पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी जगतार सिंह हवारा को 10 दिन की पैरोल देने की मांग की है। भगवंत मान ने पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखकर हवारा को उसकी बीमार मां से मिलने के लिए मानवीय आधार पर पैरोल देने का आग्रह किया है। सीएम मान के इस कदम ने पंजाब की राजनीति में बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार इसे मानवीय आधार पर उठाया गया कदम बता रही है, वहीं दूसरी तरफ इसे 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले सिख कैदियों यानी बंदी सिखों के मुद्दे पर AAP की नई राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।

 

भगवंत मान ने राज्यपाल को लिखे पत्र में कहा है कि जगतार सिंह हवारा की मां उम्रदराज हैं और उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनकी हालत खराब है। ऐसे में जगतार सिंह हवारा को उनसे मिलने के लिए 10 दिन की पैरोल दी जानी चाहिए। भगवंत मान ने अपने पत्र में यह भी बताया कि जगतार सिंह हवारा पहले ही पैरोल के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुका है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जुलाई में संबंधित अधिकारियों को उसकी पैरोल अर्जी पर तय समयसीमा में फैसला लेने का निर्देश दिया था।

 

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कौन हैं जगतार सिंह हवारा?

पंजाब की राजनीति में एक बार फिर जगतार सिंह हवारा का नाम सुर्खियों में है। उनकी पैरोल पर हो रही राजनीति के बारे में जानने से पहले उनके बारे में जानना बहुत जरूरी है। जगतार सिंह हवारा 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में दोषी है। 31 अगस्त 1995 को राजधानी चंडीगढ़ स्थित पंजाब सिविल सचिवालय के बाहर हुए बम विस्फोट में बेअंत सिंह समेत 17 लोगों की मौत हुई थी। इस मामले में जगतार सिंह हवारा और बलवंत सिंह राजोआना को 2007 में ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी।

 

हालांकि, इस मामले में 2010 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जगतार सिंह हवारा की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। कोर्ट ने इसे मौत की सजा के लिए बॉर्डरलाइन मामला माना था और उसे बाकी जिंदगी जेल में रखने का आदेश दिया था। इस बीच एक बार चंडीगढ़ की बुडैल जेल से जगतार सिंह हवारा फरार भी हो चुका है। इसके बाद से अब वह दिल्ली की जेल में बंद है। 

 

कई महीनों से उठ रही पैरोल देने की मांग

जगतार सिंह हवारा की पैरोल का मुद्दा पिछले कई महीनों से पंजाब में उठ रहा है। 2025 में पंजाब के 66 गांवों की पंचायतों ने भी उसकी बीमार मां से मिलने के लिए पैरोल देने की मांग की थी। फरवरी 2026 में जगतार सिंह हवारा के पैतृक गांव हवारा कलां में बड़ी धार्मिक और राजनीतिक सभा हुई थी। वहां भी बंदी सिंहों की रिहाई के साथ हवारा को उसकी मां से मिलने के लिए पैरोल देने की मांग की गई थी।

AAP के लिए यह कदम क्यों अहम है?

पंजाब में आम आदमी पार्टी ने 2022 में सरकार बनाई है और अब अगले साल पार्टी सरकार को बचाने की कोशिश करेगी। शिरोमणि अकाली दल समेत तमाम विपक्षी पार्टियों और आम आदमी पार्टी के बीच सिख धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर लगातार खींचतान रही है। AAP सरकार की SGPC के साथ टकराव, सीएम भगवंत मान को गुरु दोखी घोषित करने जैसे मुद्दों के कारण धार्मिक मामलों पर पार्टी बैकफुट पर है। 

 

ऐसे में जगतार सिंह हवारा की पैरोल की मांग को लेकर राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इसका असर बंदी सिंहों के मुद्दे और पंथिक राजनीति पर पड़ सकता है। हालांकि, AAP के एक वरिष्ठ नेता ने कहा है कि मुख्यमंत्री का पत्र सिर्फ मानवीय आधार पर है और इससे ज्यादा राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए। हालांकि, राजनीति में कुछ भी यूं ही नहीं होता। इस लेटर की टाइमिंग साफ बता रही है कि भगवंत मान एक बार फिर से पंजाब के पंथिक वोटर को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी में यह पत्र लिखा गया है। 

 

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क्या बैकफायर करेगा फैसला?

पूर्व सीएम की हत्या के आरोप में जेल में बंद जगतार सिंह हवारा हवारा प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का एक उच्च स्तरीय और प्रमुख सदस्य है। साल 2015 में अमृतसर में चब्बा गांव में आयोजित सरबत खालसा के दौरान कट्टरपंथी सिख संगठनों ने जगतार सिंह हवारा को श्री अकाल तख्त साहिब का अंतरिम जत्थेदार घोषित कर दिया था। इस फैसले का एसजीपीसी ने मानने से इनकार कर दिया था। इस घटनाक्रम से साफ है कि पंजाब में आज भी जगतार सिंह हवारा का प्रभाव है। अगर भगवंत मान जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने की वकालत कर रहे हैं तो खालिस्तानी समर्थक सांसद अमृतपाल की रिहाई पर भी सवाल उठेंगे। अमृतपाल इस समय असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद है और उन पर अजनाला थाने पर हमला करने के आरोप हैं। 

 

आम आदमी पार्टी की राज्य सरकार के प्रशासन ने उनकी पैरोल पर वीटो लगा रखा है। इसीलिए सवाल उठ रहा है कि एक तरफ सरकार अमृतपाल को पैरोल देने के मामलों में सख्त रुख अपना चुकी है, तो दूसरी तरफ हवारा के मामले में मुख्यमंत्री खुद पैरोल की सिफारिश क्यों कर रहे हैं। हालांकि दोनों मामलों की कानूनी परिस्थितियां और पैरोल मांगने के आधार अलग हैं, इसलिए दोनों को पूरी तरह एक जैसा मानना सही नहीं होगा लेकिन सवाल उठना लाजिम है। इसके साथ ही चंडीगढ़ में 15 अगस्त को बंदी सिखों की रिहाई को लेकर प्रदर्शन हो सकता है। इसको लेकर भी सरकार पर सवाल उठेंगे। यानी जगतार सिंह हवारा की रिहाई का पत्र लिखकर भगवंत मान ने पंथिक वोट को अपने पाले में गोल करने की कोशिश जरूर की है लेकिन यह उनके लिए सेल्फ गोल भी साबित हो सकता है।