मध्य पूर्व का एक ऐसा समुदाय जिसे अपनी सदियों पुरानी आजादी की तलाश है। इसके पास अपना देश नहीं है, लेकिन उम्मीद जरूर है। आज नहीं तो कल अपना देश, अपनी पहचान और अपनी ही सरकार होगी। इराक, सीरिया, तुर्की और ईरान तक फैली इनकी करोड़ों की आबादी दशकों से भय, उत्पीड़न, शोषण और अपमान का घूंट पी रही है। पिछले कई दशकों से इस समुदाय ने कई बड़ी जंगों में हिस्सा लिया। ईरान जंग में भी इनके इस्तेमाल की आवाज उठी, लेकिन अबकी बार यह समुदाय अमेरिका के झांसे में नहीं आया। 

 

हम बात कर रहे हैं दुनिया के सबसे बड़े राज्यविहान समुदाय वाले कुर्दों की। यह समुदाय इजरायल का करीबी है। अमेरिका से दोस्ताने रिश्ते हैं। मगर हाल ही में सीरिया में अमेरिका ने कुर्दों को दशक का सबसे बड़ा धोखा दिया। कुर्दों की जगह अमेरिकी सरकार सीरिया के कथित राष्ट्रपति अहमद अल शरा के साथ खड़ी दिखी, जबकि दशकों तक इस्लामिक स्टेट के खिलाफ जंग में कुर्द लड़ाकों ने अमेरिका के साथ खून-पसीना बहाया। अब ईरान युद्ध में अमेरिका को दोबारा कुर्दों की याद आई। मगर कुर्दों ने सीधे जंग में उतरने से मना कर दिया। आज की कहानी इन्हीं कुर्दों के इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र की...

 

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प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ओटोमन साम्राज्य का किला ढहा तो मध्य पूर्व में कई नए देशों का उदय हुआ। उस वक्त पश्चिमी ताकतों ने ओटोमन की जमीन पर कुर्द देश का प्रस्ताव रखा। 1920 में हुई सेवर की संधि ने 'कुर्दिस्तान' के सपने को और मजबूत किया। मगर तीन साल बाद 1923 में आजादी की लड़ाई के बाद तुर्की की सरकार ने पूरे अनोतिलियन प्रायद्वीप पर कब्जा कर लिया। इसी साल लॉजेन संधि के तहत तुर्की की सीमाओं का निर्धारण कर दिया गया। यहीं से कुर्द समुयदाय सीरिया, तुर्की, इराक और ईरान में बंट गया। उसका अपने देश का सपना भी अधूरा रह गया है।

 

 

कुर्द हैं कौन?

कुर्द समुदाय विविधता से भरा है। इनकी कई बोलियां हैं। अधिकांश इंडो-यूरोपीय भाषा कुर्दिश बोलते हैं। अधिकांश कुर्दों का संबंध सुन्नी मुस्लिम समुदाय से है। मगर इनका अपना खान-पान, पहचान और पहनावा है। नवरोज कुर्दों का प्रमुख त्योहार है। कुर्द मध्य पूर्व के मूल निवासी है। वह इलाके के चौथे सबसे बड़े जातीय समूह का भी हिस्सा है। 

विद्रोह का इतिहास

ईरान में 16वीं शताब्दी में कुर्दों ने सफवी राजवंश के खिलाफ विद्रोह किया था। बदले में उन्हें देश से निर्वासन झेलना पड़ा। ईरान में 1501 से 1736 तक सफवी राजवंश का का शासन रहा। ईरान का इस्फहान शहर इस राजवंश की राजधानी था। उधर, इराक में 1980 से 1090 तक सद्दाम हुसैन के अल-अनफाल अभियान के कारण हजारों कुर्दों को अपना घर छोड़ना पड़ा। एक अनुमान के मुताबिक करीब 12 लाख कुर्द कुर्दिस्तान छोड़कर भाग गए। पश्चिमी देशों में बसे अधिकांश कुर्द (करीब 80 फीसद) तुर्की से हैं। दूसरे स्थान पर इराक से आए कुर्दों की संख्या है।

 

 

 

ईरान: ईरान की कुल आबादी में करीब 8-17 फीसद तक कुर्दों की संख्या है। ईरान की मौजूदा सरकार भी कुर्दों के दमन के आरोप लगते हैं। उन्हें सियासी पहचान, भाषा और संस्कृति के आधार पर भेदभाव झेलना पड़ता है। भेदभाव का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि ईरान में सबसे अधिक गरीबी कुर्द इलाके में है। अलग देश की मांग करने वाले कुर्द अक्सर बंटे दिखते हैं। अलग-अलग संगठन और अलग-अलग पार्टियों के माध्यम से आपस में भी कई बार लड़ चुके हैं।

