अब तक हमीरपुर के खेतों तक सीमित रही जैविक हल्दी की पहचान जल्द ही हिमाचल के शक्तिपीठों से देशभर तक पहुंच सकती है। खास बात यह है कि यह पहल सिर्फ हल्दी की बिक्री ही नहीं, बल्कि गांव की महिलाओं को घर बैठे रोजगार और उनके उत्पादों को बड़ा बाजार उपलब्ध करवाएगी।

 

हमीरपुर जिला प्रशासन ने कांगड़ा प्रशासन को प्रस्ताव भेजा है। इसके तहत ज्वालाजी, ब्रजेश्वरी देवी, चामुंडा देवी और माता बगलामुखी बनखंडी मंदिर के आसपास हमीरपुर में तैयार जैविक हल्दी, उससे तैयार सिंदूर और स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के अन्य स्वदेशी उत्पादों की बिक्री की योजना है। प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के बाद दोनों जिलों के बीच एमओयू होने की संभावना है।

 

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दुकान मंदिर में, मेहनत गांव में

इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि बाजार गांव से दूर नहीं होगा, बल्कि ग्राहक खुद गांव के उत्पाद तक पहुंचेंगे। हमीरपुर की महिलाएं घर पर हल्दी और अन्य उत्पाद तैयार करेंगी और इन्हें शक्तिपीठों में आने वाले श्रद्धालुओं तक पहुंचाया जाएगा।

 

यानी एक तरफ मंदिरों में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को स्थानीय और जैविक उत्पाद मिलेंगे, वहीं दूसरी ओर स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को अपने उत्पाद बेचने के लिए अलग से बाजार तलाशने की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्रशासन के अनुसार हमीरपुर में करीब 300 स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं विभिन्न गतिविधियों से जुड़ी हैं।

हल्दी से सिंदूर तक, स्थानीय उत्पादों की बनेगी नई पहचान

इस योजना में केवल हल्दी बेचने की बात नहीं है। जैविक हल्दी से तैयार सिंदूर को भी शक्तिपीठों में बिक्री के लिए रखा जाएगा। मांग के अनुसार स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा तैयार अन्य स्वदेशी उत्पादों को भी इस बाजार से जोड़ा जा सकता है। इससे धार्मिक स्थलों पर खरीदारी का एक नया स्थानीय मॉडल विकसित हो सकता है, जहां श्रद्धालु दर्शन के अलावा अपने साथ हिमाचल के गांवों में तैयार उत्पाद भी ले जा सकेंगे।

 

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धार्मिक पर्यटन से जुड़ेगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

हिमाचल के शक्तिपीठों में देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। प्रशासन का मानना है कि इन धार्मिक स्थलों पर हमीरपुर के उत्पादों को बाजार मिलने से जैविक हल्दी की पहचान बड़े स्तर पर बनेगी और इसका सीधा लाभ किसानों और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को मिलेगा। डीसी हमीरपुर गंधर्वा राठौड़ के अनुसार एमओयू के बाद उत्पाद, पैकेजिंग और कीमत तय की जाएगी। साथ ही कांगड़ा के स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी पर भी निर्णय लिया जाएगा।

महिला उद्यमिता को मिल सकता है नया मॉडल

इस पहल को केवल एक उत्पाद की बिक्री के तौर पर नहीं, बल्कि ग्रामीण महिला उद्यमिता के मॉडल के रूप में भी देखा जा सकता है। यदि शक्तिपीठों में नियमित मांग बनती है तो महिलाओं को पहले से बाजार तलाशने के बजाय मांग के अनुसार उत्पादन करने का अवसर मिलेगा।

पहल पर महिलाओं ने क्या कहा?

स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि हल्दी की खेती और प्रसंस्करण से उन्हें अपने स्तर पर काम करने का अवसर मिल रहा है। मंदिरों में बिक्री शुरू होने से आय बढ़ने के साथ स्थानीय उत्पादों को पहचान मिलने की उम्मीद है। यानी कहानी सिर्फ हल्दी की नहीं है, यह खेत से मंदिर तक पहुंचती उस ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कहानी है, जिसमें हमीरपुर की महिलाओं की मेहनत अब श्रद्धालुओं के हाथों तक पहुंचाने की तैयारी है।