साल 2027 में कुल 7 राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन 7 में से 5 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकारें हैं। पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के बाद जोश में चल रही बीजेपी को पिछले 2-3 महीने में हुई घटनाओं ने बैकफुट पर धकेल दिया है। पहले छात्रों के आंदोलन के कारण धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने को मजबूर हुई बीजेपी अब आरक्षण, जातिगत जनगणना और अपने धुर समर्थकों के विरोध को ही झेल रही है। दबी जुबान में ही सही लेकिन पेपर लीक, स्कूलों की स्थिति और खराब व्यवस्थाओं को लेकर अपनों के सवाल अब बीजेपी को भी परेशान करने लगे हैं। ऐसे में अगले साल के चुनावों से पहले बीजेपी फंसती दिख रही है।
अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, गोवा, मणिपुर और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इनमें से मणिपुर और गोवा को छोड़कर बाकी के पांच राज्यों में आरक्षण का मुद्दा बेहद अहम हो सकता है। गुजरात और उत्तर प्रदेश में तो यह मुद्दा निर्णायक हो सकता है। यही वजह है कि बीजेपी फंसी हुई दिख रही है और वह किसी भी तरह की प्रतिक्रिया से बच रही है। वहीं, विपक्षा चाहता है कि वह कैसे भी करके बीजेपी को इस दोधारी तलवार की धार पर ले आए जिससे चुनाव में उसे मात दी जा सके।
आरक्षण के मुद्दे पर फंसती दिख रही है बीजेपी
माना जाता है कि यूपी में लगभग एक तिहाई आबादी ओबीसी की है। वहीं, अनुसूचित जाति के लोगों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है। इसी तरह गुजरात, पंजाब और गोवा जैसे राज्यों में भी इन दो समुदायों की आबादी लगभग 50 प्रतिशत के आसपास है। विधानसभा की संख्या के हिसाब से इन दो समुदायों के मतदाता निर्णायक हैं और यूपी जैसे राज्य में तो इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिल रहा है।
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हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन करने उतरे लोगों ने जिस तरह की बातें कीं उसने विपक्ष को और ताकत दे दी है। यूपी के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने एक प्रदर्शनकारी युवा से मुलाकात करके यह भी कह दिया कि वह केंद्रीय मंत्री से मुलाकात कराएंगे। अब विपक्ष इसे इस तरह पेश कर रहा है कि आरक्षण खत्म करने की कोशिश की जा रही है।
आरक्षण का विरोध करने वाले सवर्ण जातियों के लोग पारंपरिक रूप से बीजेपी के वोटर रहे हैं। वहीं, पिछले 12 साल में कड़ी मशक्कत करके बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव एससी जातियों को अपने साथ जोड़ा है। यूपी में निषाद पार्टी और बिहार में चिराग पासवान जैसे नेता पहले ही बीजेपी को आंख दिखा रहे हैं। ऐसे में बीजेपी ना तो अपने पारंपरिक वोटरों के लिए कुछ बोल पा रही है और ना ही यह आरक्षण पर कोई स्पष्टीकरण दे पा रही है।
जनगणना भी बनी मुसीबत
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि जातिवार जनगणना इसी बार से हो रही है। अब जनगणना के 40 सवाल जारी होने के बाद विपक्ष ने बीजेपी को इसी पर घेर लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी को एक चिट्ठी लिखी है और कहा है कि तेलंगाना और बिहार जैसे सवाल शामिल किए जाएंगे। विपक्ष का कहना है कि इन सवालों में 'पिछड़ा वर्ग' का जिक्र ही नहीं है।
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विपक्ष इसे जोर-शोर से उठा रहा है और इस बात की पूरी संभावना है कि यह सवाल यूपी और गुजरात जैसे राज्यों में और तेज हो सकता है। बीजेपी के लिए यह भी मुसीबत का सबब है। दरअसल, जनगणना में जातियों की गिनती बेहद पेचीदगी भरी है। इसमें अलग-अलग जातियों और उपजातियों का डेटा अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए, कोई एक जाति एक राज्य में पिछड़े वर्ग में आती तो वही जाति कहीं एसपी में भी आती है। इसी तरह कुछ जातियों का डेटा ही स्पष्ट नहीं है। ऐसे में भले ही तकनीकी तौर पर सरकार का कदम सही लगे लेकिन राजनीतिक तौर पर वह फंस सकती है।
अपनों का विरोध
2014 से अब तक प्रचंड बहुमत पर सवार बीजेपी कभी अपने सहयोगियों के भी दबाव में नहीं आई। हालांकि, यूजीसी के मामले पर हुए विरोध, CJP के प्रदर्शन और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने बहुत कुछ बदल दिया है। अब बीजेपी को उसके सहयोगी भी आंख दिखा रहे हैं। हाल ही में यूपी में बीजेपी के गठबंधन सहयोगियों ने अलग से मुलाकात की है और ज्यादा सीटों की मांग कर दी है। चिराग पासवान भी आरक्षण के मामले पर खुलकर बोल रहे हैं कि आरक्षण कोई हटा नहीं सकते। उनके जीजा और सांसद अरुण भारती ने तो यूपी के सीएम बृजेश पाठक का नाम लेकर उनकी आलोचना कर डाली थी।
इसके अलावा, सवर्ण समाज बीजेपी से काफी नाराज नजर आ रहा है। पहले UGC गाइडलाइन्स और अब आरक्षण को लेकर यही वर्ग सबसे ज्यादा मुखर है। बार-बार अल्टीमेटम दिया जा रहा है और आरक्षण की समीक्षा करने, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने या आरक्षण खत्म करने जैसी मांगें उठाई जा रही हैं। इसके अलावा, स्कूलों की खराब स्थिति, एथेनॉल ब्लेंडिंग और पेपर लीक जैसे मुद्दे भी सरकार के खिलाफ माहौल बना रहे हैं।
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बीजेपी के लिए चिंता की बात यह है कि ये सारी चीजें चुनाव से ठीक पहले एकजुट हो रही हैं। उधर, उत्तराखंड में कांग्रेस, यूपी में सपा-कांग्रेस का गठबंधन, पंजाब में आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षियों के खिलाफ बीजेपी पहले जैसे तीखे नैरेटिव नहीं गढ़ पा रही है और वह कई मुद्दों पर फंसती दिख रही है।
ऐसे में यह देखना अहम होगा कि इन चुनावों तक बीजेपी इन मुद्दों का हल निकाल पाती है या नहीं। अगर ये मुद्दे उसके लिए चुनाव तक मुसीबत बने रहे तो संभव है कि लोकसभा चुनाव में जैसा उत्तर प्रदेश में हुआ, वैसा ही कुछ हश्र बीजेपी का कई राज्यों में हो और वह कुछ राज्यों की सत्ता भी गंवा बैठे।
