उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी दलों के बीच सीट बंटवारे की कवायद तेज हो गई है। एनडीए में शामिल कई दलों के शीर्ष नेता इन दिनों दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, सीटों के बंटवारे को लेकर एक नया फार्मूला तैयार किया जा रहा है, जिसके तहत प्रमुख सहयोगी दलों को पिछली बार के मुकाबले दो से तीन सीटें अधिक देने पर विचार किया जा रहा है।
एनडीए में शामिल दलों के नेता पिछले कुछ सप्ताह से दिल्ली में सक्रिय हैं। केंद्रीय मंत्रियों और बीजेपी संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बैठकों का दौर चल रहा है। सहयोगी दल अपनी राजनीतिक ताकत, जातीय आधार और लोकसभा चुनाव के दौरान निभाई भूमिका का हवाला देकर बेहतर हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। बीजेपी भी किसी प्रकार की नाराजगी से बचते हुए गठबंधन को मजबूत बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
यह भी पढ़ें: UP के ऊर्जा मंत्री और UPPCL अध्यक्ष के बीच मतभेद, चिट्ठी सामने आने पर मचा हड़कंप
2022 का प्रदर्शन बना आधार
2022 के विधानसभा चुनाव में अपना दल (सोनेलाल) को 17 सीटें मिली थीं और पार्टी ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की थी। निषाद पार्टी ने 10 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 6 सीटें जीती थीं। उस चुनाव में निषाद पार्टी के कुछ उम्मीदवार बीजेपी के चुनाव चिह्न पर भी मैदान में उतरे थे। वहीं वर्तमान में एनडीए का हिस्सा बनी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने उस समय समाजवादी पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा था और 19 सीटों में से 6 सीटों पर जीत हासिल की थी। राष्ट्रीय लोकदल ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर 8 सीटें जीती थीं। अब ये दोनों दल बीजेपी के साथ हैं और अपनी राजनीतिक हैसियत के मुताबिक हिस्सेदारी चाहते हैं।
क्या है नया सीट शेयरिंग फार्मूला?
बीजेपी सूत्रों के मुताबिक इस बार सीटों का बंटवारा केवल संख्या के आधार पर नहीं बल्कि जीतने की क्षमता और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाएगा। चर्चा है कि अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को पिछली हिस्सेदारी से दो से तीन सीटें अधिक मिल सकती हैं। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल को भी सम्मानजनक संख्या देने पर विचार चल रहा है।
कमल के निशान पर लड़ाने की तैयारी
बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि कई क्षेत्रों में कमल का चुनाव चिह्न उम्मीदवार की जीत की संभावना बढ़ा देता है। इसी वजह से कुछ सहयोगी दलों के नेताओं को बीजेपी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव भी दिया जा सकता है। इससे गठबंधन का वोट एकजुट रखने और सीटों पर जीत सुनिश्चित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
यह भी पढ़ें: 60000 शिक्षकों की भर्ती की तैयारी, चुनाव से पहले बेरोजगारों को साधेगी UP सरकार?
2027 का चुनाव बीजेपी के लिए केवल सत्ता बचाने का नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों को मजबूत रखने का भी चुनाव माना जा रहा है। कुर्मी वोट बैंक के लिए अपना दल, निषाद समुदाय के लिए निषाद पार्टी, राजभर वोटों के लिए सुभासपा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं के लिए रालोद को अहम माना जा रहा है। बीजेपी इन वर्गों में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सहयोगियों को पर्याप्त महत्व देना चाहती है।
किस क्षेत्र में किसकी दावेदारी?
पूर्वांचल में अपना दल और सुभासपा की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है। गोरखपुर-बस्ती मंडल और आसपास के क्षेत्रों में निषाद पार्टी अधिक सीटों की मांग कर सकती है। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश में है। बीजेपी इन्हीं क्षेत्रों में सहयोगियों को समायोजित करने की रणनीति पर काम कर रही है।
बीजेपी नेतृत्व फिलहाल किसी भी सहयोगी दल को नाराज करने के मूड में नहीं दिख रहा है। लोकसभा चुनाव के अनुभवों को देखते हुए पार्टी 2027 में मजबूत एनडीए के साथ मैदान में उतरना चाहती है। यही कारण है कि सीटों के बंटवारे में लचीलापन दिखाने और सहयोगियों को राजनीतिक सम्मान देने की रणनीति अपनाई जा रही है।
यह भी पढ़ें: भगवान राम को काल्पनिक बताकर फंसे राहुल गांधी? कोर्ट ने पलटा फैसला
नजर अंतिम फार्मूले पर
हालांकि सीटों के बंटवारे पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन दिल्ली में चल रही बैठकों और बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों ने साफ संकेत दे दिए हैं कि 2027 के चुनाव से पहले एनडीए के भीतर सीटों का नया गणित तैयार किया जा रहा है। आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी चुनावी लड़ाई में कौन दल कितनी सीटों पर मैदान में उतरेगा।
