दशकों की क्रांति के बाद नेपाल ने 28 मई 2008 को पहली बार लोकतंत्र देखा। 240 साल पुरानी राजशाही का दुखद अंत हुआ। नेपाल के राज परिवार को नारायणहिटी राजमहल छोड़कर पोखरा जाना पड़ा। उनकी संपत्तियां, उनका तंत्र, अब नेपाल की जनता का था। नेपाल ने रक्त रंजित क्रांतियों के कई दौर देखे लेकिन 2000 के दशक ने नेपाल की रूप-रेखा बदल दी। जब तक नेपाल में वीरेंद्र वीर शाह विक्रम राजा थे, भारत के साथ नेपाल के संबंध बेहद सुलझे और शांतिपूर्ण रहे। 1 जून 2001 को हुए शाही नरसंहार के बाद, सब बदल गया।  4 जून को नेपाल के राजा का पद ज्ञानेंद्र शाह ने संभाला लेकिन उन्होंने हिंसा का वह दौर देखा, जो नेपाल ने कभी नहीं देखा था। 

एक देश, जिसे बेहद शांत देश के तौर पर दुनिया जानती थी, वहां के लोकतंत्र की नींव ही खून के छीटों पर पड़ी। नेपाल ने 1996 से लेकर 2006 तक, गृह युद्ध का दौर देखा, लेकिन इतनी हिंसा नहीं देखी। माओवादी, सुरक्षाबल और आम नागरिक, हिंसा में जुल्म का दौर हर किसी ने देखा। नेपाल में माओवादी आंदोलन रक्तरंजित रहा है। उम्मीद थी कि जब माओवादी लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आएंगे तो भारत के साथ संबंध थोड़े सामान्य होंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कभी नरम, कभी गरम नेपाल के तेवर, मौसम की तरह बदलते रहे।

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माओवादी प्रभाव वाली सरकारों में कैसे रहे हैं रिश्ते?

ब्रिटिश नेपाली ज्यूरिस्ट, प्रोफेसर सूर्या सुबेदी नेपाल और भारत के संबंधों पर सन 2005 में एक रिसर्प पेपर तैयार किया था। 'लिबर डेमोक्रेसी नेपाल बुलेटिन, वॉल्यूम 1' नाम से आई इस स्टडी में यह बताया था कि नेपाल और भारत के रिश्ते कैसे होने चाहिए, माओवादी, नेपाल के साथ कैसे रिश्ते चाहते हैं।

प्रोफेसर सूर्या सुबेदी, ब्रिटिश नेपाली ज्यूरिस्ट:-
नेपाल में हो रही घटनाएं परेशान करने वाली हैं, भारत के लिए कूटनीतिक संकट की तरह है। भारत को शांतिपूर्ण नेपाल से लाभ मिलना चाहिए, नेपाल अगर अशांत और विवादों में रहा तो भारत को इसका नतीजा भुगतना पड़ेगा। नेपाल को अपने विशाल पड़ोसी पर संदेह नहीं करना चाहिए। भारत को यह तय करना चाहिए कि नेपाल में शांति लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की दखल न हो। 

 

ज्यूरिस्ट सूर्या सुबेदी ने अपने रिसर्च, 'लिबर डेमोक्रेसी नेपाल' में लिखा है, 'भारत और नेपाल की सीमाएं, खुली हैं और दोनों देश, साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़े हैं। साल 1950 में दोनों देशों के बीच 'शांति और मित्रता संधि' हुई, जिसके तहत, दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा-पासपोर्ट के आवाजाही कर सकेंगे, व्यापार कर सकेंगे, संपत्तियां खरीद सकेंगे, आर्थिक अनुदान के लाभार्थी हो सकते हैं। संधि में 10 अनुच्छेद हैं। 

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1950 की संधि पर ऐतराज क्या है?

नेपाल इसे असमान मानता है और भारत की नीति को पुरानी और दबदबे वाली नीति मानता है। नेपाल भारत से घिरा है, इसलिए आर्थिक विकास और रोजमर्रा की चीजों के लिए भारत पर निर्भर है। भारत, नेपाल को बिजली देता है। भारत और नेपाल के बीच कई जगहों पर सीमा विवाद हैं, कालापानी, लिपुलेख और महाकाली नदी संधि से जुड़े प्रावधानों को बदलने की मांग होती है। नेपाल चाहता है कि 1950 की संधि से अलग, नई संधि हो, जिससे विवाद सुलझे।

माओवादियों ने कैसे बिगाड़े भारत से रिश्ते?

नेपाल में साल 1990 के दशक में शुरू हुए माओवादी विद्रोह का मुख्य लक्ष्य राजतंत्र का अंत और भारत के साथ कथित 'असमान' संधियों को रद्द करना था। राजा ज्ञानेन्द्र ने 1 फरवरी 2005 को नेपाल की सत्ता हथियाने के लिए आपातकाल का एळान किया, परिस्थितियां बनने की जगह और बिगड़ गईं। लोकतंत्र और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाकार माओवादी राजनीतिक तौर पर और मजबूत हुए।

माओवादी भारत के खिलाफ इसलिए भी रहे क्योंकि नेपाल संकट के हल के लिए नेपाल की सेना को भारत ने कथित तौर पर सैन्य हथिया मुहैया कराए थे। भारत का रुख माओवाद के सख्त खिलाफ है। शुरुआत में नेपाल को हथियार मुहैया कराए, लेकिन राजकीय तख्तापलट के बाद सैन्य सहायता रोक दी। नेपाल की सरकारें यह बात भूल गईं लेकिन माओवादी नेता इसे याद रखते हैं। 

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भारत-नेपाल संबंध कैसे होने चाहिए?

