कभी-कभी किसी पुराने इलाज की परेशानी लंबे समय बाद अचानक सामने आती है और उसके पीछे की वजह चौंकाने वाली होती है। चंबा जिले के डलहौजी क्षेत्र के एक व्यक्ति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। पेट के ऑपरेशन के करीब एक साल बाद शुरू हुए तेज दर्द ने ऐसी स्थिति का खुलासा किया, जिसके बाद उसे दोबारा सर्जरी करवानी पड़ी।
जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग चंबा ने मल्होत्रा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, बद्दी में हुई सर्जरी से जुड़े मामले की सुनवाई के बाद दो चिकित्सकों को शिकायतकर्ता राकेश कुमार को 5,12,026 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने मुआवजे के अलावा शिकायत दर्ज होने की तारीख से पूरी रकम के भुगतान तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने और 15 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में अदा करने के निर्देश भी दिए हैं।
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के एक व्यक्ति को ऑपरेशन के करीब एक साल बाद दोबारा तेज पेट दर्द की शिकायत हुई। जांच में उसके पेट में करीब 8×8 सेंटीमीटर का संग्रह मिला, जिसमें सर्जिकल सामग्री होने के संकेत थे। बाद में दूसरी सर्जरी कर शरीर से बाहर वह सामग्री निकाली गई।
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मामले की सुनवाई करते हुए जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग चंबा ने 2 चिकित्सकों को शिकायतकर्ता को 5,12,026 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। इसके अलावा शिकायत की तारीख से भुगतान तक नौ प्रतिशत सालाना ब्याज और 15 हजार रुपये मुकदमा खर्च भी देना होगा।
2019 में हुआ था पहला ऑपरेशन
डलहौजी तहसील के दुहका निवासी राकेश कुमार को 29 जुलाई 2019 को पेट में दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जांच के दौरान पित्ताशय में पथरी सामने आई। इसके बाद उनका ऑपरेशन किया गया और 3 अगस्त को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। इसके बाद कुछ समय तक स्थिति सामान्य रही, लेकिन करीब एक साल बाद सितंबर 2020 में उन्हें फिर से पेट में तेज दर्द होने लगा।
समस्या बढ़ने पर उन्होंने आगे जांच करवाई। 13 सितंबर 2020 को चंडीगढ़ में सीईसीटी स्कैन कराया गया। जांच में पित्ताशय के नीचे करीब 8×8 सेंटीमीटर का संग्रह दिखाई दिया। रिपोर्ट में इसके भीतर हवा के छोटे बिंदुओं के साथ टांके से जुड़ी सामग्री भी नजर आई। इसके बाद पठानकोट में अल्ट्रासाउंड कराया गया। वहां की जांच के बाद ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल होने वाली सर्जिकल सामग्री के शरीर के अंदर रह जाने की आशंका जताई गई।
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दूसरी सर्जरी में निकाली गई बाह्य सामग्री
मामले की गंभीरता को देखते हुए राकेश कुमार ने पंचकूला के धवन अस्पताल में उपचार करवाया। 1 अक्तूबर 2020 को उनकी दोबारा सर्जरी की गई। इस दौरान पेट के अंदर मौजूद विदेशी सामग्री को बाहर निकाला गया। इसके बाद उन्होंने पहली सर्जरी से जुड़े चिकित्सकीय उपचार को लेकर उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने चिकित्सकीय रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की।
आयोग ने माना कि पहली सर्जरी के दौरान इस्तेमाल हुई सामग्री का पेट में रह जाना स्वीकार्य चिकित्सा मानकों के अनुरूप नहीं था। इसी आधार पर इसे सेवा में कमी और चिकित्सकीय लापरवाही का गंभीर मामला माना गया। राकेश कुमार ने आयोग के समक्ष कुल 6,52,026 रुपये का दावा किया था। उपलब्ध दस्तावेजों और मामले के तथ्यों की समीक्षा के बाद आयोग ने 5,12,026 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया।
दोनों चिकित्सकों को यह राशि संयुक्त और पृथक रूप से चुकाने के निर्देश दिए गए हैं। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग चंबा के अध्यक्ष हिमांशु मिश्रा और सदस्य नारायण ठाकुर ने इस मामले में 24 सितंबर 2026 को आदेश सुनाया। आदेश के मुताबिक मुआवजे की राशि के साथ शिकायत की तारीख से भुगतान होने तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज और 15 हजार रुपये मुकदमा खर्च भी देना होगा।
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क्या होता है गॉसिपिबोमा?
गॉसिपिबोमा (Gossypiboma) उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी सर्जरी के दौरान इस्तेमाल की गई गॉज या अन्य सामग्री गलती से शरीर के अंदर रह जाती है। शरीर इसके आसपास प्रतिक्रिया कर सकता है, जिससे गांठ, सूजन, संक्रमण या अन्य परेशानी पैदा हो सकती है। ऐसे मामलों में मरीज को लंबे समय बाद भी पेट दर्द या अन्य लक्षण परेशान कर सकते हैं। इसीलिए लगातार या असामान्य दर्द की स्थिति में चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है।
