सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक नया रक्षा समझौता हो गया है। नाटो के आर्टिकल 5 की तर्ज पर एक देश पर हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा। पिछले साल भी पाकिस्तान और सऊदी अरब ने ठीक ऐसा ही समझौता किया था। इसमें अब तुर्की को शामिल कर लिया गया है।

 

दुनियाभर में इसे न केवल ईरान, बल्कि इजरायल और भारत के खिलाफ उठाया गया बड़ा कदम बताया जा रहा है। समझौते में शामिल तीनों देशों के अपने-अपने हित और अपनी-अपनी दुश्मनी है। सऊदी अरब की ईरान से नहीं बनती है। पाकिस्तान और भारत में तनाव है। तुर्की और इजरायल के बीच जुबानी जंग वर्षों से चल रही है।

 

अब समझते हैं कि इस समझौते का भारत और इजरायल पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कैसे यह समझौता पाकिस्तान को मनमानी करने की छूट दे सकता है। सऊदी अरब पर ईरानी हमले होने की स्थिति में क्या हो सकता है। भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी तो क्या होगा। क्या सच में भारत को अधिक चिंतित होने की जरूरत है। 

 

यह भी पढ़ें: मिलिट्री कैंप पर हूती विद्रोहियों का बड़ा अटैक, 30 जवानों की मौत और 50 घायल

 

मध्य पूर्व में सऊदी अरब की सुरक्षा काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर है। ईरान के साथ जंग ने साबित कर दिया कि सिर्फ अमेरिका के भरोसे रहना जोखिम भरा है। इसके अलावा इराक में मौजूद ईरान समर्थित शिया मिलिशिया और यमन के हूती विद्रोही सऊदी अरब के सामने सबसे बड़ी टेंशन बने हैं। जंग के बीच ईरान भी कई बार हमला कर चुका है। कई बार तबाही मचाने की धमकी भी दी। इन सबसे निपटने के लिए सऊदी अरब को नए साझेदारों की तलाश थी। उसकी तलाश पाकिस्तान और तुर्की में आकर खत्म हुई। 

पाकिस्तान को इतना महत्व क्यों?

मुस्लिम जगत में पाकिस्तान परमाणु संपन्न इकलौता देश है। यही उसे सबसे अलग बनाता है। पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता करने पर तुर्की और सऊदी अरब को परमाणु छतरी का एहसास होता है। भले ही पाकिस्तान यह कहता है कि समझौते में परमाणु छतरी शामिल नहीं। पाकिस्तान के पास एक विशाल सेना है। युद्ध में लड़ने का अनुभव है। श्रमबल भी सस्ता है। सऊदी अरब इसका लाभ उठाना चाहता है। इसकी ऐतिहासिक वजह यह है कि पाकिस्तान की सेना पहले भी भाड़े पर सऊदी अरब की जंग लड़ चुकी हैं।

इस्लामाबाद को क्या मिलेगा?

  • पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। भारी भरकम कर्ज चढ़ा है। ऊर्जा संकट के बीच सऊदी अरब ही सबसे अधिक तेल आपूर्ति कर रहा है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि समझौते बदले उसे सऊदी अरब से आर्थिक मदद आसानी से मिल सकती है। 

 

  • पिछले साल भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को भारी तबाही मचाई थी। माना जा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को इस तरह का समझौता करने पर मजबूर किया, ताकि भविष्य में भारत को भारी तबाही मचाने से रोका जा सके।

 

  • ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने तुर्की में बने ड्रोनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। तुर्की ने कई अन्य तरह की सैन्य मदद पहुंचाई। नए रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान को तुर्की की सैन्य तकनीक तक पहुंच आसान होगी। युद्ध जैसी स्थिति में तुर्की अपने सैनिकों को भी तैनात कर सकता है। जैसा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी आशंका जताई गई थी कि तुर्की ने अपने ड्रोन एक्सपर्ट को इस्लामाबाद भेजा था।

 

तुर्की क्या चाहता है: अंकारा आज मध्य पूर्व में एक बड़ी आर्थिक और सैन्यशक्ति के तौर पर उभर रहा है। इजरायल के साथ तनाव खुलकर सामने आ चुका है। इजरायल की सेना ने भी अपना ध्यान तुर्की पर केंद्रित करना शुरू कर दिया है। पूर्व इजरायली प्रधानमंत्री नेफ्ताली बेनेट ने तो तुर्की को अगला ईरान तक बता चुके हैं। दुनियाभर में यह बात आम हो चुकी है कि बहुत जल्द इजरायल और तुर्की के बीच सीरिया में जंग हो सकती है।

