भारत आज विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर भारत के विभाजन के समय हुई त्रासदी के शिकार लोगों को याद कर रहा है। इस मौके पर यूनाइटेड पंजाबी ऑर्गेनाइजेशन चंडीगढ़ के सहयोग से 13 अगस्त 2026 को पंजाब के 15 अगस्त 1947 को सांप्रदायिक आधार पर हुए विभाजन का विरोध करने वाले पंजाबी राजनीतिज्ञों, विशेष रूप से सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान टिवाणा, के दृष्टिकोण और वर्तमान दौर में उसकी प्रासंगिकता विषय पर एक विचार-चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इस कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए संस्था के संस्थापक तथा पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के मुद्दों से गंभीरता से जुड़े पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक एवं चिंतक सरदार हरविंदर सिंह ने कहा कि संस्था का उद्देश्य सूफियों, गुरुओं, भगतों और लोक नायकों द्वारा विकसित मानवीय साझेदारी, भाईचारे और उच्च मानवीय मूल्यों को बनाए रखने वाली परंपराओं से प्रेरणा लेकर व्यावहारिक कार्य करना है।
यह भी पढ़ें: दिल्ली यूनिवर्सिटी ने PG कोर्स से 'दिल्ली सल्तनत' वाला पेपर क्यों हटाया?
भाईचारा बनाए रखने पर दिया जोर
इसी कड़ी में उन्होंने पंजाब के 15 अगस्त 1947 के दर्दनाक विभाजन के संदर्भ में इस कार्यक्रम के माध्यम से विभाजन का विरोध करने वाले तथा हिंदू-मुस्लिम-सिख भाईचारे और सामाजिक साझेदारी को बनाए रखने के लिए कार्य करने वाले लोगों, विद्वानों और राजनीतिक व्यक्तित्वों के योगदान को याद करना तथा उनसे प्रेरणा लेकर वर्तमान दौर में सामुदायिक एकता और शांति के लिए व्यावहारिक प्रयास करना इस आयोजन का उद्देश्य है।
धर्म को आधार पर विभाजन चिंताजनक
इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए आई.डी.सी. के निदेशक डॉक्टर प्रमोद कुमार ने कहा कि पंजाब के लोगों में उनकी धार्मिक पहचान के साथ-साथ आपसी भाईचारे और सामाजिक साझेदारी की भावना भी मजबूत रही है। हालांकि, कुछ सांप्रदायिक शक्तियों और सत्ताधारी पक्षों द्वारा धर्म को आधार बनाकर समाज में विभाजन पैदा करने के प्रयास समय-समय पर होते रहे हैं।
डॉक्टर प्यारे लाल गर्ग ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान टिवाणा द्वारा पंजाब के विभाजन का विरोध करने के लिए किए गए अथक प्रयासों के बावजूद अंग्रेजों ने एक सुनियोजित रणनीति के तहत पंजाब का विभाजन किया, ताकि भारत से चले जाने के बाद भी इस क्षेत्र में अपने प्रभाव और हितों को बनाए रखा जा सके।
आदि धर्म आंदोलन का जिक्र
इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर रौंकी राम ने कहा कि अंग्रेजों ने पंजाब को दो बार तबाह किया। पहली बार तब, जब उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के हिंदू-मुस्लिम-सिख एकता पर आधारित शासन को समाप्त किया, और दूसरी बार 1947 में सांप्रदायिक आधार पर पंजाब का विभाजन करके। उन्होंने सरगोधा और दोआबा क्षेत्रों में चली आदि धर्म आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान टिवाणा ने अपनी अलग-अलग धार्मिक पहचान और आर्थिक वर्गीय पृष्ठभूमि के बावजूद जिस ईमानदारी और गंभीरता से सभी पंजाबियों का एक साझा मोर्चा बनाया, वह एक मिसाल थी और आज भी इसकी आवश्यकता है। हालांकि, आज हमारे पास इस प्रकार के चरित्र और दृष्टि वाले राजनीतिज्ञों की कमी है, लेकिन उनकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
यह भी पढ़ें: कौन हैं सुंदर सिंह ठाकुर, जिन्हें हिमाचल की सुक्खू सरकार में मिलेगा मंत्री पद?
चर्चा का केंद्र रहा पंजाब
पंजाब किसान एवं खेत मजदूर आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर सुखपाल सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान टिवाणा पंजाब की सांप्रदायिक एकता तथा किसान-पक्षधर विरासत के वारिस थे। सर छोटू राम एक सामान्य किसान परिवार से उभरे नेता थे और वे आम ग्रामीण, किसान तथा मजदूर की समस्याओं से भली-भांति परिचित थे। उन्होंने किसान-विरोधी कानूनों को समाप्त करवाकर उनकी जगह किसान-पक्षीय कानून बनवाने में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान दिया। ये कानून आगे चलकर कृषि संबंधी कानूनों की महत्वपूर्ण आधारशिला बने।
डॉ. मनमोहन ने सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान टिवाणा के संदर्भ में पंजाब की समन्वित और साझा सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि पंजाब हमेशा से सामाजिक साझेदारी और भाईचारे के मार्ग पर चलता आया है। हालांकि, समय-समय पर उसकी सामुदायिक एकता में दरार डालने के प्रयास भी होते रहे हैं। सभी विद्वान इस बात पर एकमत थे कि देश के विभाजन का कड़ा विरोध करने वाले उस समय के पंजाब के प्रमुख किसान नेताओं सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान टिवाणा को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि आज भी देश में लोगों को धर्म के आधार पर बांटने के बजाय पंजाब की किसान-मजदूर समर्थक विकास नीतियां बनाई और लागू की जाएं।
उन्होंने कहा कि किसानों और मजदूरों को कर्ज के जाल से बाहर निकालने, उनके आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने तथा उन्हें बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी जीवन सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि वे सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जी सकें।
मौजूदा हालातों पर जताई चिंता
इस कार्यक्रम के वक्ताओं ने कहा कि आज जब देश में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं तथा लेखकों और बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया जा रहा है और कॉरपोरेट हितों के अनुकूल विकास नीतियां लागू की जा रही हैं, ऐसे समय में विभाजन और सांप्रदायिकता का विरोध करने तथा कामगारों, किसानों और ग्रामीण समाज के विकास की वकालत करने वाले लोगों, विद्वानों और नेताओं की विचारधारा और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है।
