भारत में पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की नीति यानी E20 का असर सिर्फ गाड़ियों के ईंधन पर ही नहीं पड़ रहा है। इसका असर खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता है। खासकर अंडे और चिकन की कीमतों पर इसका असर देखने को मिल रहा है। दरअसल, एथेनॉल बनाने के लिए मक्के की खपत बढ़ रही है। मक्का पोल्ट्री फीड में भी बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होता है। ऐसे में मक्के की कीमत बढ़ने का सीधा असर पोल्ट्री फीड और फिर अंडे-चिकन की कीमतों पर पड़ सकता है।
नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) के मुताबिक, पिछले एक साल में अंडों की कीमत करीब 35-40% बढ़ी है। फिलहाल पोल्ट्री फार्म से निकलने वाले एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपये है, जबकि खुदरा बाजार में यह 8.50 से 9 रुपये तक बिक रहा है। सर्दियों में मांग बढ़ने के कारण कीमतों में और तेजी की आशंका जताई जा रही है।
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एथेनॉल के लिए बढ़ी मक्के की मांग
एथेनॉल और अंडे की कीमत के बीच सीधा कनेक्शन मक्के का है। एथेनॉल बनाने में बड़ी मात्रा में मक्का इस्तेमाल होता है, जबकि पोल्ट्री कंपनियां भी मुर्गियों के दाने यानी फीड के लिए मक्के पर काफी निर्भर रहती हैं। ऐसे में एथेनॉल कंपनियों की मक्के की मांग बढ़ने से पोल्ट्री उद्योग के लिए मक्का महंगा या कम उपलब्ध हो सकता है। इसका असर आगे चलकर अंडे और चिकन की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
NECC के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, देश में पैदा होने वाले कुल मक्के का करीब 37% हिस्सा अब एथेनॉल डिस्टिलरी में जा रहा है। संसद के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 4.34 करोड़ टन मक्के का उत्पादन होता है, जिसमें लगभग 1.7 करोड़ टन एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है।
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मक्के की कीमत करीब तीन साल पहले 14 हजार रुपये प्रति टन थी, जो अब बढ़कर लगभग 26,500 रुपये प्रति टन हो गई है। पिछले पांच महीनों में ही इसकी कीमत करीब 20% बढ़ी है। भारत में पैदा होने वाले मक्के का करीब 60% हिस्सा पोल्ट्री सेक्टर इस्तेमाल करता है। मक्का और सोयाबीन की कीमत बढ़ने से पोल्ट्री फीड महंगा होता है। इसका सीधा असर मुर्गी पालन की लागत पर पड़ता है और लंबे समय तक लागत बढ़ी रहने पर अंडे और चिकन भी महंगे हो सकते हैं।
सिर्फ E20 ही जिम्मेदार नहीं
हालांकि, अंडे और चिकन की कीमत बढ़ने के लिए सिर्फ एथेनॉल को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। गर्मी, मौसम में बदलाव, मुर्गियों की मृत्यु दर और दूसरे फीड सामग्री की कीमत भी पोल्ट्री उत्पादन लागत को प्रभावित करती है।
इस बीच मक्के से एथेनॉल उत्पादन तेजी से बढ़ा है। 2022 में यह करीब 10 लाख टन था, जो 2024 में 60 लाख टन से ज्यादा और अब करीब 1.7 करोड़ टन हो गया है। 2030 तक इसके करीब 2.5 करोड़ टन पहुंचने का अनुमान है। बढ़ती मांग के कारण भारत अब मक्का आयात भी कर रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में आयात करीब 10 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। ऐसे में घरेलू उत्पादन तेजी से नहीं बढ़ा तो मक्के की कीमत और पोल्ट्री लागत पर दबाव बना रह सकता है।
