चीन से सटे नेपाल के रसुवागढ़ी इलाके में बाढ़ के बाद ऐसी तबाही मची है कि लोग उससे उबर ही नहीं पा रहे हैं। बाढ़ के बाद हजारों लोग लापता हैं, जिन्हें तलाशा जा रहा है। नेपाल में 673 लाशें अब तक बरामद हो चुकी हैं, वहीं 3 हजार से ज्यादा लोग पाता हैं। नेपाल के ऊर्जा मंत्रालय ने भी माना है कि 400 से ज्यादा लोग अलग-अलग टनल परियोजनाओं के तबाह होने की वजह से फंसे हैं।
दुनिया अब सैन्य मदद की पेशकश कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की अगुवाई वाली सरकारी को सैन्य मदद नहीं चाहिए। उन्होंने वित्तीय मदद को खुले दिल से स्वीकारा है लेकिन सैन्य मदद के लिए सीधे इनकार किया है। नेपाल में तबाही के बाद कई देशों ने खोज और बचाव टीमें भेजने की पेशकश की थी लेकिन प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने यह मदद ठुकरा दी है।
सरकार का कहना है कि नेपाली सेना, पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां खुद राहत और बचाव का काम संभाल सकती हैं। रेस्क्यू टीमें कीचड़ और मलबे में फंसे लोगों को निकालने की कोशिश कर रही हैं। कई जगहों से राहतभरी तस्वीरें सामने आ रहीं हैं। कई जगह मलबों की वजह से झील बन गई है, जिनके टूटने का भी खतरा मंडरा रहा है।
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लोक बहादुर छेत्री, प्रवक्ता, विदेश मंत्रालय:-
मदद का प्रस्ताव स्वाभाविक है, लेकिन फिलहाल विदेशी टीमों की जरूरत नहीं है। भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश ने अपनी टीमें भेजने की बात कही थी। सरकार ने फैसला किया कि काम घरेलू एजेंसियों के भरोसे ही चलेगा।
भारत ने क्या मदद दी है?
भारत लगातार राहत सामग्री भेज रहा है। भारत ने नेपाल के लिए 37 टन से ज्यादा मानवीय सहायता और आपदा राहत सामग्री, दवाइयां और खाद्य पैकेट की दूसरी खेप भेजी है। इसमें टेंट, कंबल, दवाएं, खाना और जनरेटर शामिल हैं। भारत बेली ब्रिज भी भेज रहा है, जिससे कटे हुए रास्ते फिर से जुड़ सकें।
2015 का सबक, जिसे नहीं भूल पा रहा नेपाल
आपदा प्रबंधन में नेपाल के साथ एक कड़वा अनुभव जुड़ा है। 25 अप्रैल 2015 को नेपाल की राजधानी काठमांडू से लगभग 80 किलोमीटर दूर गोरखा जिले के बारपाक में एक विनाशकारी भूकंप आया था। भूकंप में करीब 9 हजार लोग मारे गए थे, 22,000 लोग घायल हुए थे, लाखों घर तबाह हुए थे। नेपाल ने ऐसा संकट कभी नहीं देखा था। 30 से ज्यादा देशों से 70 से ज्यादा टीमें नेपाल मदद देने के लिए पहुंची थीं। नेपाली एयरपोर्ट भीड़ से खचाखच भर गई थी। कई टीमें उतर तक नहीं पाईं। नेपाल यह दोहराव नहीं चाहता है।
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विदेशी हस्तक्षेप से डर रहा है नेपाल?
