उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। एक दौर में समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के रणनीतिकार नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता मुस्लिम राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते थे लेकिन बदलते राजनीतिक हालात ने प्रदेश की मुस्लिम राजनीति का चेहरा बदल दिया है। ऐसे में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी खुद को मुस्लिम समाज की नई राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

 

रामपुर से 9 बार विधायक रहे आजम खान लंबे समय तक समाजवादी पार्टी और मुस्लिम राजनीति का बड़ा चेहरा रहे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूरे प्रदेश में उनकी राजनीतिक पहचान थी लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कानूनी मामलों और जेल से जुड़ी परिस्थितियों के कारण उनकी सक्रियता काफी सीमित हो गई है। सपा में भी अब वैसा कोई मुस्लिम नेता नहीं दिखता जिसकी प्रदेशव्यापी पकड़ आजम खान जैसी हो।

नसीमुद्दीन का लंबा राजनीतिक सफर लेकिन घट रहा प्रभाव

नसीमुद्दीन सिद्दीकी कभी बसपा सुप्रीमो मायावती के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे। दलित-मुस्लिम समीकरण साधने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती थी। हालांकि, बसपा से अलग होने के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। लगातार दल बदलने के कारण उनकी राजनीतिक पकड़ और प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा के दौर वाली उनकी ताकत अब दिखाई नहीं देती।

 

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ओवैसी देख रहे हैं बड़ा राजनीतिक अवसर

आजम खान की सीमित सक्रियता और नसीमुद्दीन सिद्दीकी के घटते प्रभाव के बीच ओवैसी उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक अवसर देख रहे हैं। बहराइच से चुनावी अभियान शुरू कर उन्होंने साफ संकेत दिया है कि AIMIM केवल चुनाव लड़ने नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति में स्थायी जगह बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। ओवैसी लगातार मुस्लिम समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं। इसके साथ ही वह दलित और पिछड़े वर्गों को जोड़ने की कोशिश में भी जुटे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी नजर उन वोटरों पर है जो खुद को मुख्यधारा की पार्टियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने से नाराज मानते हैं।

 

यूपी में मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी के साथ रहा है। ऐसे में यदि AIMIM कुछ क्षेत्रों में मजबूत संगठन खड़ा करने में सफल होती है तो इसका सीधा असर सपा के वोट बैंक पर पड़ सकता है। खासकर पूर्वांचल, तराई और पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर ओवैसी की सक्रियता नए समीकरण बना सकती है।

 

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यह सवाल 2027 चुनाव से पहले सबसे ज्यादा चर्चा में है। ओवैसी की राष्ट्रीय पहचान मजबूत है, लेकिन उत्तर प्रदेश में बड़ा नेता बनने के लिए उन्हें चुनावी सफलता और मजबूत संगठन दोनों की जरूरत होगी। फिलहाल वह लगातार प्रदेश का दौरा कर रहे हैं और मुस्लिम युवाओं के साथ-साथ दलित-पिछड़े वर्गों के बीच भी अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

 

एक समय आजम खान और नसीमुद्दीन सिद्दीकी यूपी की मुस्लिम राजनीति के सबसे बड़े नाम थे लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। ऐसे में ओवैसी उस खाली होती राजनीतिक जगह को भरने की कोशिश कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि वह केवल चुनावी चर्चा तक सीमित रहते हैं या वास्तव में उत्तर प्रदेश की मुस्लिम राजनीति का नया केंद्र बनकर उभरते हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब देगा।