श्री लाल बहादुर शास्त्री राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल नेरचौक में आउटसोर्स कर्मचारियों को हटाने का मामला अब गंभीर विवाद का रूप लेता जा रहा है। मामला केवल 13 कर्मचारियों के रोजगार छिनने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक कर्मचारी के आत्महत्या के प्रयास के बाद आउटसोर्स व्यवस्था, टेंडर प्रक्रिया और कर्मचारियों के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

 

आरोप है कि अस्पताल में लंबे समय से वार्ड ब्वॉय के रूप में सेवाएं दे रहे 13 कर्मचारियों को हाल ही में ड्यूटी से बाहर कर दिया गया। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें अचानक हटाए जाने से परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इसी तनाव के बीच घींऊधार, रिवालसर निवासी बलवंत सिंह ने कथित तौर पर अधिक मात्रा में दवाइयों का सेवन कर लिया। उसकी तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे नेरचौक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसका उपचार किया गया।

टेंडर बदला तो बदल गई कर्मचारियों की तस्वीर

इस पूरे विवाद के पीछे आउटसोर्स सेवाओं के नए टेंडर को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग आउटसोर्स कर्मचारी यूनियन ने 3 अक्तूबर को आरोप लगाया था कि एक सितंबर 2026 से टेंडर बदलने के बाद करीब 15 कर्मचारियों को काम से बाहर करने की प्रक्रिया शुरू हुई। यूनियन के अनुसार लगभग 100 कर्मचारियों में से 85 को ही दोबारा काम पर रखा गया, जबकि पुराने और अनुभवी कर्मचारियों को बाहर कर दिया गया।

 

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ऐसे में सवाल यह है कि वर्षों से अस्पताल में सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के अनुभव और उनकी सेवा अवधि का नए टेंडर में कितना महत्व रहा? क्या पुराने कर्मचारियों को प्राथमिकता देने अथवा उन्हें समायोजित करने की कोई व्यवस्था थी? इन सवालों पर अब कर्मचारी संगठन जवाब मांग रहे हैं।

कोविड काल में सेवाएं देने वालों का भी मुद्दा

यूनियन का दावा है कि प्रभावित कर्मचारियों में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने कोरोना महामारी के दौरान अस्पताल में अपनी सेवाएं दी थीं। उस दौर में जब अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों और सहयोगी स्टाफ पर भारी दबाव था, इन कर्मचारियों ने भी मरीजों की देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाईं। अब वही कर्मचारी अचानक रोजगार से बाहर होने के बाद अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। यूनियन ने इस मामले में सरकार और स्वास्थ्य विभाग से हस्तक्षेप की मांग की है।

 

नौकरी जाने के बाद तनाव में आए बलवंत सिंह द्वारा दवाइयों का अधिक सेवन करने की घटना ने मामले की गंभीरता बढ़ा दी। प्रारंभिक रिपोर्टों में उसकी जेब से कथित सुसाइड नोट मिलने की बात भी सामने आई थी, जिसमें नौकरी से हटाए जाने का जिक्र होने की जानकारी दी गई थी। हालांकि, बाद की पुलिस जांच में बलवंत सिंह के बयान दर्ज किए गए और पुलिस के अनुसार उसने किसी पर आरोप नहीं लगाया। पुलिस ने बताया कि उसने अधिक दवाइयां लेने की बात कही है और मामले की जांच जारी है। इस घटनाक्रम के बाद अस्पताल में काम कर रहे अन्य आउटसोर्स कर्मचारियों में भी चिंता का माहौल है। उनका कहना है कि यदि वर्षों की सेवा के बाद भी नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं है तो भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी रहेगी।

 

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विधायक ने अस्पताल पहुंचकर जाना हाल

घटना की सूचना मिलने के बाद बल्ह के विधायक इंद्र सिंह गांधी अस्पताल पहुंचे और उपचाराधीन कर्मचारी का कुशलक्षेम जाना। उन्होंने घटनाक्रम पर चिंता जताई। प्रभावित कर्मचारियों और उनके परिजनों ने मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच करवाने तथा नौकरी से हटाए गए कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने की मांग की है।

 

इस प्रकरण ने आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया पर भी बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि नए टेंडर के बाद पुराने कर्मचारियों को हटाने का आधार क्या था? क्या उन्हें पूर्व सूचना दी गई थी? क्या सेवा अवधि और अनुभव का कोई मूल्यांकन हुआ? और जिन कर्मचारियों को बाहर किया गया, उनके स्थान पर नई नियुक्ति की प्रक्रिया किस आधार पर हुई? फिलहाल पुलिस घटना की परिस्थितियों की जांच कर रही है, जबकि कर्मचारी संगठन प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कर रहा है।

घटना से तीन बड़े सवाल

1. नए टेंडर के बाद पुराने कर्मचारियों को हटाने का आधार क्या रहा?
2. वर्षों से सेवाएं दे रहे आउटसोर्स कर्मचारियों के अनुभव और सेवा अवधि का क्या होगा?
3. क्या ऐसी व्यवस्था है कि टेंडर बदलने पर मौजूदा कर्मचारियों के रोजगार का अचानक संकट न खड़ा हो?

नेरचौक मेडिकल कॉलेज की यह घटना अब केवल एक कर्मचारी के आत्महत्या के प्रयास का मामला नहीं रह गई है। इसने प्रदेश में सरकारी संस्थानों में लागू आउटसोर्स व्यवस्था और कर्मचारियों की रोजगार सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।