छात्रसंघ बहाल करने की लड़ाई में दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों को जीत मिली है। छात्रों ने लंबे समय तक भूख हड़ताल की। इसके बाद जामिया प्रशासन ने स्टूडेंट यूनियन के संविधान को बहाल करने का फैसला लिया। यहां अगले सत्र की शुरुआत यानी 16 जुलाई 2027 से छह सप्ताह के भीतर चुनाव कराए जाएंगे। वहीं, उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी छात्रसंघ बहाल करने के लिए छात्रों ने प्रदर्शन किया था। इसके बाद प्रशासन ने चुनाव कराने का फैसला लिया। यहां 5 नवंबर को चुनाव कराए जाएंगे।दोनों विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ बहाल होने के बाद अब दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र भी चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं।

 

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से लेकर लखनऊ विश्वविद्यालय तक, कहीं करीब तीन दशक से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए तो कहीं एक दशक से ज्यादा समय बीत चुका है। कुछ विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद बनाने की व्यवस्था भी लागू की गई। हालांकि, विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव न होने से छात्र असंतुष्ट हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश में उन विश्वविद्यालयों की नजर डालते हैं जहां सालों से छात्रसंघ के चुनाव बंद हैं। यहां छात्रसंघ बहाल करने मांग समय-समय पर उठती रहती है। 

BHU: करीब 30 साल से नहीं हुए चुनाव

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में करीब 30 साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। यहां आखिरी बार 1996-97 में चुनाव हुए थे। हालांकि, इन चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। 'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा की वजह एक उम्मीदवार मनोज सिंह का नामांकन रद्द किया जाना था। नामांकन रद्द होने के बाद छात्रसंघ चुनाव के दौरान जमकर बवाल हुआ।

 

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इस हिंसा से जुड़ा मामला साल 2016 में इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा था। अदालत में हुई सुनवाई के रिकॉर्ड से हिंसा के स्तर का पता चलता है। रिकॉर्ड के मुताबिक, परिसर में बड़े पैमाने पर पथराव हुआ था। देसी बम फेंके गए थे। बंदूक और पिस्तौल से भी गोली चलाई गई थी। इस दौरान पुलिस अधिकारी जय प्रकाश मिश्रा की आंख में चोट लगी थी।

 

इसके बाद कई साल तक विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। साल 2011-12 में BHU प्रशासन ने छात्र परिषद बनाई। इसमें छात्रों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार था। लेकिन यह पुराने छात्रसंघ जैसी व्यवस्था नहीं थी। यह व्यवस्था ज्यादा समय तक नहीं चली। साल 2014 में एक बार फिर छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग उठने लगी। इसी साल छात्रों ने तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी का काफिला भी रोक दिया था। आज भी BHU में समय-समय पर छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग उठती रहती है।

 

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लखनऊ विश्वविद्यालय: 2005 के बाद से इंतजार

उत्तर प्रदेश की राजधानी में स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय में आखिरी बार साल 2005 में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। अगले साल यानी 2006 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें लागू कीं। इन सिफारिशों के तहत 25 साल से अधिक उम्र के छात्रों के चुनाव लड़ने पर रोक थी। आपराधिक रिकॉर्ड वाले छात्रों के चुनाव लड़ने पर भी रोक लगाई गई थी।

 

इन नियमों का छात्रों ने विरोध किया। धीरे-धीरे यह विरोध हिंसा में बदल गया। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान हुई हिंसा में दो छात्रों की मौत हो गई थी। कैंपस में इतनी तोड़फोड़ हुई कि तत्कालीन कुलपति ने विश्वविद्यालय को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का फैसला लिया। इसके बाद से विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। साल 2012 में भी चुनाव कराने की कोशिश हुई। लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण चुनाव नहीं हो पाए। इसके बाद से छात्र लगातार चुनाव बहाल करने की मांग कर रहे हैं।

 

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय: छात्रसंघ की जगह बनी छात्र परिषद

प्रयागराज के इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आखिरी बार साल 2018 में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। साल 2019 में प्रशासन ने छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद बनाने का प्रस्ताव पास किया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशासन ने इसके पीछे कई कारण बताए थे। इनमें छात्रसंघ से जुड़ी प्रतिद्वंद्विता के कारण हुई तीन हत्याएं, हॉस्टल के कमरों पर अवैध कब्जा और तोड़फोड़ जैसी घटनाएं शामिल थीं। साल 2018 में छात्रसंघ चुनाव जीतने वाले उदय प्रकाश यादव के हॉस्टल के कमरे में आग लगा दी गई थी। इस घटना के बाद कैंपस में तनाव बढ़ गया था। इन घटनाओं को देखते हुए प्रशासन ने छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद बनाने का फैसला लिया। हालांकि, छात्र लगातार पुरानी व्यवस्था बहाल करने की मांग कर रहे हैं।

 

जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में छात्रों की मांग पूरी होने के बाद अब उत्तर प्रदेश के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग तेज हो सकती है।