सावन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह तिथि भगवान शिव को प्रिय है। इस वजह से इसी तिथि पर शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। इस साल 11 अगस्त को सावन महीने का शिवरात्रि पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन लाखों कांवड़िए शिवलिंग पर जलाभिषेक कर रहे हैं। साथ ही लाखों शिव भक्त जलाभिषेक कर रहे हैं। इसके साथ ही लाखों भक्त व्रत रखते हैं। व्रत रखने के साथ ही भक्तों को व्रत कथा सुननी चाहिए, इसके बगैर व्रत अधूरा माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, सावन की शिवरात्रि पर जो भी भक्त व्रत रखते हैं, न सिर्फ भगवान शिव का आशीर्वाद मिलता है, बल्कि उन भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। सावन शिवरात्रि के दिन भक्तों को जलाभिषेक करना चाहिए और भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करनी चाहिए। आइए जानते हैं शिवरात्रि की व्रत कथा क्या है?
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क्या है व्रत की कथा?
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था, जो परिवार के पालन-पोषण के लिए जानवरों की हत्या करता था। एक बार चित्रभानु ने एक साहूकार से कर्ज लिया था। कर्ज के रुपये न लौटा पाने के कारण साहूकार ने उसे बंधक बना लिया। साहूकार ने चित्रभानु को शिव मंदिर में ही बंद करके रखा था। इसी दिन सावन महीने की शिवरात्रि थी, तो चित्रभानु ने मंदिर में भगवान शिव की आराधना की। चित्रभानु ने भगवान शिव की सच्चे मन से आराधना की और पूरी रात भजन-कीर्तन करता रहा। उस समय वह भूखा-प्यासा था। इसी तरह उसने जाने-अनजाने में शिवरात्रि का व्रत रख लिया।
इसके अगले सुबह साहूकार मंदिर में आया और चित्रभानु को छोड़ दिया। जिसके बाद चित्रभानु वापस जंगल की ओर गया, ताकि अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए जानवरों का शिकार कर सके। वह पूरे दिन जंगल में भटकता रहा लेकिन उसे पूरे दिन कोई शिकार नहीं मिला। थक-हारकर चित्रभानु जंगल में ही एक बेलपत्र के पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ के ठीक नीचे शिवलिंग विराजमान था। पेड़ के बेलपत्र हवाओं के साथ शिवलिंग पर गिर रहे थे। इस तरह चित्रभानु ने अनजाने में ही भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ा दिया।
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उस रात चित्रभानु जंगल में ही रहा, जहां एक बार गर्भवती हिरणी पानी पीने के लिए आई। तब चित्रभानु ने हिरणी का शिकार करने की कोशिश की, तो हिरणी विनती करने लगी कि वह गर्भवती है, इसलिए उसे न मारा जाए। तो चित्रभानु ने उसे छोड़ दिया। जब दूसरी बार हिरणी ने चित्रभानु को देखा, तो हिरणी ने कहा कि वह पहले अपने पति से मिलकर वापस आ जाएगी। यह बात सुनकर चित्रभानु ने उसे छोड़ दिया। इसके बाद एक हिरण अपने बच्चों के साथ आया, तो चित्रभानु ने उनका भी शिकार नहीं किया। इससे साफ होता है कि चित्रभानु का हृदय पिघल चुका था और वह अब शिकार छोड़ चुका था।
इसके बाद वह ईमानदारी से मेहनत करके जीवन जीने लगा, जिससे उसका कर्ज भी उतर गया। जब उसके जीवन की अंतिम घड़ी आई, तो यमराज उसके पास आए। तब भगवान शिव के दूतों ने चित्रभानु को शिवलोक ले गए क्योंकि उसने अनजाने में शिवरात्रि का व्रत किया था। इसी वजह से उसे मोक्ष मिला।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।
