'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' वाले ट्रंप, अमेरिका को विलेन कैसे बना बैठे?
शांति के लिए नोबल पुरस्कार मांगने वाले डोनाल्ड ड्रंप ने पश्चिम एशिया को युद्ध में धकेल दिया है। वह मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नारे के साथ आए थे लेकिन उनके जैसी बदनामी अमेरिका को किसी ने नहीं दी।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। Photo Credit: DonaldTrump/X)
साल 2017 में जब एक दशक बाद रिपब्लिकन पार्टी सत्ता में आई तो डोनाल्ड ट्रंप, दुनिया के लिए उम्मीदों से भरे राजनेता की तरह उभरे। उन्होंने डेमोक्रेट्स को हाशिए पर धकेल दिया। वह नव राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर आए थे, उनका पहला कार्यकाल उपलब्धियों से भरा रहा। वह तब, 'अमेरिका प्रथम' की राजनीति कर रहे थे। उन्होंने न किसी देश के खिलाफ जंग छेड़ी, न ही किसी को धमकाया। साल 2017 में उन्होंने 'टैक्स कट्स एंड जॉब्स एक्ट' पारित किया। कॉर्पोरेट टैक्स की दरों में भारी कटौती की। रोजगार और निवेश बढ़ाने का सपना अमेरिका को दिखाया। भारत के साथ 5 साल के कार्यकाल में इतने करीबी रिश्ते हुए कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे अच्छे दोस्तों में से एक कहलाने लगे। दोनों ने कई कार्यक्रमों में एक-दूसरे को समर्थन दिया। डोनाल्ड ट्रंप न किसी देश के खिलाफ थे, न ही किसी को आज की तरह निगल जाने की धमकी दे रहे थे।
डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के साथ व्यापारिक जंग की शुरुआत की, चीनी सामानों पर टैरिफ लगाए। कई अहम समझौतों से पीछे हटे। पेरिस समझौता और ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकले। उन्होंने पश्चिमी एशिया के कई देशों के साथ नए तरह से संबंध बनाने की कवायद की। पहले कार्यकाल में ट्रंप ने मेक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने का वादा किया, फंड आवंटित किया, कुछ मुस्लिम देशों के नागरिकों की आवाजाही पर रोक लगाने की कोशिश की। कार्यकाल के अंतिम दिन, विवादित रहे। डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के इतिहास के पहले ऐसे राष्ट्रपति बने जिन पर दो बार महाभियोग चलाया गया।
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कहां से बदलने लगे ट्रंप के तेवर?
डोनाल्ड ट्रंप पर आरोप लगे कि उन्होंने राष्ट्रपति चुनावों में जो बाइडेन को हराने के लिए यूक्रेन से मदद ली थी। 6 जनवरी की कैपिटल हिल हिंसा के भी आरोप उन पर लगे। वह सीनेट से तो बरी हो गए लेकिन हमेशा के लिए बदल गए। कार्यकाल के आखिरी दिनों में दुनिया कोविड महामारी की चपेट में आ गई। अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था बुरी तरह फेल रही, उनके कार्यकाल पर सवाल उठे। वह नेपथ्य में चले गए।
साल 2021 से 2025 तक, डोनाल्ड ट्रंप हाशिए पर रहे। जो बाइडेन के कार्यकाल पर सवाल उठे। उन्हें अमेरिकी, कमजोर राष्ट्रपति मानने लगे। उन्होंने अफगानिस्तान से 30 अगस्त 2021 तक, पूरी सेनाएं वापस बुला लीं। उनकी चौतरफा आलोचना हुई। कार्यकाल के अंतिम दिनों में वह अजीब हरकतें करने लगे थे। उनकी उम्र और यादाश्त से संबंधित भ्रामक दावे भी खूब किए गए।
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'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' वाली पॉलिसी, बिगड़ी कैसे?
डोनाल्ड ट्रंप के लिए अमेरिका के बदलते हालात, अवसर की तरह थे। बाइडेन बीमार थे, कमला हैरिस पर उन्होंने खूब नस्लीय टिप्पणियां कीं, उन्हें भारत परस्त बताया और नैरेटिव की लड़ाई में हारते-हारते अचानक डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रत्याशित जीत हासिल की। जनवरी 2025 में उन्होंने जब सत्ता संभाली तो दुनिया के लिए वह संकट की तरह आए। उन्होंने अमेरिका, भारत, ब्राजील, कनाडा और मैक्सिको जैसे देशों पर भीषण टैरिफ लगाया, पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की तरफ आगे बढ़ने लगी। उनकी नीतियों ने कई देशों में आर्थिक अस्थिरता की हालत पैदा कर दी।
साल 2017 से 2021 तक डोनाल्ड ट्रंप जिस नरमी के साथ आगे बढ़ रहे थे, 2025 में उनके सलाहकारों ने उसे छोड़ने की सलाह दी। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने अपने अधिकारों और कार्यकारी शक्तियों का ऐसे दुरुपयोग किया, जैसा कोई अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं कर सका। यह बातें कई फेडरल अदालतें और सुप्रीम कोर्ट तक बोलनी पड़ी हैं। वैश्विक संस्थाओं की नजर में उनके दूसरे कार्यकाल के कुछ कठोर फैसलों ने उन्हें एक विवादित छवि वाले राष्ट्रपति के तौर पर पेश किया।
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सलाहकारों ने बिगाड़ा ट्रंप को?
डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में जिम मैटिस और रेक्स टिलरसन जैसे सलाहकार थे। तब वह ज्यादा अमेरिका की पारंपरिक नीतियों के हिसाब से काम कर रहे थे। वह बहुत आक्रामक फैसले नहीं ले रहे थे। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में आक्रामक नीतियों वाले चेहरों को जगह दी। वह 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' और 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति पर इस हद तक निर्भर हो गए कि उन्होंने एलन मस्क जैसे उद्योगपतियों को 'डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी' का हेड बना दिया था। उन्होंने इतनी छंटनी कराई कि अमेरिका में नौकरियों का संकट पैदा हो गया। कई सरकारी कर्मचारी बेरोजगार हुए, उनकी जगह राजनीतिक नियुक्तियां की गईं। उन्होंने अपने साथ सिर्फ उन वफादारों को रखा, जो उनकी नीतियों को बना किसी सवाल के लागू करते थे।
चीन से टैरिफ पर लड़ाई थी, दुनियाभर को शिकार बनाया
डोनाल्ड ट्रंप जहां सिर्फ चीन के विरोधी थे, उन्होंने यूनिवर्सल बेस टैरिफ की नीति अपनाई। उन्होंने भारत जैसे मित्र देशों को भी नहीं बख्शा। पहले 15 फीसदी टैरिफ लगाया, चीन पर 100 फीसदी से ज्यादा टैरिफ लगाया। यहां तक भी ठीक था। उन्होंने रूस के साथ व्यापार करने की वजह से भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। वह भारत पर, अपने मनचाहे फैसले लाद रहे हैं। महीनों की अस्थिरता के बाद अब भारत और अमेरिका के बीच 18 फीसदी टैरिफ पर बात बन पाई है। डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के ज्यादातर देशों के खिलाफ टैरिफ लगाया, जिसके बाद उनकी छवि आर्थिक विलेन के तौर पर बनती चली गई।
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प्रवासियों के हाथों में बेड़ियां, अपमानित कर देश निकाला किया
डोनाल्ड ट्रंप पहले कार्यकाल में जहां सिर्फ 'मुस्लिम बैन' और मेक्सिको की दीवार बनाने की कवायद तक सीमित रहे। स्थानीय अदालतें उन्हें फटकारतीं रहीं। दूसरे कार्यकाल में वह अपने कार्यकारी शक्तियों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करने लगे। उन्होंने 'लेकेन रिले ऐक्ट' का इस्तेमाल किया, अवैध प्रवासियों को हथकड़ियां पहनाकर, अमानवीय तरीके से अमेरिका के बाहर धकेला। दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों ने इसकी आलोचना की।
NATO से दूरी और उलझी हुई नीतियां
पहला कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) जैसे संगठनों की आलोचना की लेकिन उनसे बाहर नहीं निकले। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने अमेरिकी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल सीरिया, ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों में बिना अमेरिकी संसद की मंजूरी से की। उन्होंने इजरायल की तरफ अपना झुकाव दिखाया लेकिन वैश्विक अशांति की सबसे बड़ी वजह बने। उनकी वजह से पश्चिम एशिया के देश आग में सुलग रहे हैं।
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'अमेरिका फर्स्ट' बोलकर अमेरिका को ही अलग कर बैठे
डोनाल्ड ट्रंप जब सत्ता में आए तो उन्होंने अमेरिका प्रथम की नीति पर चलने की बात कही थी। दूसरे कार्यकाल में उनकी नीतियों की वजह से ज्यादातर बड़े देश, अमेरिका से दूर होते चले गए। जो साथ हैं, डर की वजह से हैं। उन्होंने दशकों पुराने समझौतों पर सवाल उठाए। NATO पर सवाल उठाए। जो देश, अमेरिकी सुरक्षा के भरोसे थे, वे ही अमेरिका पर अनिश्चित हो गए। डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से पल्ला झाड़ लिया। पर्यावरण के मुद्दे पर दुनिया से अलग राह पर काम करने लगे।
डोनाल्ड ट्रंप, न्यूक्लियर डील से अचानक बाहर निकले और इकतरफा जंग जैसे मोड में आ गए। परमाणु पर मोनोपॉली वाले 5 देशों में अमेरिका अहम देश था। रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम तो ईरान न्यूक्लियर डील पर साथ रहे लेकिन अमेरिका ने पल्ला झाड़ लिया। ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला बोला, जबकि समझौता यह था का ईरान परमाणु पर संयत व्यवहार अपनाएगा। ईरान ने जवाब में यूरेनियम का 60 फीसदी तक संवर्धन कर लिया।
ट्रंप ने और क्या-क्या किया कि मुसीबतें बढ़ीं?
डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की बकाया राशि तक नहीं चुकाई है। उन्हें 2380 करोड़ रुपये विश्व बैंक को देने थे, उन्होंने देने से इनकार कर दिया। यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) के हजारों कर्मचारियों को बाहर निकाला, अफ्रीकी देश जो स्वास्थ्य और खानपान के लिए अमेरिका पर निर्भर थे, उनसे अचानक डोनाल्ड ट्रंप ने कन्नी काट ली।
डोनाल्ड ट्रंप ने राजनायिक संबंधों को बिजनेस डील बना दिया। उन्होंने अपने आर्थिक मुनाफे और अपनी तय की गई नीतियों के आधार पर दुनिया में आर्थिक अस्थिरता पैदा की। वह खुद रूस से गैस खरीदते रहे, भारत पर तेल खरीदने के लिए टैरिफ थोपते गए। यही हाल, उन्होंने दूसरे देशों के साथ भी किया। ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसदी टैरिफ थोपा। जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी से सुरक्षा के बदले पैसे मांगने लगे।
डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के साथ बल्कि कनाडा, मेक्सिको और यूरोपीय संघ पर भारी टैरिफ लगाए। डोनाल्ड ट्रंप के इस रवैये ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता पैदा की। ट्रंप के फैसलों की वजह से कई देशों में शेयर बाजार आज तक अस्थिर बने हुए हैं, निवशकों को करोड़ों रुपये डूब चुके है। अमेरिका अब दुनिया के कई देशों की नजरों में 'आर्थिक हमलावर' की तरह है।
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अप्रत्याशित है डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति
सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर डोनाल्ड ट्रंप किसी भी फिल्टर में भरोसा नहीं रखते हैं। उन्हें झूठ बोलने से गुरेज नहीं है। वह भारत के खिलाफ सार्वजनिक मंच से कई झूठ बोल चुके हैं। उनकी आक्रामक भाषा और अचानक लिए गए फैसलों की वजह से अब सहयोगी देश भी उनसे कतरा रहे हैं। पहले दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच हुई बातचीत गोपनीय रहती थी, उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से हुई वॉट्सऐप चैट तक लीक कर दी।
मामले, जिन्होंने ट्रंप और अमेरिका दोनों को बनाया विलेन
- वेनेजुएला: जनवरी 2026 में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सेना को वेनेजुएला पर आक्रमण करने की इजाजत दी। अमेरिकी सैनिक, लड़ाकू विमानों से वेनेजुएला के राष्ट्रपति भवन मिराफ्लोरेस पैलेस पहुंचे और हमला कर दिया। महज कुछ मिनट में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अगवा कर लिया। अमेरिका की छवि साम्राज्यवादी लुटेरे देश की तरह बनी, जिसका मकसद सिर्फ अपने हितों के लिए दुनिया को तबाह करना है। उन्होंने वेनेजुएला के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा भी किया।
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- ग्रीनलैंड: डोनाल्ड ट्रंप न अंतरराष्ट्रीय नियम मानते हैं न ही संप्रभुता का ख्याल करते हैं। उन्होंने डच नियंत्रण वाले ग्रीनलैंड पर अपना दावा ठोका और कहा कि वह पूरा नियंत्रण चाहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका इस्तेमाल रूस और चीन कर सकते हैं जो अमेरिका को बर्दाश्त नहीं है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स फ्रेडरिक नीलसन ने उनकी खूब आलोचना की।
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- ईरान: डोनाल्ड ट्रंप ने 28 फरवरी को यह तय किया कि वह ईरान पर हमला करेंगे। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की अगुवाई में अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सेनाओं ने ईरान पर हमला बोला। ईरान में भीषण तबाही मचाई। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई मारे गए। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) की शीर्ष नेतृत्व, ईरानी सेना का शीर्ष नेतृत्व अमेरिका ने खत्म किया। ईरान भी भड़का। जवाबी कार्रवाई हुई। ईरान में सैकड़ों मौतें हुईं, ईरान ने खाड़ी के देशों और अमेरिकी सहयोगियों पर हमला बोला।
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- ईरान ने न पहले इजरायल पर हमला किया था, न ही अमेरिकी सैन्य ठिकानों। अमेरिका-इजरायल ने मिलकर पहले भी नवंबर 2025 में ईरान पर हमला बोला था, उस हमले की भी दुनिया ने खूब आलोचना की थी। अब नए विवाद की वजह से दुनिया के कई देशों में तेल संकट की स्थिति पैदा हो रही है। ईरान ने अपनी सुरक्षा में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद किया है। भारत और बांग्लादेश जैसे देशों में तेल और गैस संकट पैदा हो गया है। अमेरिका को दुनिया के कई देश, अब विलेन की तरह देख रहे हैं।
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