आज देवशयनी एकादशी का पर्व है। सनातन धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भक्त इस दिन व्रत रखता है, सच्चे मन से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करता है और व्रत कथा पढ़ता या सुनता है, उसे न केवल भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है, बल्कि अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिलती है। साथ ही भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।


इसी व्रत के बारे में एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था कि देवशयनी एकादशी का क्या महत्व है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि यह सभी एकादशी व्रतों में श्रेष्ठ है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में भक्त देवशयनी एकादशी का व्रत रखते हैं।

 

धार्मिक जानकारों के अनुसार, जिन लोगों ने देवशयनी एकादशी का व्रत रखा लेकिन व्रत कथा नहीं पढ़ी या सुनी, उनका व्रत अधूरा माना जाता है। ऐसे में भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण नहीं होतीं। इसलिए इस दिन व्रत के साथ व्रत कथा पढ़ना या सुनना भी बेहद जरूरी माना गया है। अब सवाल उठता है कि देवशयनी एकादशी की व्रत कथा क्या है? आइए जानते हैं।

 

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देवशयनी एकादशी व्रत कथा

 

कथा के अनुसार, प्राचीन समय में मांधाता नाम के एक राजा थे। वे अपनी प्रजा के हितों की रक्षा करते थे और राज्य के लोगों के कल्याण के लिए कार्य करते थे। उनके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था। हालांकि, एक बार उनके राज्य में लगातार तीन सालों तक बारिश नहीं हुई। बारिश न होने के कारण पूरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। लोग अन्न और जल के लिए तरसने लगे। अन्न और जल की कमी के कारण लोगों ने हवन, यज्ञ और पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठान भी करना छोड़ दिए। 

 

राज्य की ऐसी स्थिति देखकर राजा मांधाता बहुत दुखी और चिंतित हो गए। वे लगातार सोचने लगे कि इस समस्या का समाधान कैसे निकाला जाए। काफी विचार-विमर्श करने के बाद वे समाधान की खोज में जंगल की ओर निकल पड़े।

 

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जब राजा मांधाता घोड़े पर सवार होकर जंगल में घूम रहे थे, तब उन्हें ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि अंगिरा का आश्रम दिखाई दिया। वे तुरंत आश्रम पहुंचे और हाथ जोड़कर बोले, 'हे ऋषिवर मैं सदैव धर्म का पालन करता हूं, फिर भी मेरे राज्य में पिछले तीन साल से बारिश नहीं हुई है। कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए, जिससे मेरे राज्य में फिर से बारिश हो और अकाल समाप्त हो जाए।'

 

तब महर्षि अंगिरा ने कहा, 'हे राजन आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली देवशयनी एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से भक्तों को पापों से मुक्ति मिलती है। आप अपने राज्य के सभी लोगों के साथ मिलकर देवशयनी एकादशी का व्रत रखें और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करें। इससे आपके राज्य की सभी परेशानियां दूर हो जाएंगी।' महर्षि अंगिरा से उपाय जानने के बाद राजा मांधाता अपने राज्य लौट आए। जब देवशयनी एकादशी का दिन आया, तब राजा ने पूरी प्रजा के साथ मिलकर व्रत रखा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की। व्रत के प्रभाव से राज्य में अच्छी बारिश हुई, चारों ओर हरियाली छा गई और राज्य से अकाल समाप्त हो गया।

 

नोट- यह कथा धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। खबरगांव इसकी पुष्टि नहीं करता है।