कलकत्ता हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के लिए बनाए गए विशेष पुलिस थानों और उनसे जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए निर्धारित अदालतों से संबंधित दो अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था। इस मामले को लेकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस न्यायमूर्ति वी. मोहना की बेंच ने इस मामले में राज्य सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है।
इस मामले की शुरुआत कलकत्ता हाईकोर्ट के 19 जून को दिए गए फैसले से होती है जिसमें हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार की दो अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था। पहली अधिसूचना 30 जनवरी 2025 को जारी की गई थी, जिसके तहत STF के लिए विशेष पुलिस थाने बनाने की व्यवस्था की गई। इनमें सिलीगुड़ी STF मुख्यालय पुलिस स्टेशन और साल्ट लेक STF मुख्यालय पुलिस स्टेशन शामिल थे। इसके बाद 10 फरवरी 2025 की दूसरी अधिसूचना में इन थानों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए अदालतों का क्षेत्राधिकार तय किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है।
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हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
कलकत्ता हाई कोर्ट ने 19 जून 2026 को इन व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए दोनों अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट का तर्क यह था कि आपराधिक न्याय व्यवस्था की संरचना और अदालतों के अधिकार-क्षेत्र में इस तरह का बदलाव केवल कार्यपालिका के आदेश से नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि 2019 में गठित STF अपने निर्धारित अपराधों की जांच जारी रख सकती है लेकिन सरकार को मौजूदा कानूनी ढांचे से अलग जाकर STF के लिए विशेष पुलिस थाने और एक अलग न्यायिक ढांचा बनाने का अधिकार नहीं है। इस मामले को जलपाईगुड़ी बार एसोसिएशन से जुड़े सदस्यों की याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट के सामने चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने विशेष अदालतों और पुलिस व्यवस्था की जरूरत को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि साइबर अपराध आदि के बढ़ने के साथ ज्यादा अदालतों की आवश्यकता है और सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि हाईकोर्ट को ऐसी व्यवस्था से आपत्ति क्यों है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार कार्यपालिका के आदेश के जरिए आपराधिक न्याय व्यवस्था के ढांचे में बदलाव नहीं कर सकती और इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं।
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क्या है अहम सवाल?
यह विवाद सिर्फ राज्य सरकार के एक आदेश से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि सवाल यह है कि उसके लिए विशेष प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था बनाने का अधिकार किसके पास है। राज्य सरकार का पक्ष स्वाभाविक रूप से यह है कि अपराध के बदलते स्वरूप के अनुसार पुलिस और जांच की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना जरूरी है। दूसरी ओर, हाईकोर्ट के आदेश में यह चिंता दिखाई देती है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में बदलाव निर्धारित कानूनों के अनुरूप होना चाहिए और कार्यपालिका केवल अधिसूचना जारी करके अदालतों के अधिकार-क्षेत्र या न्यायिक ढांचे को अपनी सुविधा के अनुसार नहीं बदल सकती। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में इस सवाल का जवाब तलाश करने की कोशिश की जा सकती है।
