गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक गांव में जमीन अधिग्रहण के पुराने विवाद को लेकर बड़ा विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया है। किसानों का आरोप है कि प्रशासन दबाव दबाव डालकर और पुलिस से मिलीभगत करके उनकी खेती की जमीन के लिए बहुत कम मुआवजा दे रहा है। यह आंदोलन अब धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है।
स्थानीय किसान समूह की अगुवाई में चल रहा यह आंदोलन अब सुरेंद्रनगर के अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच बड़े टकराव में बदल गया है। किसानों का दावा है कि उन्हें मौजूदा बाजार रेल से बहुत कम मुआवजे पर औद्योगिक या इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट के लिए जमीन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
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प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
इस विवाद ने जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया में पारदर्शिता, मुआवजे की पॉलिसी में एक समानता और जमीन के अधिकारों से जुड़े सिविल विवादों में कानून लागू करने वालों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।
किसानों के साथ आई कांग्रेस
किसानों के आंदोलन के बीच कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर किसानों के साथ में अंग्रेजों जैसा सलूक करने का गंभीर आरोप लगाया है। गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष अमित चावड़ा ने कहा, 'आज गुजरात में ब्रिटिश राज है, जहां किसानों को लूटा जा रहा है। बीजेपी ब्रिटिश नीतियों का पालन करते हुए किसानों पर ज़ुल्म कर रही है।'
अमिल चावड़ा ने आगे कहा, 'पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल करके किसानों को धमकाया और डराया जा रहा है। किसानों की अलग-अलग मांगों को लेकर गुजरात कांग्रेस और कई किसान संगठन गांधीनगर की ओर मार्च करने जा रहे हैं। बीजेपी किसानों को इससे रोक रही है। हम किसानों के लिए लड़ेंगे और उनकी आवाज को बुलंद करेंगे।'
पूरा विवाद समझिए
इस प्रदर्शन के वजह खेती की जमीन के लिए कम मुआवजा दिया जाना है। सरकार किसानों को पुराने समय के हिसाब से मुआवजा दे रही है। पुराने समय में इसे 'जंत्री रेट' कहा जाता था। किसानों ने इस प्रक्रिया पर ही आपत्ति जताई है। उनका दावा है कि ये आज के बाजार की असलियत को नहीं दिखाते हैं। मुआवजे का हिसाब 2011 के जंत्री रेल के आधार पर लगाया जा रहा है। किसानों का कहना है कि इन 15 सालों में जमीनों के रेट काफी बढ़े हैं, लेकिन सरकार इसे नहीं मान रही है।
किसानों का दावा है कि एक बीघा जमीन की मौजूदा बाजार कीमत लगभग 15-16 लाख रुपये है, जबकि सरकार लगभग 2 लाख प्रति बीघा मुआवजा दे रही है। उनका कहना है कि यह बड़ा अंतर गलत वैल्यूएशन है और इससे उन जमीन मालिकों को काफी आर्थिक नुकसान होता है जो अपनी रोजी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर हैं।
किसान मांग कर रहे हैं कि मुआवजे का हिसाब मौजूदा बाजार रेट के आधार पर लगाया जाना चाहिए, न कि पुराने सरकारी नियमों के आधार पर हो।
