संसद का मौजूदा मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले सत्ताधारी नेशनल डेमोक्रैटिक अलायंस (NDA) और इस गठबंधन की सबसे बड़ी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हौसले बुलंद थे। अलग-अलग दलों के सांसद दो-तिहाई के अनुपात में टूटकर सत्ताधारी गठबंधन में शामिल हो रहे थे और कहा जा रहा था कि मोदी सरकार अब किसी भी सूरत में परिसीमन बिल पारित करवा ही लेगी। मुश्किल से 15 दिन बीते हैं और स्थिति एकदम बदल गई है। 12 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि प्रदर्शन और दबाव के चलते केंद्र सरकार के एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, बीजेपी अपने दो गढ़ में उपचुनाव हार गई। इतना ही नहीं, स्थिति ऐसी बन गई है कि अब चर्चा है कि परिसीमन बिल और पीएम-सीएम जैसे बिलों को इस सत्र के लिए टाल दिया गया है।
सत्ताधारी बीजेपी इन दिनों एकदम बैकफुट पर है। संसद में विपक्षी नेता लगातार हंगामा कर रहे हैं और दो हफ्ते बीत जाने के बावजूद केंद्रीय गृहमंत्री या प्रधानमंत्री ने कोई भाषण नहीं दिया है। पेपर लीक बिल को लेकर हुई चर्चा में भी इन दोनों नेताओं ने हिस्सा नहीं लिया था। पेपर लीक के बाद विपक्षी सांसद हर दिन राम मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं और मांग उठा रहे हैं कि गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जवाब दें। इसके अलावा, एथेनॉल , पेपर लीक, राम मंदिर चढ़ावा चोरी और कई अन्य मुद्दों को लेकर देशभर में अलग-अलग तरह के प्रदर्शन भी हो रहे हैं।
गले की फांस बन गया है E20 पेट्रोल
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना सरकार के लिए लगातार मुश्किलें बढ़ा रहा है। सरकार लगातार इनकार कर रही है कि इससे किसी तरह की कोई समस्या नहीं है लेकिन जनता के बीच यह बात स्वीकार्य नहीं हो रही है। सरकार ने खुद एवरेज कम होने की बात स्वीकार की है और कई ऐसे मामले आए हैं जिनमें गाड़ियों में खराबी भी देखी गई है। एक केस में तो कंज्यूमर कोर्ट ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया था और डीलर को कहा था कि वह नई गाड़ी दे। यह मामला भी एथेनॉल से ही जुड़ा हुआ था।
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लगातार उठते सवालों और विपक्ष के प्रदर्शनों के चलते सरकार इस मामले पर भी बैकफुट पर दिखने लगी है। जो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी पहले कहते थे कि वह E100 तक की फाइल पर दस्तखत कर चुके हैं, अब वही कहने लगे हैं कि इससे उनका लेना-देना नहीं है। आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि सरकार पेट्रोल पंपों पर शुद्ध पेट्रोल और एथेनॉल वाले पेट्रोल का विकल्प दे।
छात्रों के प्रदर्शन ने दिया बड़ा झटका
दिल्ली में लंबे समय से चल रहा छात्रों का प्रदर्शन संसद सत्र की शुरुआत के पहले ही दिन यानी 20 जुलाई को चर्चा का विषय बन गया था। 12 साल में पहली बार ऐसा देखा गया कि मोदी सरकार झुकने पर मजबूर हुई और धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षामंत्री का पद छोड़ना पड़ा। यह मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहा। इसने बीजेपी को एक संदेश यह भी दिया कि वह आगामी पीढ़ियों यानी GenZ और Gen Alpha से कनेक्ट नहीं कर पा रही है। यही वजह है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर वीडियो बनाने शुरू कर दिए और अपने मंत्रियों को भी ऐसा करने की सलाह दी है।
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चर्चा है कि बीजेपी अब पूरी तरह से इस कोशिश में लगी हुई है कि इस पीढ़ी को अपने साथ जोड़ना है। जिस तरह से जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रियों को गालियां दी गईं, उससे 'ब्रांड हिंदुत्व' और 'ब्रांड मोदी' को बड़ा झटका लगा है। इसका असर यह हुआ है कि पहले बीजेपी के आगे बेबस नजर आने वाला विपक्ष जबरदस्त हमलावर हो गया है और सत्ताधारी बीजेपी डिफेंसिव हो गई है।
चुनावी झटकों ने हिलाकर रख दिया
वैसे तो तीनों विधानसभा सीटों पर उपचुनावों से तीनों ही राज्यों की सरकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ना है। इसके बावजूद तीन में से दो सीटों पर बीजेपी की हार ने गहरे संकेत दे दिए हैं। इनमें से एक सीट बांकीपुर तो खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की है जहां लंबे समय से उसका कब्जा रहा था। दूसरी सीट दतिया में बीजेपी ने अपने फायर ब्रांड नेता और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया और यह सीट भी उसे कांग्रेस के हाथों गंवानी पड़ी है।
इन दो हार ने बीजेपी को कोर्स करेक्शन के लिए मजबूर कर दिया है। पहले अपनी मजबूत सीटों पर किसी भी उम्मीदवार को उतारकर जीत का आत्मविश्वास रखने वाली बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। चर्चा है कि इन दोनों ही सीटों के लिए गहन समीक्षा हो रही है और आने वाले दिनों में इसका असर पार्टी और सरकार में भी देखने को मिल सकता है।
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संसद का मौजूदा सत्र शुरू होने से पहले कैबिनेट में बड़े फेरबदल की चर्चा भी थी लेकिन अब वह भी ठंडे बस्ते में पड़ता दिख रहा है क्योंकि बीजेपी अब दबाव में आ गई है। पहले बीजेपी की सुनने वाले उसके सहयोगी दल भी अब उसे नसीहत दे रहे हैं और इस स्थिति में कैबिनेट में फेरबदल घाटे का सौदा हो सकता है। यही वजह है कि पार्टी ही नहीं, सरकार में भी फिलहाल कोई बदलाव नहीं हो रहा है। चर्चा है कि बीजेपी में नितिन नवीन की टीम में भी अब पहले की तुलना में कुछ बदलाव हो सकते हैं या इसे बनाने के लिए नए सिरे से भी विचार किया जा सकता है।
आगामी चुनावों में हो सकती है मुश्किल
आगामी चुनाव उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने हैं। यूपी में बीजेपी को अपनी सरकार बचाए रखनी है तो पंजाब का किला भेदना उसके लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में अगर बीजेपी इन मुद्दों से नहीं उबर पाती है तो इन दोनों ही राज्यों में उसके लिए मुश्किल हो सकती है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले पर बीजेपी को जबरदस्त तरीके से घेरा है। वहीं, पंजाब में आम आदमी पार्टी लगातार E20 के मुद्दे पर बीजेपी को फंसा रही है।
पंजाब में पहले से बेहद कमजोर स्थिति में दिख रही बीजेपी के लिए जरूरी है कि वह न मुद्दों से निपटकर अपने विपक्षियों को काउंटर कर सके। अगर ऐसा नहीं होता है और इन दोनों राज्यों में बीजेपी के लिए अच्छे नतीजे नहीं आते हैं तो 2029 के विधानसभा चुनाव में भी उसके लिए मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं।