नेपाल आर्थिक मदद मांग रहा है। सरकार ने विदेश में अपने दूतावासों को कहा है कि मदद सिर्फ प्रधानमंत्री राहत कोष के जरिए ली जाए। कुछ देशों ने आर्थिक सहायता का ऐलान भी कर दिया है। अमेरिका, ब्रिटेन और विश्व बैंक ने भी सहयोग का भरोसा दिया है।विदेशी नागरिकों की मदद के लिए नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक इमरजेंसी रिस्पांस टीम बनाई है। कई देशों के नागरिक लापता बताए जा रहे हैं। इनमें भारतीय, अमेरिकी, मलेशियाई, यूक्रेनी, ब्रिटिश, ऑस्ट्रेलियाई, कनाडाई और चीनी नागरिक शामिल हैं।
लहेंदे नदी पर चट्टानों और बर्फ के जमाव से एक नई झील बन गई है। इसमें पहले से करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका है और और पानी बढ़ने की आशंका है। अधिकारी इस खतरे पर लगातार नजर रखे हुए हैं। नेपाल चौतरफा चुनौतियों से घिरा है फिर भी विदेशी मदद की तरफ रुझान नहीं दिखा रहा है। नेपाल की एक नीति है, विदेशी मदद लेंगे लेकिन मदद का नियंत्रण पूरी तरह से अपने अधिकार क्षेत्र में रखेंगे। नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस और पुलिस इससे उबरने में पर्याप्त हैं।
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ऐसा क्यों है, वजह क्या है, आइए समझते हैं-
पहली वजह: विदेशी हस्तक्षेप से बचता है नेपाल
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के विधि विभाग में रिसर्च स्कॉलर निखिल गुप्ता ने कहा, 'सितंबर 2015 में नेपाल ने नया संविधान लागू किया। तराई के मधेसी समुदाय ने इसे अपने अधिकारों के खिलाफ बताया था। उनका कहना था कि पहाड़ियों को नेपाल में ज्यादा अधिकार मिले, तराई को नहीं। भारत-नेपाल सीमा पर प्रदर्शन तेज हो गए। नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भारत पर अघोषित आर्थिक नाकाबंदी लगाने का आरोप लगाया।'
निखिल गुप्ता ने यह बताया कि नेपाल में पेट्रोल, गैस, दवाइयां और अन्य सामान की सप्लाई ठप हो गई। नेपाल में भारी आक्रोश फैला और भारत-विरोधी भावना बढ़ती चली गई। आरोप लगे कि यह दबाव भारत की ओर से बनाया जा रहा है। भारत का कहना था कि नाकाबंदी नेपाल की तरफ से मधेसी प्रदर्शनकारियों ने की है और भारतीय ट्रक ड्राइवर सुरक्षा के कारण नहीं जा रहे। नेपाल की ज्यादातर जनता और सरकार ने इसे भारत का दबाव माना। अब नेपाल हिचक रहा है कि सीमा पार से भारत अगर इतनी दखल दे सकता है तो सीमा के भीतर कितनी दखल देगा।'
दूसरी वजह: गुटनिरपेक्षता, नेपाल की मजबूरी भी है
निखिल गुप्ता, रिसर्च स्कॉलर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय:-
सैन्य मदद अक्सर रणनीतिक शर्तों और राजनीतिक दबाव के साथ आती है, जिससे उसकी निर्णय लेने की संप्रभुता सीमित हो जाती है। नेपाल के आंतरिक राजनीतिक विमर्श में भी वामपंथी, राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक दोनों दल विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को लेकर बेहद संवेदनशील रहते हैं। नेपाल, राजाशाही खत्म होने के बाद से ही अपनी विदेश नीति को संतुलित, शांतिपूर्ण और केवल विकासोन्मुख आर्थिक सहयोग तक ही सीमित रखना चाहता है। इसका मकसद यह है कि न भारत यह माने कि नेपाल खतरा बन सकता है, न ही चीन।
रिसर्च स्कॉलर निखिल गुप्ता ने कहा, 'नेपाल की विदेश नीति का मूल आधार अभी तक गुटनिरपेक्षता ही है। भारत के पंचशील के सिद्धांतों की तरह कि किसी भी ताकवतर देश या गुट से दूर रहना है। नेपाल, ऐतिहासिक रूप से खुद को भारत और चीन जैसे दो परमाणु-संपन्न महाशक्तियों के बीच एक 'बफर स्टेट' की तरह देख रहा है।'
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निखिल गुप्ता ने कहा, 'अगर नेपाल, भारत को छोड़कर, श्रीलंका, चीन या अमेरिकी सेना की मदद भी लेता है तो भारत का नाराज होना तय है। भारत के साथ लिपुलेख से लेकर काला पानी तक नेपाल के विवाद हैं। भारत की सेना को आने का न्योता भी नेपाल देने से हिचकता है। अलग बात है कि भारत ने हमेशा नेपाल को मित्र राष्ट्र ही माना है और पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही भारत की भी नीति, पड़ोसी प्रथम की रही है। चीन, पाकिस्तान और अब बांग्लादेश अपवाद हैं। मदद के बहाने ही सही, न तो नेपाल भारत को नाराज करना चाहता है, न ही भारत की दखल भी चाहता है।'
तीसरी वजह: टकराव का अखाड़ा नहीं बनना चाहता है नेपाल
रिसर्च स्कॉलर निखिल गुप्ता ने कहा, 'नेपाल का मानना है कि चीन या भारत की बढ़ती दखल, राष्ट्र के हित में नहीं है। बफर स्टेट को दोनों देशों से बेहतर रिश्ते तो चाहिए लेकिन हस्तक्षेप, संप्रभुता के सतर पर नहीं। अगर दोनों में किसी देश को नेपाल ने ज्यादा मौका दिया, अमेरिका को न्योता दिया तो क्षेत्रीय अखंडता और कूटनीतिक स्वायत्तता खतरे में पड़ सकती है। इतिहास गवाह है कि जहां अमेरिका या चीन एक बार दाखिल हुए, वापस नहीं लौटे।'
