तमिलनाडु में एक सड़क दुर्घटना पीड़ित को मद्रास हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने एक ऐसे व्यक्ति के मुआवजे में भारी बढ़ोतरी की है, जिसकी जिंदगी दो अलग-अलग सड़क हादसों के बाद पूरी तरह बदल गई। हादसों में गंभीर रूप से घायल हुए व्यक्ति की हालत ऐसी हो गई कि वह बिस्तर से उठने तक में असमर्थ है और सामान्य रूप से किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकता। मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने माना कि पहले तय की गई मुआवजा राशि पीड़ित की स्थिति के मुकाबले बेहद कम थी। इसी कारण अदालत ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मुआवजा 33.02 लाख रुपये से बढ़ाकर 57.98 लाख रुपये कर दिया।

 

मामला 5 दिसंबर 2014 का है। काथिरेसन नामक व्यक्ति नेशनल हाईवे पर कार से यात्रा कर रहा था तभी एक आइशर वैन ने उसकी कार को टक्कर मार दी। दुर्घटना में उसे चोटें आईं और इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में बेहतर उपचार के लिए उसे एंबुलेंस से निजी अस्पताल ले जाया जा रहा था। रास्ते में एंबुलेंस की सामने से आ रही एक बस से जोरदार टक्कर हो गई। इस दूसरे हादसे में काथिरेसन की रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई। चोटें इतनी गंभीर थीं कि वह पूरी तरह बिस्तर पर पड़ गया और उसकी सामान्य जीवन जीने की क्षमता लगभग समाप्त हो गई।

 

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कोर्ट ने ठुकराई बीमा कंपनी की दलील

मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने पहले पीड़ित को 33.02 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। बीमा कंपनी ने हाई कोर्ट में अपील कर दावा किया कि गंभीर चोटें पहले हादसे में लगी थीं, इसलिए उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती। हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड और मेडिकल दस्तावेजों की जांच के बाद इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पहले हादसे में केवल सामान्य चोटें आई थीं, जबकि रीढ़ की गंभीर चोट दूसरे हादसे में लगी थी। ऐसे में बीमा कंपनी को ही मुआवजा देना होगा।

वकील की चूक पर नाराज हुआ हाई कोर्ट

सुनवाई के दौरान अदालत ने पीड़ित के वकील के रवैये पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा बढ़ाने के लिए अलग से अपील या आपत्ति दाखिल की जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अदालत ने इसे पेशेवर जिम्मेदारी निभाने में कमी बताया। हालांकि अदालत ने साफ किया कि वकील की गलती का नुकसान पीड़ित को नहीं उठाना चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मुआवजा बढ़ाने का फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि न्याय का उद्देश्य केवल कानून की प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि पीड़ित को वास्तविक राहत पहुंचाना भी है।