बिहार में विकास परियोजनाओं के लिए चल रही भू-अर्जन प्रक्रिया में तेजी लाई जाएगी। इससे जुड़ी सामाजिक और व्यावहारिक अड़चनों को भी दूर किया जाएगा। राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने सभी जिलों से भू-अर्जन के दौरान सामने आने वाली 10 प्रमुख समस्याओं की जानकारी मांगी है। इन समस्याओं का संस्थागत स्तर पर अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद उनके व्यावहारिक समाधान के लिए कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने कहा कि भू-अर्जन को सिर्फ जमीन अधिग्रहण तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इससे प्रभावित परिवारों, उनकी आजीविका, सामुदायिक संपत्तियों और सामाजिक प्रभाव का भी आकलन जरूरी है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के भू-अर्जन निदेशालय की बैठक में मंत्री ने कहा कि विकास परियोजनाओं को गति देना जरूरी है। साथ ही प्रभावित लोगों की भावनाओं और सामाजिक हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। बैठक में राज्य के प्रमुख सामाजिक अध्ययन और प्रबंधन संस्थानों के प्रतिनिधि ने हिस्सा लिया। एलएन मिश्रा आर्थिक अध्ययन एवं सामाजिक परिवर्तन संस्थान, एएन सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान, चन्द्रगुप्त प्रबंधन संस्थान, एडीआरआई और विकास प्रबंधन संस्थान के विशेषज्ञ भी मौजूद रहे। बैठक में सामाजिक प्रभाव आकलन में विशेषज्ञ संस्थानों की भूमिका बढ़ाने पर चर्चा हुई। भू-अर्जन के दौरान आने वाली व्यावहारिक समस्याओं पर भी मंथन किया गया।
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मंत्री ने दिए सभी जिलों के भू-अर्जन पदाधिकारियों को निर्देश
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के भू-अर्जन निदेशालय की अहम बैठक हुई। इसकी अध्यक्षता राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री ने की। बैठक में भू-अर्जन की धीमी गति और विवादों को लेकर चिंता जताई गई। मंत्री ने कहा कि राज्य में कई बड़ी विकास परियोजनाएं भू-अर्जन में देरी के कारण अटकी हैं। सड़क, रेल, उद्योग और अन्य परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण में कई तरह की समस्याएं आ रही हैं। कहीं किसान मुआवजे से नाखुश हैं तो कहीं सामाजिक विवाद बाधा बन रहे हैं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार ने नई पहल शुरू की है।
मंत्री ने निर्देश दिया कि सभी जिलों से भू-अर्जन के दौरान सामने आने वाली 10 प्रमुख समस्याओं की सूची मंगाई जाए। हर जिले के भू-अर्जन पदाधिकारी को अपनी 10 बड़ी समस्याएं भेजनी होंगी। इन समस्याओं का विशेषज्ञ संस्थानों द्वारा अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद समाधान के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि भू-अर्जन को केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं समझा जाना चाहिए। यह एक सामाजिक प्रक्रिया भी है। जमीन अधिग्रहण से सिर्फ जमीन नहीं जाती। इससे परिवारों की आजीविका, सामुदायिक संपत्तियां और सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित होता है। इसलिए सामाजिक प्रभाव का आकलन जरूरी है।
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सचिव जय सिंह ने कहा कि बैठक का मुख्य उद्देश्य भू-अर्जन की कार्रवाई में तेजी लाना और विवादों को कम करना है। इससे विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में गति आएगी। प्रभावित लोगों की समस्याओं के समाधान का रास्ता भी अधिक प्रभावी होगा। भू-अर्जन निदेशालय के निदेशक कमलेश सिंह और सहायक निदेशक आजीव वत्सराज ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि अलग-अलग जिलों में किस तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं।
मुआवजे से असंतुष्ट किसानों से सीधा संवाद
मंत्री ने कहा कि विकास परियोजनाओं को गति देने के साथ प्रभावित लोगों की भावनाओं और सामाजिक हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने प्रभावित परिवारों की संख्या और उनकी आजीविका का अध्ययन करने का निर्देश दिया। सामुदायिक संपत्तियों और परियोजना के सामाजिक प्रभाव का भी आकलन किया जाएगा। अब तक भू-अर्जन में जमीन की कीमत और मुआवजे पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था। अब सामाजिक प्रभाव को भी देखा जाएगा। कितने परिवार बेघर हो रहे हैं और उनकी रोजी-रोटी पर क्या असर पड़ रहा है, इसका आकलन होगा। गांव की सामुदायिक जमीन, स्कूल, आंगनबाड़ी और तालाब पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देखा जाएगा।
मंत्री ने भू-अर्जन से नाखुश किसानों से सीधे संवाद करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कई बार किसान मुआवजे की राशि से असंतुष्ट होते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी जमीन कम कीमत पर ली जा रही है। कई बार जमीन के कागजात में गड़बड़ी या वंशावली विवाद के कारण भी भू-अर्जन में देरी होती है। इन समस्याओं के वास्तविक कारणों को समझने के लिए किसानों से सीधे बातचीत की जाए। अधिकारी खेत पर जाकर किसानों से मिलें और उनकी आपत्तियां सुनें। समस्याओं के कारणों का अध्ययन कर उसके आधार पर समाधान की कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि अगर किसी विकास परियोजना के निर्माण में कोई धार्मिक स्थल बाधा बन रहा है और स्थानीय समाज उसके स्थानांतरण के लिए सहमत है, तो नियमानुसार उचित सेटलमेंट, पुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। कई बार सड़क या नहर के रास्ते में मंदिर, मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थल आ जाते हैं। इससे परियोजना रुक जाती है। ऐसे मामलों में स्थानीय लोगों की सहमति से धार्मिक स्थल को दूसरी जगह स्थापित करने पर विचार किया जाएगा। इसके लिए उचित मुआवजे की व्यवस्था भी की जा सकती है। इस संबंध में जरूरी प्रस्ताव केंद्र सरकार के संबंधित विभागों को भी भेजे जाएंगे।
सामाजिक प्रभाव का होगा आकलन
बैठक में भू-अर्जन के दौरान आने वाली व्यावहारिक समस्याओं पर विस्तार से चर्चा हुई। विभिन्न परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं पर भी मंथन किया गया। विशेषज्ञ संस्थानों के अनुभव और अध्ययन का उपयोग भू-अर्जन की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और जनता को केंद्र में रखकर बनाने पर जोर दिया गया। एलएन मिश्रा आर्थिक अध्ययन एवं सामाजिक परिवर्तन संस्थान, एएन सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान, चन्द्रगुप्त प्रबंधन संस्थान, एडीआरआई और विकास प्रबंधन संस्थान के प्रतिनिधियों ने बैठक में हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि सामाजिक अध्ययन के जरिए विवादों को किस तरह कम किया जा सकता है। विशेषज्ञ संस्थानों की मदद से भू-अर्जन की प्रक्रिया में आने वाली समस्याओं की पहचान और उनके समाधान पर भी चर्चा हुई।
