अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में पीएम मोदी के साथ मुलाकात के दौरान एक बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि अगर भारत पर हमला होता है तो अमेरिका मदद को आगे आएगा। मगर अगले पल ही ट्रंप मुस्कुरा पड़ते हैं। यही से उनके बयान पर अविश्वास पैदा होना लाजिमी है। हालांकि अमेरिकी मीडिया को पहले से पता था कि ट्रंप अधिकांश बातें सिर्फ मजाक में कहते हैं।
तभी तो फॉक्स न्यूज ने लिखा, 'राष्ट्रपति ट्रंप ने मजाक में कहा कि जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को लीड कर रहे हैं, तब तक अमेरिका भारत की रक्षा करने के लिए तैयार है।' अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या ट्रंप के बयान पर हमें विश्वास करना चाहिए। क्या ट्रंप अपनी बातों पर टिके रहते हैं। संघर्ष और संकट की स्थिति में भारत के साथ अमेरिका का कैसा व्यवहार रहा है।
इतिहास कुछ और बता रहा
ऐतिहासिक तथ्य की बात करें तो 1971 की जंग में अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था। बाद में जब भारत ने परमाणु बम बनाना शुरू किया तो अमेरिका ने खूब निगरानी की। परमाणु कार्यक्रम को प्रभावित करने का प्रयास किया। जब सफलता नहीं मिली तो एक नई चाल चली। अमेरिका ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को मूक समर्थन दिया और उसे फलने-फूलने दिया।
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ट्रंप की बातों से पलटने वाली फितरत
मौजूद राष्ट्रपति ट्रंप का एकदम अस्थिर व्यक्तित्व है। वह कब अपनी बात से पलट जाएं, किसी को नहीं पता। उनकी पलटीबाजी पर विकिपीडिया ने 'Trump Always Chickens Out' नाम से पूरा पेज ही बना रखा है। यहां उन घटनाओं का जिक्र है, जहां ट्रंप ने पलटी मारी।
रिश्ते बिगड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी
भारत के लिहाज से ट्रंप का पिछला कार्यक्रम काफी हद तक संतुलित था, लेकिन दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने उन कदमों को उठाने से बिल्कुल गुरेज नहीं किया, जिनकी वजह से भारत के साथ उसके रिश्ते बिगड़ सकते थे। ट्रंप ने एच-1बी वीजा नियमों को सख्त किया। भारतीय प्रवासियों के खिलाफ नफरत आम की। बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को अपमानित करके बेड़ियों में जाकड़ कर वापस भेजा।
भारत सरकार पर रूस से सस्ता तेल न खरीदने का दबाव बनाया। जब बात नहीं बनी तो 25 फीसद टैरिफ लगाया। 25 फीसद का रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया। कुल मिलाकर अमेरिका ने भारत पर सबसे अधिक 50 फीसद टैरिफ लगाया। डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को मरी हुई बताया। उनके मंत्रियों ने सार्वजनिक तौर पर भारत के खिलाफ बयानबाजी की। ट्रंप ने खुद भारत और चीन की तुलना नरक से की। इन कदमों से एक बात तो साफ है कि ट्रंप को भारत के साथ रिश्तों की परवाह नहीं है।
किसिंजर की बातों को सच करने में जुटे ट्रंप
ऐसे में सवाल उठता है कि जब रिश्तों की परवाह ही नहीं है तो संकट की घड़ी में ट्रंप कैसे साथ देंगे? अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने कहा था, 'अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन दोस्त होना घातक है।'आज ट्रंप की भारत के प्रति यही नीति है।
पाकिस्तान के प्रति झुकाव
अमेरिका भले भारत को अपना रणनीतिक साझेदार बताता हो, लेकिन पिछले साल मई में पाकिस्तान के साथ हुई झड़प में अमेरिका ने संतुलित पक्ष नहीं अपनाया। भारत की जगह अमेरिका अधिकांश पाकिस्तान की तरफ झुका था। भारत के पक्ष में कोई बयान तक नहीं किया। संघर्ष के बाद ट्रंप ने असीम मुनीर को लंच पर बुलाया। जमकर पाकिस्तान और मुनीर की तारीफ की।
ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक मंच से 8 फाइटर जेट क्रैश होने की बात कही। हालांकि उन्होंने यह कभी स्पष्ट नहीं किया कि ये फाइटर जेट किसके थे। फिर भी इन बयान ने भारत सरकार को काफी असहज किया।
भारत सरकार का कहना था कि उसने पाकिस्तान के अनुरोध पर ऑपरेश सिंदूर को बंद किया था। ट्रंप का रुख अलग ही रहा। उन्होंने भारत-पाकिस्तान समेत आठ जंग रुकवाने का 40 से अधिका बार दावा किया। भारत ने बार-बार खंडन किया और दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाता गया।
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भारतीय नाविकों पर हमला, दुख तक नहीं जताया
हाल ही में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान ने अपना पहरा कड़ा कर दिया है। जवाब में अमेरिका ने ईरानी पोर्ट की नाकेबंदी कर रखी है। जून महीने में ही अमेरिकी नौसेना ने तीन जहाजों पर मिसाइल से हमला किया। इनमें 3 भारतीय नागरिकों की जान गई। भारतीय विदेश मंत्री ने अपने अमेरिकी समकक्ष से बात की। बाद में अमेरिका ने जो बयान जारी किया, उसमें मौत पर दुख तो नहीं जताया गया लेकिन धमकी भरे स्वरों में चेतावनी की बू आ रही थी।
ट्रंप तो यूरोप के नहीं हुए
ट्रंप पर भरोसा करना काफी मुश्किल है। दशकों से अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला यूरोप आज ठगा सा महसूस कर रहा है। ट्रंप कई बार यूरोपीय देशों को नाटो से हटने की धमकी दे चुके हैं। सबसे खराब स्थित तब हुई जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात कही। न केवल नाटो सहयोगी डेनमार्क, बल्कि फ्रांस, यूके और जर्मनी भी हैरत में पड़ गए।
जापान से जॉर्डन तक, सब ठगे महसूस क्यों कर रहे?
जापान और उत्तर कोरिया की सुरक्षा काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर है। ईरान जंग के बीच अमेरिका ने इन देशों से अपने थाड सिस्टम को हटा लिया। जबकि दोनों देशों ने इस पर आपत्ति जताई। डोनाल्ड ट्रंप ने ताइवान को हथियार आपूर्ति की मंजूरी थी दी। मगर अभी तक अमेरिका ने ताइवान को हथियार नहीं भेजे है। इस सौदे में और देरी होने की उम्मीद है। उधर, चीन ने ताइवान को चारों तरफ से घेरना शुरू कर दिया है।
ईरान जंग के वक्त खाड़ी देशों को भी बड़ा सबक मिला। इन देशों की सुरक्षा अमेरिका के कंधों पर टिकी थी। जब ईरान ने भीषण बमबारी की तो अमेरिका ने इजरायल, अपने सैन्य अड्डों और सैनिकों को बचाने को प्राथमिकता दी। वहीं खाड़ी देशों को बेसहारा छोड़ दिया।
2020 में जब भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में संघर्ष हुआ तो अमेरिका न कोई मदद दी और न ही कोई बड़ा बयान दिया। भारत ने अकेले चीन का मुकाबला किया। इन सब उदाहणों से एक बात तो साफ है कि ट्रंप के बयान और कार्यशैली अलग-अलग होती है। ऐसे में उनके शब्दों पर विश्वास करना घातक होगा।


