बिहार में हर साल तबाही मचाने वाली बाढ़ और राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के लिए मिट्टी की कमी को दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने एक नई योजना तैयार की है। 3 नवंबर 2026 को केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और बिहार सरकार के बीच 'नदी संजीवनी' पहल के तहत MoU पर हस्ताक्षर किए गए। इस योजना के तहत NHAI बिहार की चुनिंदा नदियों से वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालेगा। उसका इस्तेमाल राज्य में बनने वाले हाईवे के निर्माण में किया जाएगा।
इसके तहत 16 निर्माणाधीन और भविष्य की 27 परियोजनाओं के लिए करीब 10.78 करोड़ घन मीटर उपयुक्त गाद का इस्तेमाल करने की योजना है। सरकार का मानना है कि इससे जहां एक तरफ उपजाऊ कृषि भूमि को खुदाई से बचाया जा सकेगा, वहीं दूसरी तरफ नदियों की पानी बहाने की क्षमता सुधरेगी। इसके उलट विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बाढ़ को कंट्रोल करने में कुछ हद तक मदद मिल सकता है लेकिन इसे स्थायी समाधान मान लेना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
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नदियों में क्यों जमती है गाद?
बिहार की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इसकी प्रमुख नदियां जैसे कोसी, गंडक, बागमती, बूढ़ी गंडक, कमला-बलान और महानंदा, नेपाल और हिमालय के कैचमेंट एरिया से निकलती हैं। हिमालय एक संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है। वहां से बहने वाली नदियां अपने साथ भारी मात्रा में मिट्टी, बालू और कंकड़ लाती है। जैसे ही ये नदियां बिहार के मैदानी इलाकों में पहुंचती हैं पानी का बहाव धीमा हो जाता है और गाद नदी के तल में जमने लगती है।
बिहार सरकार के डेटा के अनुसार, कोसी नदी बराह क्षेत्र में हर साल लगभग 95 मिलियन क्यूबिक मीटर गाद लाती है। अत्यधिक गाद जमने के कारण ही पिछले 250 सालों में कोसी ने पश्चिम की ओर लगभग 112 किलोमीटर तक अपना रास्ता बदला है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, बागमती नदी के बेनीबाद क्षेत्र में 1989 से 2006 के बीच नदी का तल औसतन 2 मीटर और कहीं-कहीं 4 मीटर तक ऊपर उठ गया था। जब नदी का तल ऊपर उठता है तो मानसून के दौरान पानी किनारों से बाहर फैलने लगता है।
क्या इससे बाढ़ पूरी तरह रुक जाएगी?
तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गाद निकालने के अपने फायदे और सीमाएं दोनों हैं। फायदे के तौर पर देखे तो नदी के संकरे हिस्सों, मुहाने या संगम से गाद हटाने पर पानी का प्रवाह तेज होता है। जलस्तर अचानक बढ़ने की स्थिति में कुछ स्थानों पर तटबंधों पर पानी का सीधा दबाव कम हो सकता है। सीमाओं के तौर पर देखे तो गाद निकालने से नदी के पानी बहाने की क्षमता थोड़ी बढ़ सकती है लेकिन नदी कोई बंद जलाशय नहीं है कि उसमें स्थायी रूप से पानी जमा रखा जा सके।
इसके अलावा बिना वैज्ञानिक रिसर्च के गाद निकालने से नदी के किनारों का कटाव बढ़ सकता है। नीचे के इलाकों में तलछट का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। पुलों के खंभों तथा तटबंधों की नींव को खतरा हो सकता है। भारत सरकार के 'नेशनल फ्रेमवर्क फॉर सेडिमेंट मैनेजमेंट (2022)' और बीके मित्तल समिति की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी नदी से गाद निकालना न तो आर्थिक रूप से व्यावहारिक है और न ही बाढ़ रोकने में पूरी तरह प्रभावी। ड्रेजिंग केवल चुनिंदा स्थानों पर ही उपयोगी हो सकती है।
बिहार में बाढ़ की अन्य बड़ी वजहें
विश्व बैंक और केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में बाढ़ के लिए सिर्फ गाद जिम्मेदार नहीं है। उत्तर बिहार की अधिकांश नदियों में जलस्तर तब बढ़ता है जब नेपाल के पहाड़ों में मूसलाधार बारिश होती है। बिहार की 80 से 90% बारिश मानसून के 3-4 महीनों में ही हो जाती है। इससे नदियां उफान पर आ जाती हैं। सड़कों, रेलवे लाइनों और बस्तियों के निर्माण से पानी का प्राकृतिक फैलाव रुक गया है। कई बार तटबंधों के पीछे या कस्बों में पानी हफ्तों फंसा रहता है।
'नदी संजीवनी' योजना
NHAI और बिहार सरकार के बीच हुए समझौते के तहत गाद निकालने का पूरा खर्च ठेकेदार उठाएंगे। राज्य सरकार पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। विदर्भ (महाराष्ट्र) के बुलढाणा में भी ऐसा ही प्रयोग किया गया था जहां तालाबों और नालों से निकाली गई मिट्टी का इस्तेमाल हाईवे निर्माण में हुआ था। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि बुलढाणा (जो सूखाग्रस्त इलाका था) की तुलना बिहार की उफनती नदियों से नहीं की जा सकती।
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साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स ऐंड पीपल (SANDRP) के अनुसार, नदियों की गाद में रेत, पत्थर और जैविक कचरा मिला होता है। इसे साफ करना, गुणवत्ता जांचना और निर्माण स्थल तक ढोना एक बड़ी आर्थिक चुनौती होगी।
इसके अलावा, सड़क निर्माण के लिए गाद का इस्तेमाल करना एक सफल आर्थिक मॉडल हो सकता है लेकिन इसे अपने आप बाढ़ में कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके वास्तविक असर को जानने के लिए परियोजना लागू होने के बाद नदी के जलस्तर और बाढ़ के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करना होगा।
बिहार सरकार की 'नदी संजीवनी' पहल सड़कों के निर्माण और उपजाऊ मिट्टी को बचाने के लिहाज से एक नवाचार है। लेकिन इसे बिहार की बाढ़ का एकमात्र या संपूर्ण समाधान मान लेना व्यावहारिक नहीं होगा। बिहार को बाढ़ से बचाने के लिए केवल नदियों की गाद निकालना काफी नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ पूरे नदी बेसिन का एकीकृत प्रबंधन, नेपाल के साथ जल समन्वय, तटबंधों की निरंतर निगरानी, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों से अतिक्रमण हटाना और बाढ़ के मैदानों का बचाव करना बेहद जरूरी है।