 

तुर्की का मानना है कि जंग की स्थिति में पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और परमाणु छतरी का इस्तेमाल दबाव बनाने में किया जा सकता है। सऊदी अरब से सैन्य सहयोग होने पर लाल सागर में इजरायल की घेरबंदी की जा सकती है। भारत और इजरायल के बीच घनिष्ठ संबंध है, लेकिन पाकिस्तान के माध्यम से नई दिल्ली पर दबाव बनाया रखा जा सकता है।

 

सऊदी अरब: रियाद को अपने दुश्मनों के खिलाफ जंग में पाकिस्तान का इस्तेमाल करने की इजाजत मिलेगी। भले ही सऊदी अरब के पास भारी रक्षा उपकरण है। खूब पैसा है, लेकिन जंग के मैदान में उसकी सेना कुछ खास नहीं है। यही कारण है कि वह पाकिस्तान पर अधिक निर्भर है। बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक मारे भी जाते हैं तो रियाद को घरेलू स्तर पर दबाव नहीं झेलना पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षों में तुर्की ने सैन्य तकनीक खासकर ड्रोन के क्षेत्र में बेहद उन्नत किया है। सऊदी अरब अब तुर्की की इस सैन्य दक्षता का भी लाभ उठाना चाहता है। सऊदी अरब को भविष्य में ईरान से बड़े हमले का खतरा सता रहा है। वह इस समझौते को एक सुरक्षा की कुंजी के तौर पर इस्तेमाल करना चाह रहा है।

क्या सच में यह गठबंधन अपनी ताकत दिखा पाएगा?

अब सवाल यह है कि किसी एक देश पर हमला होने पर क्या सच में यह गठबंधन एक्टिव हो पाएगा। मान लीजिए कि ईरान ने सऊदी अरब पर हमला किया तो क्या पाकिस्तान और तुर्की तेहरान पर हमला करेंगे। इस स्थिति को खुद तुर्की ने यह साफ कर दिया है। तुर्की के एक अधिकारी ने बताया कि ईरान के हमले के जवाब में पाकिस्तान और तुर्की जंग का हिस्सा नहीं बनेंगे।

 

तुर्की के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि यह समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है। इसका अर्थ यह है कि हमला होने की स्थिति में तीनों देश सिर्फ एक-दूसरे की रक्षा करने में मदद करेंगे, न कि हमला करने वाले देश पर आक्रामण। 

 

यह भी पढ़ें: 20 मिनट में 7 धमाके, आसमान में धुआं ही धुआं, क्या दुबई में कुछ बड़ा हो गया?

 

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल भी ठीक ऐसा ही समझौता हुआ था। उसके बाद पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच जंग छिड़ी। लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि सऊदी अरब ने पूरी तरह से दूरी बनाए रखी। अमेरिका और इजरायल के साथ जंग में ईरान ने रियाद पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। तब पाकिस्तान भी सऊदी अरब के समर्थन में नहीं कूदा। इन घटनाक्रमों से नए समझौते पर भी सवाल उठने लगे हैं।

भारत के सामने चिंता क्या है?

भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहद जटिल है। नए समझौते में उन मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है, जैसे आतंकवाद या मौजूदा मामलों पर अगर भारत के साथ तनाव बढ़ता है तो क्या तुर्की और सऊदी अरब खुद को अलग रख सकते हैं। भारत की सैन्य कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ रही है। लेकिन यह समझौता पाकिस्तान को मनमानी करने की छूट दे सकता है। पाकिस्तान इसकी आड़ में भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार छेड़ सकता है, जैसा कि उसका इतिहास भी रहा है।

 

ऐसी स्थिति में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान को जिम्मेदार साबित करने की होगी। अगर भारत ने कोई सैन्य कदम उठाया तो सऊदी अरब और तुर्की समझौते के मुताबिक कोई न कोई कदम उठा सकते हैं। 

 

