सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल हिंसा मामले में मुख्य आरोपी मुल्ला अफरोज की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 (NSA) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया है। साथ ही, उत्तर प्रदेश सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है, जो मुल्ला अफरोज पर 2024 की संभल हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगा था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें डिटेंशन ऑर्डर को सही ठहराया गया था और हिरासत बरकरार रखा गया था।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए साफ किया कि उत्तर प्रदेश सरकार केवल पुलिस हिरासत में दिए गए किसी आरोपी के कबूलनामे को आधार बनाकर निवारक हिरासत यानी प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश पारित नहीं कर सकती। यह पूरा मामला संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के अदालती आदेश पर हुए सर्वेक्षण के बाद भड़की हिंसा से जुड़ा है।
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क्या है पूरा मामला?
उत्तर प्रदेश के संभल में नवंबर 2024 में तनाव तब बढ़ गया, जब वहां कोर्ट के आदेश पर शाही जामा मस्जिद का सर्वे किया जा रहा था। यह सर्वे तब किया गया, जब वहां पहले हरिहर मंदिर होने का दावा किया गया था। 24 नवंबर को सर्वे के दूसरे दौर के दौरान वहां विरोध कर रहे स्थानीय लोगों की सुरक्षा कर्मियों के साथ झड़प हो गई। इसमें चार लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए। मुल्ला अफरोज संभल हिंसा मामले में आरोपी है।
इस घटना के लगभग 54 दिन बाद पुलिस ने मुल्ला अफरोज को हिरासत में लिए गए बयान के आधार पर गिरफ्तार किया था। हालांकि बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नियमित जमानत दे दी थी लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन ने अपरोज के खिलाफ NSA के तहत कार्रवाई करते हुए हिरासत का आदेश जारी कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को सजा देने के लिए नहीं किया जा सकता। मुल्ला अफरोज को संबंधित आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के बाद भी NSA के तहत हिरासत में रखा गया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस के सामने दिया गया कथित कबूलनामा अकेले प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार नहीं बन सकता।
बेंच ने कहा कि आपराधिक मामले और प्रिवेंटिव डिटेंशन, दोनों के लिए एक ही घटना और लगभग एक जैसे सबूतों का इस्तेमाल किया गया। इससे लगता है कि हिरासत का मकसद निवारक कार्रवाई के बजाय सजा देना बन गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारों को प्रिवेंटिव डिटेंशन से जुड़े कानूनी नियमों और उसके उद्देश्य का पालन करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि मुल्ला अफरोज को घटना से जुड़े मामलों में जमानत मिल चुकी थी और वह पहले ही काफी समय हिरासत में रह चुका था। इसके अलावा कोर्ट ने जांच में हुई देरी पर भी सवाल उठाया। बेंच ने कहा कि पहली FIR दर्ज होने के बाद मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार करने में 54 दिन क्यों लगे यह भी समझ से बाहर है। खासतौर से तब, जब जांच एजेंसी ने घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग और CCTV फुटेज होने की बात कही थी।
कोर्ट का कहना है कि CCTV फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग उन 22 दस्तावेजों में शामिल नहीं थीं, जिनके आधार पर हिरासत का आदेश जारी किया गया था। ये रिकॉर्डिंग न तो मुल्ला अफरोज को दी गईं और न ही हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गईं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संविधान के तहत हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसे खुद को दोषी साबित करने के लिए मजबूर न किया जाए।
