हिमाचल की पहाड़ियों में लंबे समय से जंगली तौर पर उगने वाली भांग अब सिर्फ नशे के लिए चर्चा में नहीं रहेगी। सरकार इसे टेक्सटाइल, हस्तशिल्प, हथकरघा और औषधीय क्षेत्र की संभावनाओं से जोड़ने की तैयारी में है। कुल्लू में इसके औद्योगिक उपयोग को लेकर विशेष योजना तैयार की जा रही है, जिसके तहत भांग से कपड़े, शॉल और विभिन्न हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे। कुल्लू के विधायक सुंदर सिंह ठाकुर ने कहा कि प्रदेश में भांग की खेती को नियंत्रित एवं कानूनी दायरे में लाने के लिए कानून और नियामकीय प्रक्रिया तैयार की गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य नशे को बढ़ावा देना नहीं बल्कि गैर-मादक औद्योगिक और औषधीय उपयोग को बढ़ावा देना है।

 

विधायक के अनुसार कुल्लू क्षेत्र में भांग की खेती का एक प्रमुख उद्देश्य टेक्सटाइल इंडस्ट्री को कच्चा माल उपलब्ध करवाना होगा। इससे फाइबर तैयार कर कपड़े, शॉल, रस्सियां तथा अन्य हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पाद बनाए जा सकेंगे। हिमाचल के कई क्षेत्रों में भांग के रेशे से पारंपरिक रूप से रस्सियां, चटाइयां, जूते और अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाने की परंपरा रही है। अब इसी पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक बाजार और उद्योग से जोड़ने की कोशिश हो रही है। 

 

भांग के औषधीय उपयोग को भी इस पूरी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इसके लिए ऐसी खेती की अनुमति होगी जो निर्धारित नियमों और लाइसेंस व्यवस्था के तहत की जाएगी। विधायक ने बताया कि किसानों को बीज उपलब्ध करवाने में हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय और बागवानी विश्वविद्यालय की भूमिका रहेगी। इससे मनमाने तरीके से भांग की खेती के बजाय प्रमाणित बीज, निर्धारित किस्म और नियंत्रित उत्पादन व्यवस्था विकसित करने का प्रयास होगा।

भांग का मतलब खुली छूट नहीं

सुंदर सिंह ठाकुर ने भांग की खेती को लेकर हो रही नकारात्मक चर्चा को खारिज करते हुए कहा कि यह खुली या अनियंत्रित खेती नहीं होगी। पूरी प्रक्रिया लाइसेंस, निगरानी और निर्धारित नियमों के तहत होगी। सामान्य औद्योगिक खेती के लिए एक बीघा पर 500 रुपये, जबकि औषधीय प्रयोजन के लिए एक बीघा पर एक लाख रुपये फीस निर्धारित की गई है। यानी सरकार की कोशिश भांग की खेती को सामान्य कृषि फसल की तरह खुला छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके उपयोग और उत्पादन दोनों को नियंत्रित करने की है। 

 

हिमाचल में यह विचार अचानक सामने नहीं आया है। औद्योगिक और औषधीय भांग को कानूनी दायरे में लाने की चर्चा कई वर्षों से चल रही है। 2018 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में औद्योगिक और औषधीय हेम्प की खेती, प्रसंस्करण और उपयोग से जुड़े प्रतिबंधों में बदलाव की मांग वाली याचिका पहुंची थी। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा था। उस समय भी तर्क दिया गया था कि मौजूदा केंद्रीय कानून राज्य सरकारों को नियंत्रित परिस्थितियों में गैर-मादक उपयोग के लिए खेती की अनुमति देने की गुंजाइश देता है।

 

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2021: जयराम दिखाई रुचि, सुक्खू सरकार ने बनाई कमेटी

मार्च 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने विधानसभा में कहा था कि सरकार भांग की नियंत्रित खेती को वैध करने के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करेगी। इसके पीछे औषधि, रस्सी, चप्पल और हेम्प फैब्रिक जैसे गैर-मादक उपयोगों की संभावनाएं बताई गई थीं। सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार ने 2023 में इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी की अध्यक्षता में समिति गठित की। समिति को औद्योगिक, वैज्ञानिक और औषधीय उद्देश्यों के लिए नियंत्रित भांग की खेती की संभावनाओं का अध्ययन करना था। समिति ने कुल्लू सहित विभिन्न जिलों में लोगों और पंचायत प्रतिनिधियों से भी राय ली।

2023: कमेटी ने नियंत्रित खेती की सिफारिश की

सितंबर 2023 में समिति ने गैर-मादक उपयोग के लिए नियंत्रित हेम्प खेती की सिफारिश की और मामला कैबिनेट के विचार के लिए आगे बढ़ा। सितंबर 2024 में विधानसभा ने समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर ली। इसमें औद्योगिक, वैज्ञानिक और औषधीय उद्देश्यों के लिए नियंत्रित वातावरण में खेती की अनुमति देने तथा नियमों में आवश्यक संशोधन की सिफारिश की गई। समिति में सभी दलों के प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को शामिल किया गया था। 

 

24 जनवरी 2025 को हिमाचल कैबिनेट ने नियंत्रित भांग खेती के पायलट अध्ययन को मंजूरी दी। कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और डॉ. वाईएस परमार विश्वविद्यालय नौणी को इसमें शामिल किया गया। इसका उद्देश्य औद्योगिक और औषधीय उपयोग के लिए आगे की रूपरेखा तैयार करना था। दिसंबर 2025 में सरकार ने औद्योगिक हेम्प को हिमाचल की नई अर्थव्यवस्था से जोड़ने का विजन सामने रखा। इसमें औद्योगिक हेम्प में THC की मात्रा 0.3 प्रतिशत से कम रखने पर जोर दिया गया। सरकार ने इसे टेक्सटाइल, पेपर-पैकेजिंग, कॉस्मेटिक्स, बायोफ्यूल और औषधीय क्षेत्र से जोड़ने की बात कही।

अब कुल्लू पर क्यों है नजर?

कुल्लू, मंडी और चंबा में भांग पहले से प्राकृतिक रूप से उगती रही है। समस्या यह रही कि इसके साथ लंबे समय से अवैध नशीले पदार्थों का नाम जुड़ा रहा है। सरकार अब इसी प्राकृतिक संसाधन को कानूनी, नियंत्रित और आर्थिक गतिविधि में बदलने की कोशिश कर रही है। यदि यह मॉडल सफल रहा तो किसानों को पारंपरिक फसलों के अलावा एक नया विकल्प मिल सकता है।

 

स्थानीय स्तर पर फाइबर प्रोसेसिंग, कताई-बुनाई, शॉल निर्माण, हस्तशिल्प, पैकेजिंग और औषधीय उत्पादों से जुड़े छोटे उद्योग विकसित होने की संभावना है। इस पूरी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि औद्योगिक हेम्प और नशीली भांग के बीच कानूनी तथा तकनीकी अंतर को जमीन पर कितनी मजबूती से लागू किया जाता है।

 

बीज से लेकर खेत, उत्पादन, परिवहन और अंतिम उत्पाद तक निगरानी व्यवस्था मजबूत रखना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। हिमाचल में कहानी सिर्फ ‘भांग की खेती वैध करने’ की नहीं है। असली प्रयोग यह है कि पहाड़ों में जंगली तौर पर उगने वाले पौधे को नशे की पहचान से निकालकर ‘हेम्प आधारित उद्योग’ की अर्थव्यवस्था में बदला जा सके। कुल्लू इस प्रयोग का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।