 

ईरान के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित तीन राज्य- कुर्दिस्तान प्रांत, करमानशाह प्रांत और पश्चिमी अजरबैजान प्रांत कुर्द इलाके में आता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कुर्दों ने सोवियत संघ की मदद से ईरान के महाबाद शहर को अलग देश के तौर पर स्थापित किया। हालांकि बाद में जब सोवियत संघ ने ईरान छोड़ा तो महाबाद भी ढह गया। 

 

ईरान के पहलवी राजवंश ने कुर्दों का खूब दमन किया। 1979 में जब इस्लामिक क्रांति हुई तो कुर्दों ने अयातुल्ला खुमैनी का साथ दिया। मगर सत्ता में बैठने के बाद खुमैनी को भी कुर्दों से खतरा लगने लगा। इसके बाद उनका खूब दमन हुआ। क्रूर यातनाएं दी गईं। गांव के गावं साफ कर दिए गए। नतीजा यह है आज भी ईरान की सरकार और कुर्दों के बीच मधुर संबंध नहीं हैं। ईरान में आज 'पार्टी फॉर ए फ्री लाइफ इन कुर्दिस्तान' अलग राज्य का दबाव बना रही। ईरान की सरकार ने इसे उग्रवादी संगठन घोषित कर रखा है।

 

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तुर्की: दुनिया में सबसे अधिक कुर्द आबादी तुर्की में है। कुर्दों को सबसे अधिक दमन भी यही झेलना पड़ा है। ओटोमन साम्राज्य से एर्दोगन के शासन तक कुर्दों को मिटाने की खूब सरकारी कोशिशें चलीं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तो एर्दोगन पर कुर्दों के नरसंहार का आरोप लगाते हैं। तुर्की में कुर्दों की सबसे बड़ी सियासी पार्टी कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) है। हालांकि तुर्की की सरकार ने इसे आतंकी संगठन घोषित कर रहा है। उसके संस्थापक अब्दुल्ला ओकलान साल 1999 से जेल में बंद हैं। 90 के दशक के आखिरी तक तुर्की में कुर्दों के पास नागरिकता का अधिकार नहीं था।

 

सीरिया: कुर्द सीरिया का सबसे बड़ा जातीय समूह है। उत्तर पूर्व सीरिया में इनकी सबसे अधिक आबादी है। इस क्षेत्र को रोजावा के नाम से जाना जाता है। 2003 में तुर्की की कुर्दिस्तान वर्कस पार्टी के सहयोग से सीरिया में डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी का गठन किया गया। यह कुर्दों का अपना सियासी दल है। कुर्द राष्ट्रीय परिषद दूसरी पार्टी है। 2011 में इराक के कुर्द नेता मसूद बरजानी की देखरेख में कुर्द राष्ट्रीय परिषद नाम की पार्टी का गठन किया गया। इसमें करीब 15 दल शामिल हैं। 

 

सीरिया में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ जंग में कुर्दों ने अहम भूमिका निभाई। उनकी वीरता के आगे एसआईएसआई के आतंकियों को कुर्द इलाका छोड़ना पड़ा। कुर्द बलों को अमेरिकी समर्थन हासिल था। हथियार से गोला-बारूद तक की सप्लाई वाशिंगटन से हो रही थी। हालांकि बशर अल असद की सरकार में कुर्दों को खूब दमन झेलना पड़ा। सीरिया में 2011 तक कुर्दों को वोट देने का अधिकार नहीं था। असद के शासन में अपनी भाषा बोलने और सांस्कृतिक पर भी बैन था।  

 

इराक: बाकी तीन देशों की अपेक्षा इराक में कुर्दों को स्वायत्ता हासिल है। इराकी कुर्दिस्तान में कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार की सत्ता है। एरबिल इसकी राजधानी है। यह पूरा इलाका तेल से समृद्ध है। सरकार की आय का मुख्य जरिया ही कच्चा तेल है। इनकी अपनी सेना है, जिसे पेशमर्गा कहा जाता है। 

 

