं के बीच होने वाले समझौतों तय या मानकीकृत नहीं हैं। कागजी कार्रवाई में कई बार महीनों का वक्त लग जाता है। राज्य, स्कूल, कॉलेज और जमीनी स्तर पर नए आविष्कार और सुधार के प्रति कम उदार हैं, जहां रुझान दिखता है, उन्हें पर्याप्त मदद नहीं मिल पाती है। भारत में किसी उत्पाद के लैब से जमीन पर उतरने की रफ्तार बेहद धीमी है। 

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नीति आयोग की सिफारिशें क्या हैं?

सरकार को 0.65 प्रतिश GERD में अब इजाफा करने की जरूरत है। यह देश की सकल घरेलू आय (GDP) का कम से कम 2 फीसदी हिस्सा हो, जिससे रिसर्च के लिए पैसों की कमी न पड़े। नीति आयोग ने 'ईज ऑफ डूइंग रिसर्च एंड डेवलेपमेंट इन इंडिया' रिपोर्ट में ही इसके समाधान भी सुझाए हैं। जो लोग, बेहतर काम कर सकते हैं, उन्हें मौका दिया जाए, बाधाएं हटाई जाएं। जब तक फंडिंग बढ़ेगी नहीं, वैज्ञानिकता का बढ़ना मुश्किल है। 

नीति आयोग का सुझाव है कि सरकार 'यूनिफाइड प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सिस्टम (UPMS) लागू करे, एक साल के भीतर प्रोजेक्ट स्वीकार हों, फंड की राशि 6 महीने के भीतर मिले। छोटे प्रोजेक्ट्स के लिए डायरेक्ट फंड ट्रांसफर की व्यवस्था मिले, संस्थाओं को उपकरण खरीदने में छूट दी जाए। 

नीति आयोग का सुझाव है कि खर्च करने की क्षमता 20 फीसदी तक बढ़ाई जाए, विज्ञान निधि के तहत छात्रवृत्ति बढ़ाई जाए, पोस्ट डॉक्टरेट की पढ़ाई करना आसान हो न कि आर्थिक बोझ के तले छात्र दब जाएं। 



दुनिया इनोवेशन और रिसर्च की रेस में कितना आगे गई?

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन (WIPO) की रैंकिंग बताती है कि दुनिया के सबसे बड़े इनोवेशन क्लस्टर भारत से नहीं हैं। रैंकिग में पहला स्थान चीन है। शेन्जेन, ग्वांगझू और हांगकांग में सबसे ज्यादा इनोवेशन हो रहा है। इनमें एक भी भारतीय शहर नहीं शामिल है। 

  • शेन्जेन, ग्वांगझू और हांगकांग (चीन)
  • टोक्यो (जापान)
  • सैन फ्रांसिस्को, सिनिकॉन वैली, अमेरिका
  • बीजिंग, चीन
  • सियोल, दक्षिण कोरिया

शेन्जेन, ग्वांगझू और हांगकांग और टोक्यो-याकोहामा मिला जाए तो दुनिया के कुल पेटेंट का 20 फीसदी हिस्सा यहीं से आता है। दुनिया में 5 में से एक 1 पेटेंट, इन्हीं शहरों में होता है। 

जनसंख्या के हिसाब से कहां सबसे ज्यादा इनोवेशन हो रहा है?

  • सैन जोस,सैन फ्रांसिस्को
  • बोस्टन, कैंब्रिज, अमेरिका
  • निंगडे, चीन
  • ऑक्सफोर्ड, यूनाइटेड किंगडम

किन देशों के सबसे ज्यादा क्लस्टर्स टॉप 100 में हैं?

  • चीन: 24 क्लस्टर्स
  • अमेरिका: 22 क्लस्टर्स
  • जर्मनी: 7 क्लस्टर्स
  • भारत: 4 क्लस्टर्स (बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई)
  • यूनाइटेड किंगडम: 4 क्लस्टर्स 

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जो सुधार भारत में साइंस की स्थिति बेहतर कर सकते हैं

नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि संस्थानों को नियुक्तियों में भर्ती को लेकर स्वायत्तता दी जाए। हर संस्थान में एक विभाग रिसर्च सेंटर हो, जहां नए खोज पेटेंट कराए जाएं, नए स्टार्टअप पर खोज हो। लैब के बने उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के लिए रिसर्च और इनोवेशन क्लस्टर तैयार किए जाएं। सरकार और प्राइवेट कंपनियों के साझा प्रोजेक्ट को लेकर स्पष्ट निर्देश हों कि उत्पाद को लेकर किसकी कितनी हिस्सेदारी होगी। स्टार्टअप्स में काम करने वाले कर्मचारियों को मिलने वाले शेयर्स पर टैक्स में राहत मिले।

वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन (ONOS) का दायरा बढ़ाया जाए, प्राइवेट और सरकारी संस्थान दोनों को डेटाबेस और रिसर्च पेपर तक पहुंचने की सुलभता मिले। नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि नेशनल रिसर्च रिपॉजिटरी के तहत देशभर में हो रहे अहम प्रोजेक्ट और रिसर्च को एक प्लेटफॉर्म मिले, जिस तक लोग आसानी से पहुंच सकें।

राज्यों की साइंस और तकनीती परिषदों तक ज्यादा संसाधन पहुंचे। छोटे और स्थानीय संस्थानों को लैब के आधुनिक उपकरण और मशीने खरीदने में फंडिंग दी जाए। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर साइंस पॉलिसी एंड गवर्नेंस (NISPG) को जमीनी स्तर पर लागू किया जाए साइंस और तकनीक से जुड़े आंकड़े, नियम और निगरानी की सुविधाएं दी जाए। लोगों को प्रशिक्षित किया जाए।