बिहार विधान परिषद चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, राष्ट्रीय जनता दल के भीतर उम्मीदवार चयन को लेकर हलचल तेज होती जा रही है। नामांकन की प्रक्रिया शुरू हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक पार्टी ने अपने उम्मीदवार के नाम पर मुहर नहीं लगाई है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष या एनडीए नहीं, बल्कि अपनी ही राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाने की है।
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव इन दिनों सिंगापुर में हैं, जबकि पटना में पार्टी की कमान प्रभावी रूप से नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव संभाल रहे हैं। ऐसे में विधान परिषद की संभावित एकमात्र सीट के लिए उम्मीदवार चुनने की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर आ गई है। यही वजह है कि पार्टी के भीतर चल रही हर चर्चा का केंद्र तेजस्वी यादव बन गए हैं।
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एक सीट, कई दावेदार
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस सीट के लिए कई नामों पर विचार किया जा रहा है। पार्टी के भीतर एक वर्ग चाहता है कि लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे वरिष्ठ नेताओं को मौका मिले, जबकि कुछ लोग सामाजिक और पारिवारिक समीकरणों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहते।
सूत्रों के मुताबिक पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम का नाम गंभीरता से चर्चा में है। अनुसूचित जाति समाज से आने वाले शिवचंद्र राम को मौका देकर राजद सामाजिक न्याय और वंचित समाज प्रतिनिधित्व का मजबूत संदेश देने की रणनीति अपना सकती है। दूसरी ओर, निवर्तमान एमएलसी सुनील सिंह भी दावेदारों की सूची में बने हुए हैं। संगठन में उनकी सक्रिय भूमिका और लंबे राजनीतिक अनुभव को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
परिवार की पसंद बनाम संगठन की जरूरत
राजद के भीतर सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या पार्टी इस सीट पर किसी पारिवारिक चेहरे को आगे बढ़ाएगी या फिर संगठन के पुराने और समर्पित नेताओं पर भरोसा जताएगी।
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यही वह मोड़ है, जहां तेजस्वी यादव को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों तरह के संतुलन की परीक्षा देनी पड़ रही है। एक तरफ परिवार की अपेक्षाएं हैं तो दूसरी तरफ पार्टी के कार्यकर्ताओं और सामाजिक आधार को मजबूत करने की जरूरत है।
ओवैसी की पार्टी ने भी बढ़ाया दबाव
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एआईएमआईएम ने भी राजद के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पार्टी ने दावा किया है कि पिछले राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन का साथ देने के बदले उसे भविष्य में राजनीतिक सहयोग का आश्वासन मिला था। अब एआईएमआईएम इस सीट पर अपने लिए समर्थन की मांग कर रही है। हालांकि राजद के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। पहले से सीमित राजनीतिक संभावनाओं के बीच सहयोगी दल को सीट देना पार्टी के भीतर असंतोष भी पैदा कर सकता है।
क्यों अहम है यह फैसला?
विधान परिषद की यह सीट केवल एक राजनीतिक पद नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजद की रणनीति का संकेत भी मानी जा रही है। उम्मीदवार का चयन यह बताएगा कि पार्टी सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता देती है, संगठन के वफादार नेताओं को सम्मान देना चाहती है या फिर गठबंधन राजनीति को मजबूत करने का रास्ता चुनती है।
निगाहें अब तेजस्वी पर
फिलहाल इतना तय है कि अंतिम फैसला तेजस्वी यादव को ही लेना है। उम्मीदवार चाहे शिवचंद्र राम हों, सुनील सिंह हों या कोई और चेहरा, इस निर्णय का असर सिर्फ विधान परिषद चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। यह फैसला आने वाले दिनों में राजद की राजनीतिक दिशा और नेतृत्व की शैली को भी परिभाषित करेगा। राजद की एक सीट पर चल रही यह रस्साकशी अब बिहार की राजनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय बन चुकी है और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि तेजस्वी यादव आखिर किस नाम पर अंतिम मुहर लगाते हैं।
