इस साल 20 अक्टूबर को दशहरा पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन जहां एक तरफ भगवान राम की आराधना की जाती है, वहीं दूसरी तरफ शाम के वक्त रावण का पुतला जलाने की परंपरा निभाई जाती है। यह परंपरा हर साल निभाई जाती है। धार्मिक जानकारों के अनुसार, रावण दहन की परंपरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इसके आलावा क्या आपको पता है कि रावण का पुतला जलाने का विधान किसी धर्म ग्रंथ में नहीं बताया गया है, यानी रावण दहन एक परंपरा है, जिसे पिछले कई सालों से लोग निभा रहे हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, रावण की मृत्यु के बाद भगवान राम ने कहा था कि मृत्यु के बाद बैर यानी दुश्मनी खत्म हो जाती है। इस प्रकार रावण की मृत्यु के बाद भगवान राम और रावण के बीच बैर खत्म हो चुका था।
पिछले कई सालों से लाखों लोग रावण का पुतला जलाते हैं, जबकि रावण की मृत्यु हजारों साल पहले हो चुकी थी। ऐसे में सवाल उठता है कि रावण का पुतला जलाने का महत्व क्या है? इसके साथ ही सवाल उठता है कि रावण की मृत्यु के बाद भगवान राम ने क्या कहा था, जिस संदेश को हमें आज भी अपनाना चाहिए। आइए जानते हैं।
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मृत्यु के बाद बैर हो जाता है खत्म
धार्मिक ग्रंथ वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में रावण की मृत्यु के बाद की परिस्थिति का जिक्र किया गया है। जब रावण के वध के बाद उसकी मृत्यु हो जाती है, तब विभीषण शोक में थे, लेकिन रावण का अंतिम संस्कार करने से पहले हिचकिचा रहे थे। तब भगवान राम ने विभीषण से कहा कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद दुश्मनी और बैर खत्म हो जाता है। इसलिए रावण का अंतिम संस्कार करने में उन्हें हिचकिचाना नहीं चाहिए।
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव॥
इस श्लोक के जरिए बताया गया है कि भगवान राम ने विभीषण से कहा कि बैर केवल मृत्यु तक रहता है। मृत्यु के बाद सभी प्रकार के बैर खत्म हो जाते हैं। इसलिए अब रावण का विधिवत अंतिम संस्कार करो। इस श्लोक से साफ होता है कि भगवान राम ने स्वयं रावण के प्रति वैर खत्म कर दिया था। इसके बावजूद आज भी लोग रावण का पुतला जलाते हैं।
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हर साल क्यों जलाते हैं रावण?
रावण का पुतला हर साल सिर्फ इसलिए नहीं जलाया जाता है क्योंकि उसने भगवान राम को परेशान किया था। रावण का पुतला जलाने का अर्थ है अपने मन की बुराइयों को खत्म करना, जो व्यक्ति को अच्छे कर्म करने से रोकती हैं। इसके साथ ही रावण इस बात का प्रतीक है कि चाहे बुराई कितनी ही बलशाली क्यों न हो, वह एक न एक दिन अच्छाई के आगे हार ही जाती है।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।