1979 में पहली बार स्वायत्त इराकी कुर्दिस्तान की स्थापना हुई। हालांकि चार साल बाद 1974 में इराक सरकार के साथ कुर्दों का समझौता टूट गया। पूरा इलाका गृह युद्ध में फंस गया। सद्दाम हुसैन ने कुर्दों लोगों पर रासायनिक हथियारों से हमला किया। बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। वहीं बचे लोगों को अपना घर-द्वार छोड़ना पड़ा। भीषण नरसंहार के बाद 1990 में इराक की सेना वापस चली गई। कुर्दों ने अपना स्वायत्त इलाक स्थापित की। अमेरिका ने भी उनका समर्थन किया और पूरे इलाके को नो फ्लाइंग जोन घोषित कर दिया। 

 

1992 में पहली बार कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार की स्थापना हुई। दो साल बाद यानी 1994 में कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी और कुर्दिस्तान पैट्रियटिक यूनियन के बीच गठबंधन टूट गया।  सरकार गिरते ही पूरे इलाके में गृह युद्ध शुरू हो गया। चार साल यानी 1998 तक चले गृह युद्ध के बाद दोनों दलों ने अमेरिका में एक शांति समझौता किया। 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया तो कुर्दों की सेना यानी पेशमर्गा ने अमेरिका का साथ दिया। सद्दाम हुसैन के खिलाफ भीषण जंग लड़ी। सद्दाम हुसैन की मौत के बाद इराक में नया संविधान बना। इसमें कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार को मान्यता दी गई। 

 

हर किसी ने धोखा दिया

ईरान का धोखा: 1980 में इराक और ईरान के बीच जंग छिड़ी। जंग में इराकी कुर्दों ने ईरान का साथ दिया। तेहरान को अपनी जमीन को इस्तेमाल करने दिया, ताकि सद्दाम हुसैन को शिकस्त दी जा सके। कुर्दों का मानना था कि अगर ईरान जंग जीतेगा तो उसे कुर्दिस्तान के नाम से अलग राज्य स्थापित करने का मौका मिलेगा। नतीजा यह हुआ कि सद्दाम हुसैन ने कुर्दों के गांव के गांव साफ कर दिए। उधर, ईरान ने भी जंग के बाद कुर्दों पर दमन शुरू कर दिया। जिस ईरान का उन्होंने साथ दिया था, उससे भी धोखा हाथ लगा। 

 

तुर्की का धोखा: पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ। दुनिया का नक्शा नया आकार ले रहा था। मध्य पूर्व में भी बड़े बदलाव होने लगे थे। आटोमन साम्राज्य टूट चुका था। पश्चिम ने सेवरस की संधि का ऐलान किया। इसमें कुर्दिस्तान नाम से एक अलग देश का उल्लेख किया गया। जनमत संग्रह की बात कही गई। इस बीच तुर्की में कमाल अतातुर्क की अगुवाई में आजादी की लड़ाई छिड़ गई। जब जंग छिड़ी तो एक नए तुर्की गणराज्य की स्थापना हुई।

 

बाद में तुर्की ने सेवरस की संधि को खारिज कर दिया। उसकी जगह 1923 में लॉजेन की संधि का ऐलान किया। नतीजा यह हुआ कि अनातोलियन प्रायद्वीप और तुर्क कुर्दिस्तान का हिस्सा तुर्की में मिला दिया गया। इस तरह कुर्दों का अपना देश बनाने का सपना आज से करीब 103 साल पहले ही चकनाचूर हो चुका था।

 

कुर्दों का सपना टूटा, हिम्मत नहीं। कुर्दों ने जब-जब स्वायत्ता और अलग देश की आवाज उठाई तो उन्हें इराक, ईरान, तुर्की और सीरिया की सरकारों से सिर्फ आश्वासन मिला। हालांकि 90 के दशक में इराक ने कुर्दों को अलग स्वायत्त इलाका सौंप दिया, लेकिन तुर्की, सीरिया और ईरान ने हर बार धोखा दिया। कुर्द लड़ाकों ने इन धोखों का जवाब विद्रोह से दिया। 

कुर्द कौन-कौन से धर्मों को मानते हैं

2011 के प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन के मुताबिक 98% कुर्द सुन्नी मुस्लिम हैं। बाकी दो 2% का संबंध शिया मुस्लिमों से है। कुछ कुर्द ईसाई और यहूदी धर्म को भी मानते हैं। यह लोग अरामाइक भाषा बोलते हैं। कहा जाता है कि ईसा मसीह भी यही भाषा बोलते थे। बाइबिल में मेदियों नाम की प्राचीन सभ्यता का जिक्र है। माना जाता है कि कुर्दों का संबंध इसी सभ्यता से है। यह जातीय समूह अरब नहीं है। छठी शताब्दी में अरब आक्रमण के बाद इस्लाम स्वीकार किया। उससे पहले कुर्द ईसाई धर्म को मानते थे।

 

 


      कुर्दिस्तान कोई देश नहीं है, लेकिन यह एक विशाल भूभाग है। इसकी सीमा ईरान, इराक, सीरिया और तुर्की तक फैली हैं।



क्या धर्म निरपेक्ष होते हैं कुर्द?

