उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन की सीट शेयरिंग को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। इसी बीच सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सहयोगियों को साफ संदेश दिया है कि गठबंधन में बात सीटों की संख्या की नहीं, बल्कि जीत की होनी चाहिए। अखिलेश के इस बयान के बाद अब नजर कांग्रेस की रणनीति पर है। खासकर कांग्रेस की नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा मोना और कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद के सामने सीट बंटवारे की बातचीत में अपनी पार्टी के लिए मजबूत हिस्सेदारी तय कराने की चुनौती होगी।
अखिलेश यादव ने कहा है कि गठबंधन की राजनीति में यह देखना ज्यादा जरूरी है कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं, इसके बजाय यह देखा जाए कि चुनाव में जीत कैसे सुनिश्चित की जाए। उनका जोर ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारने पर है, जिनकी संबंधित सीट पर जीत की संभावना मजबूत हो।अखिलेश ने इसे सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं बल्कि लोकतंत्र, संविधान और आरक्षण की रक्षा की लड़ाई बताया है। उनके इस बयान को सपा-कांग्रेस के बीच होने वाली सीट शेयरिंग बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है।
कांग्रेस की 150 से 200 सीटों की दावेदारी?
यूपी में कांग्रेस की ओर से ज्यादा सीटों की दावेदारी को लेकर पहले से ही चर्चा है। पार्टी के कुछ नेता 150 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं, जबकि गठबंधन में सीटों का वास्तविक बंटवारा अभी तय नहीं है। ऐसे में अखिलेश का 'सीट नहीं, जीत' वाला संदेश बातचीत की दिशा को प्रभावित कर सकता है। सपा अपने मजबूत क्षेत्रों को छोड़ने के बजाय जीत की संभावना और स्थानीय संगठन को आधार बनाकर सीटों का बंटवारा चाह सकती है। वहीं कांग्रेस अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों और मजबूत दावेदारों वाली सीटों पर ज्यादा हिस्सेदारी मांग सकती है।
यह भी पढ़ें: पबजी से प्यार, कोर्ट मैरिज और फर्जी पहचान; लखनऊ में बांग्लादेशी गिरफ्तार
मोना-मसूद की जोड़ी के सामने बड़ी परीक्षा
कांग्रेस ने हाल ही में संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए आराधना मिश्रा मोना को प्रदेश अध्यक्ष और सहारनपुर सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका सीट शेयरिंग के दौरान भी अहम हो सकती है।आराधना मिश्रा मोना कांग्रेस के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में शामिल हैं और प्रतापगढ़ समेत आसपास के इलाकों में उनकी सक्रियता रही है। वहीं इमरान मसूद पश्चिमी यूपी में कांग्रेस के प्रमुख मुस्लिम चेहरे हैं। सहारनपुर और आसपास के क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक पकड़ को कांग्रेस महत्वपूर्ण मानती है।गठबंधन में सीटों का बंटवारा होने पर दोनों नेताओं के सामने अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में कांग्रेस के लिए सीट हासिल करने की चुनौती होगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस दोनों के स्थानीय दावेदार कई सीटों पर सक्रिय हैं। ऐसे में सीट शेयरिंग के दौरान स्थानीय समीकरण और उम्मीदवार की स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है।इमरान मसूद के सामने खास तौर पर यह चुनौती होगी कि कांग्रेस को पश्चिमी यूपी में कितनी सीटें मिलती हैं और पार्टी किन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारती है। मुस्लिम, दलित और पिछड़े मतदाताओं के समीकरण वाले इलाकों में कांग्रेस अपने मजबूत दावेदारों के लिए सीट चाह सकती है।
संगठन और सीट बचाने की चुनौती
आराधना मिश्रा मोना के लिए भी सीट शेयरिंग आसान नहीं होगी। कांग्रेस को अपने मौजूदा नेताओं, संभावित उम्मीदवारों और पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाना होगा। अगर सपा जीत की संभावना को सीट बंटवारे का प्रमुख आधार बनाने पर जोर देती है तो कांग्रेस को अपने दावेदारों की जमीनी स्थिति और संगठन की ताकत के आधार पर बातचीत करनी होगी।
सपा और कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन के तहत मिलकर चुनाव लड़ा था। दोनों दलों के बीच तालमेल का असर चुनावी नतीजों में भी दिखाई दिया और विपक्षी खेमे का प्रदर्शन पहले के मुकाबले बेहतर रहा।इसके बाद भी दोनों दलों के बीच सीटों और संगठनात्मक ताकत को लेकर अलग-अलग मौकों पर मतभेद सामने आते रहे हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों के लिए ज्यादा बड़ा राजनीतिक मुकाबला होगा। सपा के सामने सत्ता में वापसी की कोशिश है, जबकि कांग्रेस यूपी में अपना संगठन और राजनीतिक आधार मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।
यह भी पढ़ें: क्या है योगी सरकार का 59 हजार करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट?
अखिलेश यादव के बयान से एक बात साफ है कि सपा सीटों की संख्या के बजाय जीत की संभावना को बातचीत का आधार बनाने की बात कर रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए चुनौती अपनी राजनीतिक जमीन, संगठन और मजबूत दावेदारों के आधार पर अधिक सीटों की मांग रखने की होगी।अब असली परीक्षा सीट शेयरिंग की बातचीत शुरू होने पर होगी। कितनी सीटें किसे मिलती हैं, किन सीटों पर कौन उम्मीदवार उतारता है और जीत की संभावना का फॉर्मूला किस तरह लागू होता है- यही सपा-कांग्रेस गठबंधन की अगली बड़ी सियासी तस्वीर तय करेगा।
