उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक नया सियासी मोर्चा बनता दिखाई दे रहा है। स्विट्जरलैंड से लौटने के बाद रोहिणी घावरी प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने की तैयारी में हैं। उनका मुख्य फोकस वाल्मीकि समाज को एकजुट करने और पश्चिमी यूपी की उन विधानसभा सीटों पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल उठाने पर है, जहां वाल्मीकि मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। रोहिणी 14 और 15 सितंबर को लखनऊ आ रही हैं। इस दौरान वह वाल्मीकि समाज के लोगों से मुलाकात करेंगी। इसी बीच समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव से उनकी मुलाकात की संभावना भी है। अखिलेश से मुलाकात को लेकर बात भी हो चुकी है, इसलिए इस मुलाकात पर राजनीतिक नजरें टिकी हैं। अगर दोनों की मुलाकात होती है तो यूपी की दलित राजनीति में इसके नए सियासी मायने निकाले जा सकते हैं।
रोहिणी वाल्मीकि समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए इन क्षेत्रों में अभियान चलाने की तैयारी में हैं। उनकी नजर आगरा कैंट, एत्मादपुर, जसराना, फिरोजाबाद, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, गाजियाबाद, लोनी, लखनऊ मध्य, लखनऊ उत्तर और लखनऊ पश्चिम समेत कई सीटों पर है। इसके अलावा सीसामऊ, आर्यनगर, किदवईनगर, अलीगढ़ और खैर समेत कुल 21 सीटों पर भी वह राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल उठाने की तैयारी में हैं। इन सीटों पर जाटव और वाल्मीकि समाज के मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। रोहिणी का प्रयास है कि वाल्मीकि समाज को केवल सफाईकर्मी के तौर पर देखने की धारणा बदले और उसे राजनीतिक रूप से भी मजबूत प्रतिनिधित्व मिले। उनका कहना है कि अगले पांच साल में किसी राज्य में वाल्मीकि समाज से मुख्यमंत्री बनाए जाने का लक्ष्य भी सामने रखा जाना चाहिए।
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समाज को राजनीतिक ताकत बनाने की कोशिश
रोहिणी का कहना है कि वाल्मीकि समाज को लंबे समय से मुख्य रूप से सफाईकर्मियों के तौर पर देखा गया, जबकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उसकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम रही है। वह वाल्मीकि समाज को एक राजनीतिक ताकत के तौर पर लामबंद करने की कोशिश में हैं।इस अभियान के जरिए 2027 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर नए समीकरण पैदा करने की संभावना देखी जा रही है। रोहिणी सर्वसमाज को साथ लेकर आगे बढ़ने की बात भी कह रही हैं।
रोहिणी और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के बीच विवाद पहले से ही सुर्खियों में रहा है। रोहिणी ने चंद्रशेखर पर शादी का वादा कर शोषण करने के आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर ने उनसे संबंध तोड़ लिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। रोहिणी के इन आरोपों के बाद दोनों के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत विवाद लगातार चर्चा में रहा है। अब रोहिणी की यूपी में सक्रियता और वाल्मीकि समाज के बीच अभियान इस विवाद को दलित राजनीति से भी जोड़ रही है।
गोंडा जाते समय चंद्रशेखर के काफिले का विरोध
इसी बीच गोंडा जाते समय चंद्रशेखर आजाद के काफिले के विरोध की घटना ने भी इस पूरे मामले को और चर्चा में ला दिया। उनके खिलाफ रोहिणी घावरी के नाम के नारे लगाए गए और काफिले पर हमला व पथराव किए जाने की बात सामने आई। पुलिस ने स्थिति संभालते हुए चंद्रशेखर को सुरक्षा के बीच आगे पहुंचाया। इस घटनाक्रम के बाद रोहिणी और चंद्रशेखर के बीच चल रहा विवाद एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।
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अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 14-15 सितंबर को लखनऊ आ रहीं रोहिणी घावरी की अखिलेश यादव से मुलाकात होती है या नहीं। इस मुलाकात को लेकर पहले से बातचीत हो चुकी है और मुलाकात की संभावना बनी हुई है। अगर यह बैठक होती है तो इसके जरिए पश्चिमी यूपी की दलित राजनीति में नए समीकरणों का संकेत मिल सकता है।
रोहिणी का दावा है कि चंद्रशेखर के खिलाफ उनकी लड़ाई में अखिलेश यादव ने सहयोग का भरोसा दिया है। ऐसे में अखिलेश से संभावित मुलाकात को सिर्फ शिष्टाचार मुलाकात के बजाय 2027 की दलित सियासत में नए राजनीतिक समीकरण की शुरुआत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
