इजरायल ने लेबनान के साथ होने वाली बातचीत से पहले हिजबुल्लाह के साथ सीजफायर करने से इनकार कर दिया है। अगले हफ्ते वॉशिंगटन में दोनों देशों के अधिकारियों की बैठक होने वाली है, उससे पहले ही इजरायल ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं। इजरायल लगातार हिजबुल्लाह को निशाना बनाकर, दक्षिणी लेबनान में हमले कर रहा है, जिनमें सिर्फ शनिवार को ही 10 से ज्यादा मौतें हुईं हैं। मरने वाले लोगों में आम नागरिक भी शामिल हैं। 

इजरायल, लेबनान में लगातार बमबारी कर रहा है। हमलों में नागरिक इलाकों में खूब बम बरसाए जा रहे हैं। इजरायल के अमेरिका में राजदूत येचियल लीटर ने कहा कि इजरायल लेबनान सरकार के साथ औपचारिक शांति वार्ता शुरू करने को तैयार है। इजरायल ने शर्त रखी है कि हिजबुल्लाह आतंकवादी संगठन के साथ सीजफायर पर कोई चर्चा नहीं होगी। उन्होंने कहा कि हिजबुल्लाह लगातार इजरायल पर हमले कर रहा है और दोनों देशों के बीच शांति का सबसे बड़ा रोड़ा यही है।

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हिजबुल्लाह की वजह से क्या गंवा चुका है लेबनान?

दक्षिणी लेबनान में हर तरफ से मौत बरस रही है। इजरायल के ड्रोन उड़ रहे हैं और दोनों तरफ से गोलीबारी हो रही है। पिछले हफ्तों में लेबनान में लड़ाई में करीब 2000 लोगों की मौत हो चुकी है। इजरायल का कहना है कि वह हिजबुल्लाह को कमजोर करने के लिए कार्रवाई कर रहा है। अगले सप्ताह वॉशिंगटन में होने वाली बैठक में लेबनान सरकार से हिजबुल्लाह को नियंत्रित करने की मांग की जाएगी। दोनों देशों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं, इसलिए यह बैठक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


आखिर हिजबुल्लाह, ईरान के लिए इजरायल से भिड़कर तबाह होने के लिए तैयार क्यों है, हिजबुल्लाह को कहां से ताकत मिलती है, जंग में इजरायल को मिटाने पर इजरायल क्यों तुला है-

ईरान देता है हिजबुल्लाह को दाना-पानी 

हिजबुल्लाह, लेबनान में स्थित एक शिया मुस्लिम राजनीतिक दल है। अमेरिका और इजरायल, इसे आतंकी संगठन मानते हैं। लेबनान की सरकार से अलग, इनका स्वततंत्र राज्य चलता है। साल 1980 के दशक में लेबनान के गृहयुद्ध के दौरान ईरान ने ही इस संगठन को खड़ा किया है। यह समूह, इजरायल की दखल के खिलाफ लड़ता है। अमेरिका से भी इजरायल का पंगा है।

ईरान हर साल हिजबुल्लाह को भारी-भरकम आर्थिक मदद देता है। अमेरिका कई बार दावा कर चुका है कि यह रकम 700 मिलियन डॉलर से लेकर 1 बिलियन डॉलर तक हो सकती है। इस पैसे का इस्तेमाल न केवल सेना बनाने में, बल्कि लेबनान में स्कूल, अस्पताल और अपना टीवी चैनल चलाने के लिए भी किया जाता है। हिजबुल्लाह के पास जो हजारों मिसाइलें और ड्रोन हैं, उनमें से ज्यादातर ईरान में बने हैं या ईरानी तकनीक से तैयार किए गए हैं।


विलायत अल-फकीह की वजह से ईरान का रक्षक है हिजबुल्लाह

ईरान, विलायत अल-फकीह के सिद्धांत को मानता है। शिया राजनीति के केंद्र में यह विचारधारा है। यह उस राजनीतिक व्यवस्था का नाम है, जिसमें 'आयतुल्ला' का पद सर्वोच्च होता है। हिजबुल्लाह के लड़ाके भी इसी विचारधारा के अनुरूप काम करते हैं। शियाओं के सर्वोच्च लीडर, अब मोजतबा खामेनेई हैं। आयतुल्ला अली खामेनेई की शहादत के बाद, हिजबुल्लाह ने इजरायल पर हमला बोला था। 

इजरायल के हमलों में अब तक लेबनान में 2000 से ज्यादा मौतें हुईं हैं। Photo Credit: PTI