कुर्द जातीय समुदाय ठीक वैसे ही उदार माना जाता है जैसे भारत में हिंदू। यह समूह धार्मिक सहिष्णुता का पालन करता है। सभी धर्मों को एक समान मानता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास है। कुर्दों की धर्म निरपेक्षता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि 2012 में इराक की केंद्र सरकार ने स्कूलों में मौलानाओं की नियुक्ति कर दी। मगर कुर्द क्षेत्रीय सरकार ने इस फैसले को मानने से मना कर दिया और कहा कि उसके स्कूल धार्मिक रूप से बिल्कुल तटस्थ रहेंगे। 

कुर्दों का सांस्कृतिक दमन

इराक में कुर्द काफी हद तक स्वायत्त हो चुके हैं। तुर्की, सीरिया और ईरान में आज भी उन्हें दमन का सामना करना पड़ता है। यहां की सरकारों ने व्यापक अभियान का सहारा लिया, ताकि कुर्दों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को मिटाया जा सके। कुर्द लोगों को अपने बच्चों के नाम बदलने पड़ते थे, तब उनका स्कूल में दाखिला होता था। कुर्दिश संगीत, कपड़े और किताबों को छिपाकर रखना पड़ता था। पकड़े जाने पर जेल की हवा खानी पड़ती थी। कुर्दों को चौक-चौराहों, सार्वजनिक मंचों, स्कूल और कॉलेज में अपनी भाषा बोलने का भी अधिकार नहीं था। 

खेल-कूद में भी कुर्द

कुर्द लोग कालीन बुनाई और तांबे का काम मुख्य तौर पर करते हैं। कढ़ाई और चमड़े के काम में भी कुर्दों को महारत हासिल है। यह समुदाय खेल खूद में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। घुड़दौड़, कुश्ती, निशानेबाजी, शिकार और फुटबॉल प्रमुख खेल हैं।

 

हिंदुओं की तरह ही कुर्दों में श्रुति परंपरा है। 'लॉज' नाम का ग्रंथ इनका सबसे लोकप्रिय महाकाव्य है। इसमें प्रेम और युद्ध की रोमांचक कहानिया हैं। 'शराफनामा' में कुर्दों का विस्तृत इतिहास मिलता है। 1596 में बिट्लिस के अमीर शराफ खान ने फारसी भाषा में यह किताब लिखी थी। 1695 में मेमोजिन नाम के एक महान कुर्दिश राष्ट्रीय महाकाव्य को अहमद खानी ने लिखा था। माना जाता है कि कुर्दिश साहित्य की शुरुआत सातवीं शताब्दी में हुआ था।

 

कुर्दों के प्रमुख वाद्ययंत्र

  • ढोल
  • गिटार जैसा उत-उत वाद्ययंत्र
  • बांसुरी


कुर्दों के सियासी दल

 

तुर्की

  • फ्री कॉज पार्टी
  • पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी
  • कुर्दिस्तान वर्कस पार्टी-  तुर्की में विद्रोही का दर्जा
    -सीरिया के डेमोक्रेडिट यूनियन पार्टी और ईरान की पार्टी फॉर ए फ्री लाइफ इन कुर्दिस्तान से गठबंधन।

इराक

  • कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी (मसूद बरजानी)
  • पैट्रोयोटिक यूनियन ऑफ कुर्दिस्तान (जलाल तलाबानी)
  • गोरान मूवमेंट फॉर चेंज

 

 

कैसे-कैसे बदली कुर्दों की पहचान?

  • 7वीं शताब्दी में अरब ने आक्रमण किया तो कुर्द ने इस्लाम अपना लिया।
  • 16वीं शताब्दी में ओटोमन के हमले के बाद सुन्नी मुसलमान बने।
  • फारसी हमले के बाद खुद को शिया मुसलमान कहने लगे।