उत्तर प्रदेश में कभी सरकारी फाइलों पर फैसले लेने वाले अफसर अब जनता के बीच वोट मांगते नजर आए हैं। उत्तर प्रदेश में अफसर से नेता बनने की राह नई नहीं है। कई पूर्व IAS और IPS अधिकारी सेवा छोड़ने के बाद अपनी राजनीतिक पार्टी तक बना चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक पहचान को जमीन पर मजबूत राजनीतिक संगठन में बदलना आसान साबित नहीं हुआ। अब पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल के स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने के एलान के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या प्रशासनिक अनुभव चुनावी राजनीति में संगठन खड़ा करने की ताकत में बदल सकता है।
पूर्व IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने 2021 में सक्रिय राजनीति में आने का एलान किया था। इसके बाद उन्होंने आजाद अधिकार सेना बनाई। 2022 में पार्टी ने मैनपुरी लोकसभा और खतौली विधानसभा उपचुनाव में अपने प्रत्याशी उतारे थे। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अमिताभ ठाकुर ने पार्टी को और विस्तार देने का एलान किया है। अगस्त 2026 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कम से कम 100 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही। पार्टी की ओर से करीब 15 जिलों में 20 प्रत्याशियों के नाम घोषित किए जाने की भी जानकारी सामने आई थी। यानी अमिताभ ठाकुर की राजनीतिक यात्रा अभी जारी है और इस बार उनकी पार्टी का फोकस पहले के मुकाबले ज्यादा सीटों पर चुनावी मैदान में उतरने का है।
पूर्व DGP सुलखान सिंह ने बुंदेलखंड के नाम पर बनाई पार्टी
1980 बैच के IPS अधिकारी और पूर्व DGP सुलखान सिंह ने नवंबर 2023 में बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी बनाने का एलान किया था। पार्टी का मुख्य मुद्दा बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की मांग रहा। उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के जिलों को मिलाकर अलग राज्य बनाने की मांग उठाई थी।
सुलखान सिंह ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी उतारने की बात भी कही थी। उनका जोर बुंदेलखंड के विकास, रोजगार और सिंचाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर रहा।पूर्व IAS अधिकारी राम बहादुर ने भी अपनी नागरिक एकता पार्टी बनाई थी। इससे पहले वह 2017 में बसपा के टिकट पर मोहनलालगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके थे। बाद में जनवरी 2022 में वह बीजेपी में शामिल हो गए। इस तरह खुद की पार्टी बनाने के बाद उनका राजनीतिक सफर बड़े राजनीतिक दल में शामिल होने की तरफ चला गया।
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विजय शंकर पांडेय ने बनाई लोक गठबंधन पार्टी
पूर्व IAS अधिकारी विजय शंकर पांडेय ने सेवानिवृत्ति के बाद लोक गठबंधन पार्टी के साथ सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना। पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें फैजाबाद से मैदान में उतारा था। उन्होंने इससे पहले फैजाबाद में जिलाधिकारी के रूप में भी काम किया था। पूर्व IPS अधिकारी एसआर दारापुरी सेवानिवृत्ति के बाद ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट से जुड़े। वह दो बार लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं। यानी पुलिस सेवा से निकलने के बाद उन्होंने भी सीधे चुनावी राजनीति का रास्ता अपनाया।
पूर्व IAS अधिकारी चंद्रपाल ने भी आदर्श समाज पार्टी बनाई। हालांकि, इस रास्ते पर चलने वाले इन पूर्व अधिकारियों में से किसी को भी अब तक चुनावी राजनीति में वह अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जिसकी उम्मीद एक प्रशासनिक करियर से राजनीति में आने के दौरान की जाती है।
बड़े दलों में पहुंचे तो मंत्री और सांसद बने
पूर्व नौकरशाहों की राजनीतिक कहानी का दूसरा पहलू भी है। कुछ अधिकारियों ने अपनी पार्टी बनाने के बजाय सीधे बड़े राजनीतिक दलों का रास्ता चुना और उन्हें सत्ता तथा संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। पूर्व IPS अधिकारी असीम अरुण बीजेपी में शामिल हुए और मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश सरकार में समाज कल्याण मंत्री हैं। पूर्व IAS अधिकारी ए.के. शर्मा भी बीजेपी में शामिल होकर सरकार में ऊर्जा और नगर विकास से जुड़े मंत्री पद पर रहे हैं।
पूर्व IAS अधिकारी बृजलाल बीजेपी से राज्यसभा सदस्य हैं। पूर्व IAS अधिकारी पीएल पुनिया कांग्रेस में शामिल होकर सांसद और राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। पूर्व IPS अधिकारी सत्यपाल सिंह बीजेपी से सांसद और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। वहीं PPS अधिकारी राजेश्वर सिंह बीजेपी के टिकट पर विधायक हैं।
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पार्टी बनाने और बड़े दल में शामिल होने के बीच फर्क
पूर्व IAS-IPS अधिकारियों की यह पूरी कहानी बताती है कि प्रशासनिक अनुभव अपने आप में चुनावी संगठन में नहीं बदलता। किसी ने अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने का रास्ता चुना, तो किसी ने पहले से स्थापित राजनीतिक दल का सहारा लिया। अपनी पार्टी बनाने वाले अधिकारियों के सामने संगठन, कार्यकर्ता और बूथ स्तर तक पहुंच बनाने की चुनौती रही है, जबकि बड़े दलों में शामिल हुए कुछ पूर्व अधिकारियों को पार्टी के तैयार संगठन और राजनीतिक नेटवर्क का लाभ मिला।अब दिव्या मित्तल के स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने के एलान के बाद एक बार फिर वही सवाल सामने है क्या इस बार कोई पूर्व नौकरशाह अपनी प्रशासनिक पहचान को मजबूत चुनावी संगठन में बदल पाएगा
