साल 1980 का दशक था। देश में राम जन्मभूमि आंदोलन की वैसी चर्चा नहीं थी, जैसे 1990 के दशक में। एक-एक समर्थन के लिए आंदोलनकारी संघर्ष कर रहे थे। ऐसे दौर में विनय कटियार ने सबसे पहले राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन छेड़ने वाले शुरुआती नेताओं में शुमार रहे हैं। विनय कटियार खुद कहते हैं कि जब अशोक सिंघल जैसे हिंदुत्ववादी नेता भी राम मंदिर की बात नहीं करते थे, तब विनय कटियार, लाठियां खाने के लिए तैयार थे। साल 1984 तक, विनय कटियार, हिंदुत्व के पोस्टर बॉय बन चुके थे। राम मंदिर आंदोलन का जिक्र हो और विनय कटियार का नाम न आए ऐसा हो नहीं सकता। राम मंदिर को लेकर वह तब भी जुनूनी थे, आज भी जुनूनी हैं। अब उन्हें राम मंदिर में हुई गहनों की चोरी खटक रही है।

विनय कटियार, बजरंग दल के संस्थापक नेताओं में से एक रहे है। 1984 में जब राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत हुई, संगठन को हिंदू युवाओं की जरूरत थी। आंदोलनकारियों को जरूरत महसूस हुई कि अगर धार्मिकता से युवा जुड़े नहीं तो आंदोलन का असफल होना तय है। फैसला हुआ बजरंग दल बनाते हैं, जिसका काम, राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन जुटाना है।

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विनय कटियार:-
रामजन्मभूमि की शर्त पर हम सरकार का लड्डू नहीं खाना चाहते हैं। हम सबकुछ कुर्बान कर सकते हैं। 1984 में मैंने राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत की थी। तब अशोक सिंघल भी नहीं थे।

बजरंग दल के नायक रहे हैं विनय कटियार 

बजरंग दल की स्थापना 8 अक्तूबर 1984 को अयोध्या में हुई। विश्व हिंदू परिषद, 'श्रीराम जानकी रथ यात्रा' निकाल रहा था। तत्कालीन सरकार ने सुरक्षा देने से इनकार कर दिया। बजरंग दल के युवाओं को जिम्मेदारी मिली। भगवान राम के लिए बजरंग दल की युवा टोली की अगुवाई विनय कटियार कर रहे थे।  

विनय कटियार के पास क्या-क्या पद रहे हैं?

विनय कटियार कई बार सांसद रहे। कभी वह राज्यसभा में रहे, कभी लोकसभा में। वह भारतीय जनता पार्टी के महासचिव भी रहे हैं। उनके पास उपाध्यक्ष का पद भी रहा है। साल 1970 तक वह अखिल भारतीय परिषद के महासचिव हो गए थे। वह कई हिंदूवादी संगठनों के संस्थापक रहे वह 1980 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के पूर्णकालिक सदस्य बने। उन्होंने हिंदू जागरण मंच की स्थापना की। वह राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख चेहरा रहे। साल 2002 से 2004 तक वह यूपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे। 

दरकिनार क्यों हुए?

विनय कटियार, बिना लाग लपेट के बोलने वाले नेता रहे हैं। वह पार्टी में चल रही गड़बड़ियों पर खुलकर बोलते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के करीबी रहे विनय कटियार, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी में फिट नहीं हो पाए। 
 

विनय कटियार को राम मंदिर में क्या खटकता है?

राम मंदिर निर्माण के लिए जो समिति बनी, उसमें विनय कटियार नहीं हैं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के ट्रस्टी भी विनय कटियार नहीं है। आज जिस ढांचे पर राम मंदिर बना है, वहां राम मंदिर कभी नहीं बन पाता, अगर विनय कटियार जैसे नेताओं ने राम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं लिया होता। विवादित ढांचा गिराने में वह 2 दशक मुकदमों और CBI जांच का सामना करते रहे। हैरान करने वाली बात यह है कि जब जनवरी 2024 में राम मंदिर बनकर तैयार हुआ तो विनय कटियार हाशिए पर पहुंच गए। विनय कटियार को यह बात खटकती भी रही। 

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नवंबर 2025 में राम मंदिर ध्वजारोहण था। विनय कटियार ने जाने से इनकार कर दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में झंडा फहराने आ रहे थे लेकिन विनय कटियार न प्रधानमंत्री से मिले, न ही झंडा फहराया। उन्होंने कहा कि वह आजादी के साथ काम करने वाली आदमी हैं, राम मंदिर बन गया है, अब वह वहां जाकर क्या करेंगे।

विनय कटियार:-
हम तो मंदिर जाते नहीं हैं। जब से मंदिर बना है, केवल एक बार हम मंदिर गए हैं। मेरे साथ बेटा भी था। मैंने उससे कहा तुम्हें जहां-जहां अच्छा लगता हो, देख लो। तो उसमें से एक ऐसे सज्जन बैठे हैं नीचे, हमसे पूछते हैं कि आपका पास कहां है? मने, जिसने सबकुछ करवाया, उसको भी नहीं जानते हो। बाकी के सब आते हैं, घर आते हैं हमारे, नहीं आते तो हम भी चले जाते हैं, व्यवहार ठीक नहीं था। इसलिए मैंने सोचा कि जब ऐसा व्यक्ति यहां रहेगा तो कुछ न कुछ गड़बड़ होगा। उसके 15 दिन बाद गड़बड़ी शुरू हो गई। जो चढ़ावा आत है, वह इतने दिनों में गायब है। भूमिका जिनकी रही होगी, हमें मालूम है। देश के प्रधानमंत्री ने तत्काल SIT लगा दी है। आज SIT घूम रही है, इसलिए हम यहां बैठे हैं, सुकून के साथ। लेकिन अगर पुराने लोग गड़बड़ करेंगे तो हम बर्दाश्त नहीं कर सकते है। 

