हर बच्चा अपनी मां के गर्भनाल से जुड़ा रहता है। इसी गर्भनाल के जरिए गर्भावस्था के दौरान बच्चे को पोषण मिलता है। शिशु के जन्म के अब इसे ब्लड बैंक में डिपोजट करके रखा जाता है क्योंकि गर्भनाल में हेमाटोपोइटिक स्टेम सेल और रक्त पाया जाता है जो भविष्य में गंभीर बीमारियों से बचने में मदद करता है।

 

दुनियाभर में बच्चे के जन्म के बाद गर्भनाल को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का ट्रेंड बढ़ रहा है। अब भारत में भी लोग इसके प्रति जागरूक हो रहे हैं। हमने इसके बारे में गुड़गाव के क्लाउडनाइन अस्पताल की स्त्री विशेषज्ञ डॉक्टर चेतना जैन से बात की।

 

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भारत में कॉर्ड ब्लड बैंकिंग का ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है?

भारत में कॉर्ड ब्लड बैंकिंग के प्रति जागरूकता लगातार बढ़ रही है। इसके मुख्य कारण हैं:

  • स्टेम सेल थेरेपी और पुनर्जनन पर बढ़ता शोध।
  • माता-पिता का भविष्य की स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रति अधिक सजग होना।
  • ल्यूकेमिया, थैलेसीमिया जैसी कुछ गंभीर बीमारियों के उपचार में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की भूमिका।
  • निजी और सार्वजनिक कॉर्ड ब्लड बैंकों की उपलब्धता।
  • प्रसूति विशेषज्ञों द्वारा गर्भावस्था के दौरान इस विषय पर परामर्श।

हालांकि, हर परिवार के लिए कॉर्ड ब्लड बैंकिंग आवश्यक हो, ऐसा नहीं है। इसका निर्णय चिकित्सा इतिहास और व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर लिया जाना चाहिए।

क्या इससे ल्यूकेमिया, थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज हो सकता है? 

कॉर्ड ब्लड में मौजूद हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल्स (Hematopoietic Stem Cells) का उपयोग वर्तमान में 80 से अधिक रक्त एवं प्रतिरक्षा संबंधी बीमारियों के उपचार में किया जाता है।

 

इनमें प्रमुख हैं:

  • ल्यूकेमिया (कुछ प्रकार)
  • थैलेसीमिया मेजर
  • एप्लास्टिक एनीमिया
  • लिम्फोमा
  • कुछ जन्मजात इम्यूनोडेफिशिएंसी विकार

हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि कॉर्ड ब्लड स्वयं हर बीमारी का इलाज नहीं है। उपचार की सफलता रोग, मरीज की स्थिति, स्टेम सेल की गुणवत्ता और उपयुक्त डोनर पर निर्भर करती है। कई जेनेटिक बीमारियों में बच्चे का अपना कॉर्ड ब्लड उपयोगी नहीं होता क्योंकि उसी में वही आनुवंशिक दोष मौजूद हो सकता है।

कॉर्ड ब्लड बैंकिंग कराने में कितना खर्च आता है?

भारत में निजी कॉर्ड ब्लड बैंकिंग की लागत का खर्च:

 

शुरुआत की प्रोसेसिंग फीस: लगभग ₹50,000–₹1,20,000

 

स्टोरेज की फीस: कई संस्थान 18–21 वर्ष तक का पैकेज देते हैं, जबकि कुछ सालाना फीस भी लेते हैं। अलग-अलग बैंक, स्टोरेज अवधि और सेवाओं के अनुसार लागत में अंतर हो सकता है।

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किन बीमारियों से लड़ने में मददगार होते हैं?

स्टेम सेल इन बीमारियों के इलाज के लिए मददागर साबित होता है

  • ब्लड कैंसर 
  • थैलेसीमिया
  • लिम्फोमा
  • बोन मैरो फेल्योर सिंड्रोम
  • कुछ जन्मजात ब्लड डिसॉर्डर
  • कुछ इम्यून सिस्टम संबंधी बीमारियां
  • कुछ मेटाबॉलिक डिसॉर्डर

इसके अलावा सेरेब्रल पाल्सी, ऑटिज्म, टाइप-1 डायबिटीज आदि में स्टेम सेल पर शोध जारी है, लेकिन इन स्थितियों के लिए यह अभी नियमित या स्थापित उपचार नहीं माना जाता।

इसे कितने समय तक स्टोर किया जा सकता है?

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार उचित तापमान (लगभग -196°C, लिक्विड नाइट्रोजन में) पर सुरक्षित रखे गए कॉर्ड ब्लड स्टेम सेल कई दशकों तक जीवित और उपयोग योग्य रह सकते हैं। अब तक 25–30 वर्ष या उससे अधिक समय तक सुरक्षित रखे गए स्टेम सेल के सफल उपयोग की रिपोर्टें उपलब्ध हैं। इसलिए माना जाता है कि सही परिस्थितियों में इन्हें लंबे समय तक संरक्षित रखा जा सकता है।

कॉर्ड ब्लड बैंकिंग की सीमाएं क्या हैं?

कॉर्ड ब्लड बैंकिंग के कुछ महत्वपूर्ण सीमित पहलू हैं:

  • हर बच्चे को भविष्य में इसकी आवश्यकता पड़े, इसकी संभावना बहुत कम होती है।
  • एक यूनिट कॉर्ड ब्लड में स्टेम सेल की मात्रा सीमित होती है, जो बड़े वयस्क मरीजों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
  • कई जेनेटिक बीमारियों में बच्चे का अपना कॉर्ड ब्लड उपयोगी नहीं होता।
  • सभी बीमारियों का इलाज कॉर्ड ब्लड से संभव नहीं है।
  • निजी बैंकिंग महंगी हो सकती है।

वर्तमान में स्टेम सेल थेरेपी के कई संभावित उपयोग अभी भी शोध के चरण में हैं और उन्हें प्रमाणित उपचार नहीं माना जाता। कॉर्ड ब्लड बैंकिंग एक महत्वपूर्ण चिकित्सा विकल्प है, लेकिन इसे भविष्य की गारंटी या हर बीमारी का इलाज समझना सही नहीं होगा। यदि परिवार में थैलेसीमिया, ब्लड कैंसर या अन्य जेनेटिक ब्लड डिसॉर्डर का रिकॉर्ड है, तो गर्भावस्था के दौरान अपने प्रसूति एवं स्टेम सेल विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही निर्णय लेना सबसे उचित रहता है।