नेपाल-भारत संबंधों पर नेपाली इतिहासकार प्रेम कुमार ठाकुर बताते हैं, 'भारत और नेपाल को अपने रिश्तों को नई राह पर ले जाना चाहिए। प्रधानमंत्री बालेन शाह कह रहे हैं कि भारत की जमीन भी हमने हड़पी है। यह उकसावे वाली बातें हैं। उनका जोर, अपने हितों पर होना चाहिए, न कि किसी तरह भारत के साथ टकराव बढ़ाने पर। कलापानी और लिपुलेख जैसे विवादों जल्दी सुलझेंगे नहीं तो न्यूतम समझौता होना चाहिए। महाकाली नदी संधि को दोनों पक्षों के लिए संतोषजनक तरीके से लागू करना होगा, दीर्घकालिक शांति इसी से आएगी। न नेपाल का गुजारा भारत बिना होगा, न ही भारत का नेपाल के बिना। पारस्परिक संधि, दोनों देशों के लिए जरूरी हैं। साल 1950 की पुरानी मित्रता संधि की जगह नई संधि बनानी चाहिए। 1965 के हथियार समझौते और अन्य किसी भी गुप्त समझौतों को औपचारिक रूप से रद्द करना चाहिए।'

दीपक ठाकुर, पत्रकार, कपिलवस्तु संदेश:-

कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा विवादों में हम स्पष्ट समाधान चाहते हैं। 2015 की नाकेबंदी ने दिखाया कि आर्थिक दबाव नेपाल की स्वतंत्र विदेश नीति को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकारें राष्ट्रहित को प्राथमिकता देकर चीन के साथ संतुलित साझेदारी बढ़ाती हैं। फिर भी, हम भारत के साथ खुली सीमा, व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों को महत्व देते हैं। सच्ची मित्रता केवल सम्मान, संवाद और पारस्परिक लाभ पर टिक सकती है, न कि एकतरफा प्रभाव पर। उम्मीद है कि यह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समझेंगे और हमारे प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह भी। 

नेपाली नागरिक, भारत के साथ रिश्तों पर क्या सोचते हैं?

विजय कुमार शुक्ल, नेपाल के कपिलवस्तु जिले के रहने वाले हैं। वह नेपाली कांंग्रेस के स्थानीय नेता हैं और बहादुरपुर के प्रधान रहे हैं।  बहादुरपुर में उनका गांव है। नेपाल और भारत के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा, 'मधेसियों की एक बड़ी आबादी का नेपाल के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता है। कभी भारत पराया देश नहीं लगा। मेरी बहू भारतीय नागरिक है, मेरी पत्नी नागरिक है। मेरा भी मूल देश भारत है। यहां की राजनीतिक पार्टियां, सिर्फ अपने स्वार्थों की वजह से भारत के साथ रिश्ते बिगाड़ना चाहते हैं। उन्हें पहाड़ी वोट चाहिए, पहाड़ियों को भारत से ज्यादा चीन से प्यार है। भले ही चीन के कर्ज के जाल में नेपाल फंस ही क्यों न जाए। बालेन शाह अगर भारत को तेवर दिखाते हैं तो वह उनका छद्म राष्ट्रवाद ही होगा, जिसकी नेपाल को जरूरत नहीं है।'

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विजय कुमार शुक्ल, नेता, नेपाली कांंग्रेस:-
नेपाल और भारत का तनाव, सिर्फ राजनीतिक है। मधेसी बनाम पहाड़ी की दरारें बहुत गहरी हैं। नेपालियों का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि नेपाल को अस्थिर करने की साजिश, भारत ने रची थी। हकीकत ऐसा नहीं है, भारत अपने दुश्मन देशों में भी कोई साजिश रचता नहीं है। कम से कम कूटनीतिक संदेश तो ऐसा नहीं ही जाता है। भारत का विरोध करके पहाड़ी इलाकों में सहानुभूति राजनीतिक पार्टियां बिटोरती हैं। मधेसी, भारत से बेहतर संबंध चाहते हैं। मधेस में सीटें कम हैं तो मधेस का ध्यान भी कम रखा जाता है। हम भारत के साथ हर हाल में दोस्ती का रिश्ता चाहते हैं, किसी तरह का टकराव नहीं।

नेपाल का शोक क्या रहा?

राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह भारत के साथ अच्छे रिश्तों के पक्षधर थे। उन्हें मधेसी और पहाड़ी दोनों तबके पूजते थे। 1 जून 2001 की रात डिनर पार्टी में युवराज दीपेंद्र ने अपने परिवार पर ही गोलियां बरसा दीं। उनके पिता राजा बीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या और राजकुमार निराजन गोलियों के शिकार बने। बीरेंद्र शाह की मौत के बाद थोड़े दीपेंद्र राजा बने लेकिन 4 जून को उनकी भी मौत हो गई। नेपाल में फिर ज्ञानेंद्र शाह राजा बने। 

ज्ञानेंद्र शाह का रिश्ता, भारत से बेहतर रहा लेकिन उनका स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया। नेपाल में राजशाही खत्म करने की मांग होने लगी,क्रांति हुई तो नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया। नेपाल में राजा ज्ञानेंद्र के बाद जो भी सत्ता में आया, भारत के साथ उसके संबंध उतार-चढ़ाव भरे ही रहे। वह भी तब, जब नेपाल ऊर्जा लेकर खाद्य सामग्रियों तक के लिए भारत पर निर्भर है।