ईरान का प्रॉक्सी संगठन है हिजबुल्लाह

हिजबुल्लाह और ईरान का रिश्ता धार्मिक है। साल 1982 में हिजबुल्लाह अस्तित्व में आया था। इसकी स्थापना में ईरान का हाथ था। ईरान ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) की एक टुकड़ी लेबनान में भेजी थी। इसी संगठन ने हिजबुल्लाह के लड़ाकों को प्रशिक्षित किया था। उन्हें हथियार दिए गए। हिजबुल्लाह, अब ईरान का सबसे मजबूत प्रॉक्सी संगठन है, जो पश्चिम एशिया में ईरान के हितों की रक्षा करता है। 

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इजरायल पर ईरान-हिजबुल्लाह के इरादे एक

ईरान की तरह, इजरायल के अस्तित्व को हिजबुल्लाह भी नकारता है। हिजबुल्लाह ईरान के सर्वोच्च नेता को अपना आध्यात्मिक गुरु मानता है। उनका मकसद एक है, इजरायल का विरोध और खाड़ी के देशों में अमेरिकी दखल को खत्म करना। हिजबुल्लाह के बड़े नेता तेहरान जाकर ईरानी नेताओं से सलाह-मशविरा करते हैं। कई बार तो इजरायली सेना हिजबुल्लाह को लेबनानी संगठन के बजाय ईरानी सैन्य टुकड़ी बता देती है। ईरान ने अमेरिका के साथ हुई शांति वार्ता में यही शर्त रखी थी कि हिजबुल्लाह पर हमले नहीं किए जाएंगे। 

अमेरिका और इजरायल के लिए काल हैं हिजबुल्लाह के लड़ाके 

जब-जब ईरान ने कहीं हमला किया है, हिजबुल्लाह का नाम सबसे पहले आया है। ईरान, इसे इजरायल के खिलाफ सबसे बड़े हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है। साल 1980 के दशक में विमान अपहरण का मामला हो या अर्जेंटीना में इजरायली दूतावास पर धमाका, हिजबुल्लाह का नाम सबसे पहले आया। ईरान ने समर्थन किया। हिजबुल्लाह ने ही ट्रांस वर्ल्ड एयरलाइंस की फ्लाइट 847 को हाइजैक किया था। ईरान को जब भी दबाव बनाना होता है, हिजबुल्लाह को आगे कर देता है। लेबनान और इजरायल की सीमाएं सटी हुईं हैं, इसलिए हिजबुल्लाह ज्यादा नुकसान पहुंचा देता है। 

ईरान का कहां तक साथ निभाता है हिजबुल्लाह?

लेबनान से लेकर सीरिया तक, हिजबुल्लाह, ईरान की मदद करता है। मध्य पूर्व में ईरान की एक बड़ी ताकत, यह संगठन है।  लेबनान की राजनीति में हिजबुल्लाह की मजबूत पकड़ है। हिजबुल्लाह के लड़ाके संसद और सरकार में भी शामिल हैं। शिया बाहुल इलाकों में हिजबुल्लाह, मानवीय मदद भी पहुंचाता है। अमेरिका, इजरायल और कई देश इसे आतंकवादी संगठन मानते हैं।

आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद लेबनान में लोग सड़कों पर आ गए थे। Photo Credit: PTI

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हिजबुल्लाह में कितना दमखम है जो इजरायल से भिड़ रहा है?

हिजबुल्लाह को सबसे बड़ा झटका, सितंबर 2024 में लगा। इजरायल ने हवाई हमले में हसन नसरल्लाह को ढेर कर दिया था। उनकी मौत के बाद, नईम कासिम महासचिव बने। एक जमाने में हिजबुल्लाह के पास 40 हजार से 50 हजार लड़ाके थे। 1 से 2 लाख रॉकेट और मिसाइलें थीं। यह संगठन, दुनिया का सबसे बड़ा, गैर सरकार समर्थित संगठन था। ईरान ही इन लड़ाकों को ट्रेनिंग, हथियार और करोड़ों-डॉलर की मदद देता है। हिजबुल्लाह, आयतुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने के बाद और ज्यादा आक्रामक हो गया है। 

अब आगे क्या?

लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने अपनी अमेरिका यात्रा स्थगित कर दी है। उन्होंने कहा कि लेबनान के लोगों की सुरक्षा और एकता बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया गया है। हिजबुल्लाह से जुड़े लेबनानी सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि लेबनान सरकार और इजरायल के बीच सीधी बातचीत राष्ट्रीय समझौते, संविधान और कानूनों का उल्लंघन है। इससे देश में विभाजन बढ़ेगा।

अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए सीजफायर में लेबनान को शामिल करने की मांग ईरान ने की थी। इजरायल और अमेरिका ने इसे अलग मुद्दा बताया। पाकिस्तान में चल रही अमेरिका-ईरान बातचीत में भी लेबनान का मुद्दा उठा है। ईरान ने कहा है कि लेबनान में सीजफायर के बिना कोई बातचीत नहीं होगी। बैठक बेनतीजा रही है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, वापस अमेरिका लौट गए हैं। पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ सकता है।