NEET समेत प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक को लेकर देशभर में उठे सवालों और केंद्र सरकार की सख्ती के बीच उत्तर प्रदेश का करीब 20 साल पुराना रेलवे ग्रुप-डी पेपर लीक मामला फिर चर्चा में है। इस मामले में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के विधायक बेदी राम और निषाद पार्टी विधायक विपुल दुबे आरोपी हैं। दोनों के खिलाफ गैंगस्टर ऐक्ट के तहत भी कार्रवाई हो चुकी है। खास बात यह है कि इस मामले में वर्ष 2006 में कार्रवाई उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने की थी। करीब दो दशक बाद भी मुकदमा अदालत में विचाराधीन है।
इस मामले की चर्चा उस समय फिर तेज हुई जब पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने पुराने रेलवे पेपर लीक प्रकरण को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजकर मामले की ओर ध्यान आकर्षित किया। अब नए पेपर लीक कानून में समयबद्ध कार्रवाई और सुनवाई की बात के बीच यह मामला न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार पर भी सवाल खड़ा कर रहा है।
STF ने पकड़ा था पेपर लीक का खेल
फरवरी 2006 में रेलवे ग्रुप-डी की परीक्षा होनी थी। परीक्षा से ठीक पहले पेपर लीक होने की सूचना सामने आई। इसके बाद एसटीएफ ने कार्रवाई करते हुए कथित तौर पर पेपर की प्रतियां बरामद कीं और आरोपियों को गिरफ्तार किया। मामले के चलते रेलवे की परीक्षा रद्द करनी पड़ी।इस प्रकरण में लखनऊ के कृष्णानगर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। जांच आगे बढ़ी तो बेदी राम और विपुल दुबे समेत कई लोगों के नाम सामने आए। आरोप था कि पूरा नेटवर्क रेलवे भर्ती परीक्षा का पेपर लीक कराने और अभ्यर्थियों को उपलब्ध कराने से जुड़ा था।
यह भी पढ़ें: भरत तिवारी को गोली मारने वाला STF जवान अक्षय कुमार गिरफ्तार
बेदी राम का नाम केवल 2006 के रेलवे ग्रुप-डी पेपर लीक मामले तक सीमित नहीं रहा है। इनमें रेलवे ग्रुप-डी, रेलवे लोको पायलट, भोपाल और जयपुर रेलवे भर्ती, मध्य प्रदेश पीसीएस, मध्य प्रदेश की आयुर्वेद भर्ती परीक्षा और छत्तीसगढ़ सीपीएमटी जैसे मामले शामिल बताए गए हैं। इनमें कुछ मामले उत्तर प्रदेश से बाहर के राज्यों में दर्ज हुए। मध्य प्रदेश में परीक्षा से जुड़े मामलों में एसटीएफ की कार्रवाई का उल्लेख मिलता है जबकि छत्तीसगढ़ सीपीएमटी प्रकरण में जांच एजेंसियों की कार्रवाई की बात सामने आई थी।
मामला आगे बढ़ने के साथ बेदी राम और विपुल दुबे समेत आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की गई। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद मुकदमा लखनऊ की एमपी-एमएलए अदालत पहुंचा। जुलाई 2024 में अदालत ने आरोपियों की डिस्चार्ज अर्जियां खारिज करते हुए मामले में आरोप तय किए। उसी दौरान अदालत में उपस्थित न होने पर दोनों विधायकों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी होने की बात भी सामने आई थी। बाद में दोनों ने अदालत में सरेंडर किया और उन्हें राहत मिली।
यह भी पढ़ें: CJP के प्रदर्शन में छात्रों से मारपीट भारी पड़ी, सत्यम पंडित पर लगेगा गुंडा ऐक्ट
क्या बोले विपुल दूबे?
मामले में आरोपी विधायक विपुल दुबे से जब उनके खिलाफ चल रहे पुराने पेपर लीक प्रकरण को लेकर प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने कहा कि मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए वह इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। विपुल दुबे के इस बयान के बाद भी यह स्पष्ट है कि 2006 का रेलवे ग्रुप-डी मामला अभी कानूनी प्रक्रिया में है और अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है।
पेपर लीक पर केंद्र और राज्य सरकारों की सख्ती के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुराने मामलों पर नए कानून की कठोर सजा लागू होगी या नहीं? कानूनी जानकारों के मुताबिक, संविधान का अनुच्छेद 20(1) किसी व्यक्ति को उस अपराध के समय लागू कानून से अधिक कठोर दंड दिए जाने से सुरक्षा देता है। यानी यदि कोई अपराध पुराने कानून के तहत हुआ है और बाद में कानून बदलकर सजा बढ़ा दी जाती है तो बढ़ी हुई सजा को पिछली तारीख से पुराने अपराध पर लागू नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, नया कानून लागू होने के बाद होने वाली घटनाओं पर नए कानून के प्रावधान लागू होंगे। इसलिए पुराने रेलवे ग्रुप-डी मामले और भविष्य में होने वाले पेपर लीक मामलों की कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।
यह भी पढ़ें: 'PhD की लड़की से अफेयर है...', IIT के प्रोफेसर पर उनकी पत्नी ने लगाए आरोप
20 साल में अब तक क्या निकला?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि फरवरी 2006 में एसटीएफ की कार्रवाई से शुरू हुआ मामला करीब दो दशक बाद भी अंतिम फैसले तक क्यों नहीं पहुंच पाया। जिस समय रेलवे ग्रुप-डी का पेपर लीक हुआ था, उस समय के आरोपी आज राजनीति में सक्रिय हैं और विधायक हैं।बेदी राम वर्तमान में गाजीपुर की जखनियां विधानसभा सीट से सुभासपा विधायक हैं, जबकि विपुल दुबे भदोही की ज्ञानपुर विधानसभा सीट से निषाद पार्टी के विधायक हैं।एक तरफ सरकार पेपर लीक रोकने के लिए कठोर कानून, तेज जांच और समयबद्ध सुनवाई की व्यवस्था की बात कर रही है।
दूसरी तरफ 2006 का यह मामला सवाल खड़ा करता है कि पेपर लीक पर कानून सख्त होने के साथ क्या पुराने मामलों में भी न्याय की रफ्तार तेज होगी?फिलहाल बेदी राम और विपुल दुबे के खिलाफ 2006 के मामले में आरोप तय हो चुके हैं, लेकिन दोष सिद्ध नहीं हुआ है। मामले की सुनवाई जारी है और अंतिम फैसला अदालत को करना है।