विनय कटियार का राम मंदिर पर दर्द फूट पड़ता है। विनय कटियार कहते हैं कि राम मंदिर निर्माण होने के बाद वह सिर्फ 1 या 2 बार सिर्फ दर्शन करने गए हैं। एक बार मंदिर प्रशासन से जुड़े एक शख्स ने उनसे पास मांग लिया था। विनय कटियार कहते हैं, जिन्होंने मंदिर बनवाया, उन्हें ही लोग पहचानने से इनकार कर रहे हैं।

विनय कटियार का कहना है कि अब राम मंदिर का प्रशासन चोरों के भरोसे है। उन्हें चंपत राय नहीं पसंद हैं। उनका कहना है कि राम मंदिर के खजानों की खूब चोरी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में जो समिति बनी है, वह दूध का दूध और पानी का पानी अलग कर देगी। चोर पकड़े जाएंगे। विनय कटियार की नजरों में चंपत राय और नृपेंद्र मिश्रा खटक रहे हैं। 

हाशिए पर क्यों पहुंचे विनय कटियार?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी अब अटल और आडवाणी युग की छाया से निकल चुकी है। शुरुआत 2014 से ही हो गई थी। विनय कटियार, नए ढर्रे पर ढल नहीं पाए। 1990 के दशक में, जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने उफान पर था, तब विनय कटियार, उग्र हिंदुत्व वाले हिंदूवादी नेता की छवि में लोकप्रिय हो चुके थे। सड़कों पर भीड़ जुटाने में वह माहिर थे। 2004 तक उनका प्रभुत्व रहा, फिर 2014 आते-आते वह सक्रिय राजनीति से दूर होते चले गए। 


नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजपी ने अपना रंग बदला। पुराने नेताओं को साइडलाइन किया, दूसरे दलों से आए नेताओं को दल में तरजीह मिलने लगी। इसकी बानगी, मध्य प्रदेश से लेकर असम और अब पश्चिम बंगाल तक दिख रही है। विनय कटियार, धुर हिंदूवादी नेता थे, बीजेपी ने हिंदुत्व पर भी अपना रंग बदला है। विनय कटियार का राष्ट्रवाद, आधुनिक बीजेपी के राष्ट्रवाद से मैच नहीं कर पाया। 

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बीजेपी, अब अगली पीढ़ी के नेता तैयार कर रही है। विनय कटियार, कुर्मी समुदाय से आते हैं। इस समुदाय के कई नेता बीजेपी ने तैयार कर लिया है। बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल भी इसी दल से हैं। बीजेपी अब सामाजिक समीकरण बिठा रही है, पार्टी का फोकस हिंदुत्व है लेकिन जातिवादी हिंदुत्व पर भी शिफ्ट हुआ है। 

 

बीजेपी, समाजवादी पार्टियों की तरह अब सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले पर काम कर रही है, जिसमें भी विनय कटियार फिट नहीं हो पा रहे हैं। विनय कटियार की सियासत ही राम मंदिर पर टिकी थी, राम मंदिर निर्माण पूरा हो चुका है। बीजेपी ने उन्हें न लोकसभा में उतारा, न ही राज्यसभा भेज रही है। उन्हें न ही कोई संवैधानिक पद दे रही है। आंदोलन के नेताओं को बीजेपी, कब का पीछे छोड़ चुकी है। उनकी भूमिका मार्गदर्शक मंडल से भी अब बाहर जा चुकी है।

 

विनय कटियार के बोलने से खतरा क्या है?

विनय कटियार, राम मंदिर के दान को लेकर जितनी आलोचना कर रहे हैं, बीजेपी पर दबाव बढ़ रहा है। भले ही राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र न्यास, मंदिर का कामकाज और प्रशासन देखता हो लेकिन लोग ऐसा मानते हैं कि अयोध्या के मंदिर के कामकाज से लेकर ट्रस्ट तक में जो भी काम होता है, बीजेपी के इशारे पर ही होता है। विनय कटियार, जितना आक्रामक होकर बोलेंगे, विपक्ष को बीजेपी के खिलाफ बोलने का मौका मिलेगा।

 

विनय कटियार, चंपत राय और पूरे प्रंबंधन को चोर बता चुके हैं। उन्होंने गोपाल और नृपेंद्र मिश्रा तक की भूमिका को संदिग्ध बताया है। राम मंदिर में करोड़ों की चोरी हुई है, जिसे लेकर विनय कटियार, चंपत राय और दूसरे पदाधिकारियों पर शक जता रहे हैं। उनका कहना है कि ये सब चोर है, इन्हें बाहर करने की जरूरत है। अब विपक्ष के लोग, विनय कटियार के बयानों को कोट करके बीजेपी सरकार को घेर रहे हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर चंपत राय के करीबी फंस गए हैं तो अब तक ट्रस्ट में उनके बने रहने का क्या कारण है। पूरा ट्रस्ट भंग करके नए पदाधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए।