गुजरात और राजस्थान के किसानों के बीच जीरा और सौंफ को लेकर विवाद शुरू हो गया है। यह विवाद तब शुरू हुआ, जब इसी महीने गुजरात के 'उंझा जीरा' और 'उंझा सौंफ' को GI टैग मिला। उंझा शहर भारत के गुजरात राज्य के महेसाणा जिले में स्थित है। यह शहर एशिया की सबसे बड़ी मसाला मंडी है, जो खासतौर से जीरा और सौंफ के व्यापार के लिए जाना जाता है। 

 

राजस्थान के किसानों का कहना है कि जीरा की खेती हम करते हैं, उंझा तो बस एक मंडी है। उनका कहना है कि यह GI टैग उंझा कृषि उपज मंडी समिति (APMC) के नाम पर दिया गया है, जो सही नहीं है। उंझा मसालों की खरीद-बिक्री का बड़ा केंद्र है, उत्पादन का नहीं। 

 

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क्या है पूरा मामला?  

इसी महीने गुजरात के 'उंझा जीरा' और 'उंझा सौंफ' को GI टैग मिला है। यह टैग उंझा कृषि उपज मंडी समिति (APMC) के नाम पर दिया गया है। अब 'उंझा जीरा' और 'उंझा सौंफ' नाम सिर्फ उसी जीरे और सौंफ पर लिखा जा सकेगा, जो तय इलाके में उगाए गए हों। इससे नकली उत्पाद पर रोक लगेगी और असली उंझा जीरा-सौंफ की पहचान बढ़ेगी। विदेशों में भी इन्हें बेचने में आसानी होगी। 

 

यहीं से यह पूरा विवाद शुरू हुआ। राजस्थान के किसानों का कहना है कि उंझा मसालों की बड़ी मंडी है, जबकि जीरा और सौंफ की खेती राजस्थान में भी बड़े पैमाने पर होती है। उनका कहना है कि केवल उंझा के नाम पर GI टैग मिलने से राजस्थान के किसानों की फसल की पहचान और बाजार में मिलने वाले दाम पर असर पड़ सकता है।  

कब से चल रहा है यह विवाद?

24 जून 2024 को उंझा जीरा और सौंफ को GI टैग दिलाने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य, विश्लेषण और 1000 से ज्यादा पेजों के दस्तावेज जमा किए।
28 मार्च 2026 को चेन्नई की GI रजिस्ट्री ने उंझा जीरा को GI टैग देने की मंजूरी दे दी।
13 जुलाई 2026 को गुजरात सरकार ने ऐलान किया कि उंझा जीरा और उंझा सौंफ को GI टैग मिल गया है।

इसके बाद से ही राजस्थान के जीरा किसानों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका कहना है कि उंझा सिर्फ खरीद-बिक्री (मंडी) का बड़ा केंद्र है, जीरा उगाने की जगह नहीं। 

राजस्थान के किसानों को नुकसान क्या है?  

राजस्थान के किसानों का कहना है कि जीरा और सौंफ की खेती उनके यहां भी बड़े पैमाने पर होती है। उन्हें डर है कि इससे राजस्थान के जीरा और सौंफ की पहचान कमजोर होगी और बाजार में उनकी फसल के दाम भी कम मिलेगे। वहीं दूसरी ओर गुजरात के किसानों और उंझा APMC का कहना है कि उंझा की पहचान सिर्फ मंडी तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र के जीरा और सौंफ की गुणवत्ता, इतिहास और प्रतिष्ठा को देखते हुए GI टैग दिया गया है। उनका कहना है कि यह टैग लंबे वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजों के आधार पर मिला है, जिससे असली 'उंझा जीरा' और 'उंझा सौंफ' को देश-विदेश में नई पहचान मिलेगी। 

 

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राजस्थान के किसानों का कहना है कि जोधपुर और मेड़ता मंडियों में जीरे का उचित मूल्य नहीं मिलता है। इसलिए वे उंझा मंडी में अपनी फसल बेचते हैं, जहां बड़े निर्यातक और कारोबारी मौजूद रहते हैं। किसानों का कहना है कि अब GI टैग का इस्तेमाल कर व्यापारी राजस्थान के जीरे को कमतर बताकर किसानों को कम कीमत देने की कोशिश करेंगे। 

 

 किस राज्य में कितनी होती है सौंफ और जीरे की पैदावार? 

  • रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2024-25 में राजस्थान में जीरे का 6.89 लाख टन उत्पादन हुआ, इसके साथ ही यह देश का सबसे बड़ा जीरा उत्पादक राज्य बन गया। 
  • गुजरात में 4.72 लाख टन जीरा पैदा हुआ। सौंफ उत्पादन में गुजरात 1.31 लाख टन के साथ पहले स्थान पर रहा। वहीं राजस्थान का उत्पादन 0.44 लाख टन दर्ज किया गया।  

गुजरात को इससे क्या फायदा होगा? 

दरअसल, किसी उत्पाद को जीआई टैग मिलने से एक विशेष भौगोलिक पहचान मिलती है। ऐसे में GI टैग मिलने से 'उंझा जीरा' और 'उंझा सौंफ' को कानूनी पहचान मिलेगी। इससे इन उत्पादों की देश-विदेश में ब्रांड वैल्यू बढ़ सकती है। इसके अलावा नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, GI क्षेत्र के किसानों और कारोबारियों को बेहतर बाजार और अच्छे दाम मिलने की संभावना भी बढ़ेगी। 

अब आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग किसी उत्पाद की उस जगह से जुड़ी विशेष गुणवत्ता के आधार पर दिया जाना चाहिए जहां उसका उत्पादन होता है ना कि जहां उसका व्यापार होता है। उंझा दुनिया भर में मसालों के बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता है लेकिन वहां बिकने वाला जीरा और सौंफ राजस्थान से आता है। अब राजस्थान के किसान GI टैग के फैसले की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर जरूरत पड़ी तो वे कानूनी रास्ता भी अपनाएंगे। 

 

हालांकि, गुजरात का दावा है कि GI टैग सभी वैज्ञानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद मिला है। ऐसे में अब यह विवाद GI रजिस्ट्री, अदालत या अन्य संबंधित सरकारी संस्थाओं के स्तर पर आगे भी बढ़ सकता है। फिलहाल दोनों राज्य अपने-अपने दावों पर कायम हैं।