लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गैर-यादव पिछड़ा वोट बैंक सबसे बड़ी चुनावी लड़ाई का केंद्र बनता जा रहा है। बीजेपी एक ओर अपने संगठन और सरकार के जरिए विकास व कल्याणकारी योजनाओं का संदेश दे रही है, वहीं दूसरी ओर उसके सहयोगी दलों के नेता सामाजिक और जातीय मुद्दों पर विपक्ष को घेरने में जुटे हैं। इन्हीं में सबसे सक्रिय चेहरा ओमप्रकाश राजभर का माना जा रहा है।
पिछले कुछ महीनों में राजभर ने अपने अधिकांश राजनीतिक हमलों का केंद्र समाजवादी पार्टी और खासकर अखिलेश यादव को बनाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे गैर-यादव पिछड़े वर्गों के बीच अलग राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जा रही है। हालांकि बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर इसे अपनी रणनीति नहीं बताया है।
राजभर के निशाने पर लगातार यादव राजनीति
ओमप्रकाश राजभर अपने सार्वजनिक बयानों में बार-बार यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि पिछड़े वर्ग की राजनीति किसी एक जाति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके कई बयान सीधे समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व पर केंद्रित रहे हैं। इससे सियासी बहस का फोकस यादव बनाम गैर-यादव पिछड़ा वर्ग के विमर्श की ओर जाता दिखाई देता है। राजनीतिक जानकार इसे विपक्ष के पारंपरिक सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखते हैं।
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बीजेपी की नजर गैर-यादव OBC वोट बैंक पर
उत्तर प्रदेश में राजभर, निषाद, कुर्मी, मौर्य, शाक्य, लोध, कश्यप, प्रजापति, बिंद, पाल समेत कई गैर-यादव पिछड़ी जातियां बड़ी संख्या में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। बीजेपी पिछले कई चुनावों से इन वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। सहयोगी दलों के नेताओं को आगे रखकर इन समुदायों तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की रणनीति भी इसी का हिस्सा मानी जाती है।
बिहार की रणनीति जैसी चर्चा
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा भी है कि बीजेपी ने बिहार में गैर-यादव पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों के बीच अपना आधार मजबूत कर चुनावी बढ़त हासिल की थी। उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह गैर-यादव OBC वर्गों को एकजुट रखने की कोशिश दिखाई दे रही है। राजभर की सक्रियता को इसी व्यापक सामाजिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
पीडीए बनाम गैर-यादव समीकरण
समाजवादी पार्टी जहां पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए सामाजिक गठबंधन मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी गैर-यादव पिछड़े वर्गों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने पर जोर दे रही है। इसी कारण ओमप्रकाश राजभर के बयान अक्सर सीधे सपा और उसके सामाजिक आधार को चुनौती देते नजर आते हैं।
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2027 की लड़ाई का अहम मोर्चा
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाला विधानसभा चुनाव केवल विकास या सरकार के कामकाज पर नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों और जातीय गठजोड़ पर भी काफी हद तक निर्भर करेगा। ऐसे में ओमप्रकाश राजभर की सक्रियता और बीजेपी के साथ उनकी राजनीतिक भूमिका आने वाले महीनों में और महत्वपूर्ण हो सकती है।
सियासी संदेश क्या है?
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि बीजेपी की कोशिश गैर-यादव पिछड़े वर्गों में अपनी पकड़ को बनाए रखने और मजबूत करने की है, जबकि समाजवादी पार्टी अपने पारंपरिक आधार के साथ पीडीए गठजोड़ को विस्तार देने में जुटी है। ऐसे में ओमप्रकाश राजभर के लगातार आक्रामक बयान केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले चल रही बड़ी सामाजिक और चुनावी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।


