सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका को खारिज कर दिया है। सुनवाई के दौरान जज जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि राजनीति में आने के बाद अंडों से डर क्यों लगता है जबकि देश के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने सीने पर गोलियां खाई थीं। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं ने इस बयान पर विरोध जताया है और जज से इस्तीफे की मांग की है।
यह मामला ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ एक फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज किए गए आपराधिक मामले से जुड़ा है। इससे पहले 21 जुलाई को कलकत्ता हाईकोर्ट ने नफरत फैलाने वाले भाषण के मामले में महुआ मोइत्रा को 5 अक्टूबर तक दंडात्मक कार्रवाई से राहत दी थी और 14 अगस्त को जांच अधिकारी के सामने पेश होने का निर्देश दिया था। महुआ मोइत्रा का कहना है कि यह मामला मनगढ़ंत है।
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ऑनलाइन पेश होने की मांग
सुप्रीम कोर्ट में महुआ मोइत्रा की तरफ से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन पेश हुए। उन्होंने मांग की कि सांसद महुआ मोइत्रा को जांच अधिकारी के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने के बजाय वर्चुअली पेश होने की इजाजत दी जाए। वकील ने कोर्ट को बताया कि पिछली बार जब वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के पुलिस स्टेशन गई थीं, तब उन पर अंडे फेंके गए थे और भीड़ द्वारा निशाना बनाए जाने का खतरा है।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ कर रही थी। कोर्ट ने राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि आप एक सांसद हैं राजनीति में आने के बाद अंडों से डर क्यों लगता है जबकि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने सीने पर गोलियां खाई थीं। इसके बाद वकील ने याचिका वापस ले ली और कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
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सौरव दास का विरोध
इस टिप्पणी के बाद सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी और पूछा कि क्या जज यह चाहते हैं कि महुआ मोइत्रा गोलियां खाएं। उन्होंने न्यायिक जवाबदेही तय करने की मांग की। सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि अगर महुआ मोइत्रा को कुछ भी होता है तो जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच जिम्मेदार होगी और ऐसे जजों को इस्तीफा देना चाहिए या महाभियोग का सामना करना चाहिए। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी सवाल उठाया कि क्या सुप्रीम कोर्ट अब यह चाहता है कि हर कोई गोलियां खाए। उन्होंने कहा कि अदालतों के जजों द्वारा ऐसे बयान दिए जाने पर आम आदमी के लिए न्याय की उम्मीद कम होती है।
