उत्तर प्रदेश की सहकारी ऋण व्यवस्था की एक बड़ी खामी मेरठ और बागपत में सामने आई है। यहां हजारों ऐसे किसान हैं जो वर्षों पहले दुनिया छोड़ चुके हैं लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में आज भी कर्जदार बने हुए हैं। उनके नाम हर साल सहकारिता विभाग की ओर से बकाया वसूली के नोटिस जारी किए जा रहे हैं। दूसरी ओर, उनकी जमीन, मकान और दूसरी संपत्तियों का मालिकाना हक बेटों, बेटियों और अन्य उत्तराधिकारियों के नाम दर्ज हो चुका है। यही कारण है कि विभाग 55 करोड़ रुपये से अधिक की बकाया राशि की वसूली के लिए लगातार मशक्कत कर रहा है।

 

जिला सहकारी बैंक लिमिटेड और सहकारिता विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मेरठ और बागपत के 6,343 दिवंगत किसानों पर 55.14 करोड़ रुपये का सहकारी ऋण बकाया है। इन किसानों ने जीवित रहते सहकारी समितियों से खाद, बीज और कृषि उपकरणों के लिए ऋण लिया था, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी ऋण का निस्तारण नहीं हो सका।

हर साल निकल रहा नोटिस, मुनादी तक करानी पड़ी

सहकारिता विभाग के अनुसार बकाया वसूली के लिए दिवंगत किसानों के नाम नोटिस जारी किए जा रहे हैं। कई मामलों में गांवों में मुनादी भी कराई जा चुकी है लेकिन इसके बावजूद ऋण का निपटारा नहीं हो पाया। विभाग के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि रिकॉर्ड में कर्जदार मृत किसान हैं जबकि उनकी संपत्ति के मालिक उत्तराधिकारी बन चुके हैं। ज्यादातर मामलों में मृत किसानों की कृषि भूमि और दूसरी संपत्तियों का नामांतरण वारिसों के नाम हो चुका है। इसके बावजूद सहकारी ऋण का रिकॉर्ड अपडेट नहीं कराया गया।

 

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विभागीय अधिकारियों का कहना है कि उत्तराधिकारी संपत्ति का अधिकार तो ले रहे हैं, लेकिन ऋण की जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं। इसी वजह से करोड़ों रुपये की वसूली वर्षों से अधर में लटकी हुई है।

55.14 करोड़ रुपये की वसूली फंसी

आंकड़ों के मुताबिक मेरठ जिले के 4,990 किसानों पर 43.59 करोड़ रुपये और बागपत जिले के 1,353 किसानों पर 11.55 करोड़ रुपये का बकाया दर्ज है। दोनों जिलों को मिलाकर 6,343 दिवंगत किसानों पर 55.14 करोड़ रुपये का सहकारी ऋण अभी तक वसूल नहीं हो सका है। इस दौरान ब्याज लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे बकाया राशि और अधिक बढ़ने की आशंका है।

 

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मृत्यु के साथ खत्म नहीं होता सहकारी लोन

सहकारिता विभाग का कहना है कि किसान की मृत्यु होने पर जिला सहकारी बैंक या सहकारी समिति का ऋण स्वतः समाप्त या माफ नहीं होता। यदि मृतक किसान की संपत्ति उसके उत्तराधिकारियों को मिल चुकी है, तो नियमानुसार उसी संपत्ति की सीमा तक बकाया ऋण की वसूली की जा सकती है। इसलिए परिवार को संबंधित सहकारी समिति में मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार संबंधी दस्तावेज जमा कर रिकॉर्ड अपडेट कराना चाहिए।

 

एआर सहकारिता मेरठ अमित त्यागी ने कहा कि उत्तराधिकारियों को सबसे पहले अपने दिवंगत पिता का सहकारी ऋण निपटाना चाहिए। इसके बाद ही वे समिति के सदस्य बनकर खाद, बीज और अन्य कृषि ऋण सुविधाओं का लाभ ले सकते हैं।

 

उन्होंने बताया कि ऐसे उत्तराधिकारी किसानों की लंबी सूची विभाग के पास है और लंबित मामलों में ब्याज लगातार बढ़ रहा है। सहकारिता विभाग के नियमों के अनुसार बकाया होने पर पहले नोटिस जारी किया जाता है। अगर इसके बाद भी भुगतान नहीं होता है तो वसूली की कार्रवाई शुरू होती है। लंबे समय तक बकाया रहने पर सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) जारी कर भू-राजस्व की तरह वसूली की जा सकती है।

ध्यान देने वाली बातें

  • किसान की मृत्यु के साथ सहकारी ऋण स्वतः समाप्त नहीं होता।
  • संपत्ति उत्तराधिकारियों के नाम होने पर उसी सीमा तक ऋण की वसूली संभव है।
  • मृत्यु के बाद परिवार को मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार संबंधी दस्तावेज सहकारी समिति में जमा कर रिकॉर्ड अपडेट कराना जरूरी है।
  • बकाया पर पहले नोटिस जारी होता है, फिर वसूली की कार्रवाई शुरू होती है।
  • लंबे समय तक भुगतान नहीं होने पर आरसी जारी कर भू-राजस्व की तरह वसूली की जा सकती है।

 

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एक नजर में आंकड़े

दिवंगत किसान: 6,343
कुल बकाया: 55.14 करोड़ रुपये
मेरठ: 4,990 किसान, 43.59 करोड़ रुपये
बागपत: 1,353 किसान, 11.55 करोड़ रुपये

 

यह मामला सिर्फ करोड़ों रुपये की बकाया वसूली का नहीं, बल्कि सहकारी ऋण व्यवस्था और उत्तराधिकार रिकॉर्ड के बीच तालमेल की कमी का भी बड़ा उदाहरण बन गया है। जमीन का मालिक बदल गया लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में कर्ज अब भी मृत किसान के नाम दर्ज है। ऐसे में विभाग की वसूली भी अटकी हुई है और वारिसों पर भविष्य में बड़ा वित्तीय बोझ खड़ा होने की आशंका बनी हुई है।