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल लिखते हैं, 'पहली नजर में यह भारत के हितों के लिए बहुत बुरा डेवलपमेंट है। टेक्स्ट में कोई कन्फ्यूजन नहीं है। तीनों देशों में से किसी पर भी हमला सभी के खिलाफ आक्रामण माना जाएगा। इसमें यह नहीं कहा गया है कि ऐसे मामले में देश एक-दूसरे से सलाह लेंगे। भाषा साफ है। क्या इसका मतलब यह है कि अगर पाकिस्तान के किसी बड़े आतंकी हमले का भारत जवाब देता है। क्या इसे सऊदी अरब और तुर्की के खिलाफ हमला माना जाएगा। हमें यूएई, इजरायल, ग्रीस और साइप्रस के साथ और विकल्प देखने होंगे और अफगानिस्तान के साथ भी। हमें ईरान से सलाह लेनी चाहिए।'

क्या भारत से उलझ सकता है सऊदी अरब?

कुछ विश्लेषकों की राय अलग है। उनका मानना है कि समझौते में भारत के खिलाफ कुछ नया नहीं है। सऊदी अरब ने पिछले साल ही ऐसा समझौता किया था। तुर्की अब आधिकारिक तौर पर इसका हिस्सा बना है, जबकि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वह खुलकर सामने आ चुका है। 

 

विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब और भारत के रिश्ते बेहद मजबूत हैं। दोनों देशों के आर्थिक हित भी गहरे हैं। पाकिस्तान से संघर्ष होने की स्थिति में रियाद सिर्फ कूटनीतिक दबाव डाल सकता है। वह युद्ध में उलझने का रास्ता नहीं चुनेगा।

अगर इजरायल ने तुर्की पर हमला किया तो...

तुर्की और इझरायल के बीच युद्ध निश्चित है। यह कब और कहां होगा... सिर्फ यह तय होना बाकी है। इजरायल में एक धारणा आम है कि ईरान के बाद तुर्की अगला निशाना होगा। मगर यह समझौता इस धारणा को बदल सकता है। इजरायल अब तुर्की से पहले पाकिस्तान पर फोकस करेगा, क्योंकि परमाणु संपन्न पाकिस्तान उसके अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। पाकिस्तान के बाद ही उसकी निगाह तुर्की की तरह घूमेगी।

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर तुर्की पर इजरायल ने हमला किया तो क्या रियाद दखल देगा। इसका जवाब पूरी तरह से न है। गाजा और लेबनान पर इजरायल की भारी तबाही के बावजूद रियाद चुप रहा। अमेरिका-इजरायल और ईरान में जंग छिड़ी तो रियाद ने चुपचाप तेहरान से समझौता कर लिया, ताकि उस पर होने वाले हमलों को रोका जा सके। ऐसे में सऊदी अरब सिर्फ तुर्की के लिए इजरायल से दुश्मनी मोल नहीं लेगा। 

तो कागजी शेर है सऊदी अरब!

इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर जैकब का कहना है, 'आपको यह समझना होगा कि सऊदी अरब अपनी सारी दौलत और हथियारों के बावजूद काफी हद तक एक कागजी शेर है। उसके पास भारी मात्रा में हथियार और धन है, लेकिन सैन्य रूप से वह रोजमर्रा की जिंदगी भी नहीं चला सकता। सऊदी अरब ने हूतियों से लड़ने की कोशिश की। अपने पास मौजूद सभी उन्नत क्षमताओं के बावजूद रियाद विफल रहा।'

 

उन्होंने आगे कहा, 'मुझे नहीं लगता कि तुर्क लोग सिर्फ इसलिए हूतियों पर हमला करने के लिए अपनी नौसेना भेजेंगे, क्योंकि उन्होंने सऊदी अरब पर हमला किया था। यह क्षेत्र के बारे में मेरे यथार्थवादी दृष्टिकोण से बिल्कुल मेल नहीं खाता।'

मक्का डिफेंस पैक्ट का इम्पैक्ट

पाकिस्तान के पास 170 परमाणु हथियार हैं। सऊदी अरब ओपेक का लीडर है। अंकारा और रियाद जी20 के सदस्य है। तीनों की अर्थव्यवस्था करीब 3 ट्रिलियन डॉलर है। 1000 लड़ाकू विमान और 20 लाख की सेना अब एक समझौते के नीचे आ गई है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक है, पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाला इकलौता मुस्लिम देश है और तुर्की नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना है।