उत्तर प्रदेश में गोमती नदी को निर्मल बनाने के सरकारी दावे एक बार फिर कागजी साबित होते नजर आ रहे हैं। नदी में गिर रहे नालों और सीवर को रोकने की कार्ययोजना अब भी फाइलों में अटकी है। पिछले कुछ दशकों में गोमती को संवारने पर 3000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, इसके बावजूद नदी में गंदे नालों का पानी पहुंचना बंद नहीं हुआ। पिछले दिनों हुई उच्चस्तरीय बैठक में नगर निगम, जलकल विभाग और जल निगम की अधूरी रिपोर्ट पर मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने नाराजगी जताई।

 

मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने निर्देश दिया कि जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि गोमती नदी में एक बूंद भी सीवर नहीं खुलेगा, तब तक कोई कार्ययोजना आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। उन्होंने नगर निगम, जलकल विभाग और जल निगम से अधूरी रिपोर्ट को पूरा करने और धरातल की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद भी कागजी कार्रवाई पूरी नहीं होने पर मंडलायुक्त ने अधिकारियों से यह भी पूछा कि आखिर कितना सीवर पाइप के जरिए एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) तक पहुंच रहा है, कितना सीवर नालों के जरिए एसटीपी तक जा रहा है और कितने मोहल्लों का सीवर बिना ट्रीट हुए नदी में घुल रहा है।

 

आज भी नदी में गिर रहे हैं गंदे नाले

गोमती में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण नदी में सीधे गिरने वाले नाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक नगरिया, पाटानाला और सरकटा नाला सीधे नदी में गिर रहे हैं। इसके अलावा डाउनस्ट्रीम में हैदर कैनाल की गंदगी भी नदी में जा रही है। लखनऊ शहर के कुल 32 बड़े नालों में से आधा दर्जन से अधिक नाले सीधे गोमती में गिर रहे हैं। ऐसे में नदी को निर्मल बनाने की योजनाओं के बावजूद गंदा पानी लगातार गोमती में पहुंच रहा है।

 

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गोमती को संवारने के लिए वर्ष 2015 में तत्कालीन अखिलेश सरकार ने गोमती रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट शुरू किया था। इसका मूल बजट 656 करोड़ रुपये था। कैग की रिपोर्ट में परियोजना पर करीब 1435 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का खुलासा हुआ था, जबकि काम करीब 60 से 70 प्रतिशत ही पूरा हो पाया था। साल 2017 में योगी सरकार ने रिवरफ्रंट के नाम पर वित्तीय अनियमितताओं की जांच सीबीआई को सौंपी थी। जांच के बाद सिंचाई विभाग के कई बड़े अधिकारियों को जेल जाना पड़ा था।

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद भी सवाल बरकरार

पिछले साल गोमती तट पर छठ महोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोमती नदी को पूरी तरह निर्मल बनाने की घोषणा की थी। इसकी निगरानी मंडलायुक्त को सौंपी गई थी। इसके बाद 3 जनवरी को मुख्यमंत्री ने खुद गोमती सफाई योजना की समीक्षा करते हुए नदी में जा रहे सीवर की मोहल्लावार पूरी रिपोर्ट तलब की थी। मंडलायुक्त ने जलकल विभाग से प्रमुख बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी और यह स्पष्ट करने को कहा था कि सीवर का कितना हिस्सा एसटीपी तक पहुंच रहा है और कितना बिना ट्रीट हुए नदी में जा रहा है।

 

नगर निगम सीमा के कुल 560.48 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में से केवल 243.56 वर्ग किलोमीटर यानी 41.9 प्रतिशत हिस्से में ही सीवर लाइन का नेटवर्क है। यानी करीब 52 प्रतिशत यानी 291.70 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सीवर लाइन नहीं है।इन इलाकों में या तो नालियों का नेटवर्क है या लोग सेप्टिक टैंक का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों के गंदे पानी का नालों के जरिए गोमती तक पहुंचने का खतरा बना हुआ है।

 

शहर में मौजूद एसटीपी की क्षमता इस प्रकार है—
भरवारा — 345 एमएलडी
दौलतगंज — 42 और 14 एमएलडी
हैदर कैनाल — 120 एमएलडी
सीजी सिटी — 19 एमएलडी
वृंदावन कॉलोनी, सेक्टर-10 — 6.5 एमएलडी
हाथी पार्क — 1.5 एमएलडी


इसके अलावा बरावां कला में 3.5 एमएलडी और लोनीपुरवा में 50 एमएलडी क्षमता के एसटीपी निर्माणाधीन हैं।

 

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1300 जगहों पर नालियों का गंदा पानी सीवर में मिल रहा

जलकल विभाग के महाप्रबंधक कुलदीप सिंह ने बताया कि शहर में करीब 1300 ऐसे स्थान हैं, जहां नालियों का गंदा पानी सीवर में जा रहा है। मंडलायुक्त के स्पष्ट निर्देश हैं कि नगर निगम के साथ मिलकर इसकी कार्ययोजना तैयार की जाए, ताकि दोनों लाइनों को अलग किया जा सके और सही रिपोर्ट सौंपी जाए। इसके बाद ही धरातल पर काम शुरू हो सकेगा।


कुलदीप सिंह के मुताबिक, शहर में चिह्नित इन जगहों की रिपोर्ट तैयार करके नालियों और सीवर की लाइनों को अलग करने की योजना बनाई जा रही है। जल निगम के अधिशासी अभियंता एसपी सरोज ने बताया कि केंद्र सरकार को करीब 400 एमएलडी क्षमता के नए एसटीपी बनाने का प्रस्ताव भेजा गया है। उनके मुताबिक, इन एसटीपी के निर्माण के बाद गोमती नदी में एक बूंद भी सीवर जाने पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकेगी। फिलहाल यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के स्तर पर है। वहीं, मौजूदा व्यवस्था में कई जगह सीवर और नालियों के पानी के मिश्रण की समस्या बनी हुई है।

 

पिछले कुछ दशकों में गोमती को संवारने और साफ करने के नाम पर 3000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद नदी में नालों का गंदा पानी और सीवर पहुंचना जारी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद भी गोमती में गंदे पानी का प्रवाह क्यों नहीं रुका? 1300 स्थानों पर नालियों का पानी सीवर में मिल रहा है, आधा दर्जन से अधिक बड़े नाले सीधे नदी में गिर रहे हैं और 52 प्रतिशत शहरी क्षेत्र अभी भी सीवर नेटवर्क से बाहर है। ऐसे में फाइलों में तैयार हो रही नई कार्ययोजनाओं का असर जमीन पर कब दिखाई देगा, यह देखने वाली बात होगी।