कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने रविवार को अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर तंज भरे लहजे में खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताया और बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत पर अपने पद से इस्तीफा देने की बात लिखी। हालांकि दीपके इस तंज भरे इस्तीफे पर विवाद भी हो गया। लोगों ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उनका तर्क है कि अभिजीत दीपके ने लेटरहेड का दुरुपयोग किया है। 

 

उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, 'मैं तत्काल प्रभाव से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देता हूं। मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने मुझे एमपी की जनता की सेवा करने का मौका दिया, एक ऐसा मौका जिसमें मैं साफ तौर पर नाकाम रहा हूं।' 

 

 

अपने पत्र में दीपके ने बालाघाट का मुद्दा उठाया। उन्होंने लिखा, 'बालाघाट में 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की मौत के बाद मेरा जमीर मुझे इस पद पर बने रहने की इजाजत नहीं देता। मुख्यमंत्री के तौर पर मैं उन्हें समय पर जरूरी मेडिकल देखभाल और मदद न पहुंचा पाने की जिम्मेदारी स्वीकार करता हूं। इनमें से कई जानें शायद बचाई जा सकती थीं और मैं उस नाकामी की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। उतना ही शर्मनाक है उनकी मौत के बाद हमारी असंवेदनशीलता।'

 

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क्या चार लाख रुपये का मुआवजा काफी है

दीपके ने 4 लाख रुपये मुआवजे पर भी सवाल उठाया। उन्होंने लिखा, 'हमने शुरू में हर बच्चे के लिए सिर्फ 2 लाख मुआवजे का ऐलान किया था और आदिवासी समुदाय के विरोध के बाद ही इसे बढ़ाकर 4 लाख रुपये किया। यह मुझे एक मुश्किल सवाल पूछने पर मजबूर करता है। क्या हम 4 लाख रुपये को काफी मानते अगर ये मंत्री या विधायक के बच्चे होते? हमारा रवैया दिखाता है कि हमने आदिवासी बच्चों की जिंदगी को कितनी कम अहमियत दी है।'

 

आगे लिखा, 'इस त्रासदी की गंभीरता के बावजूद हम स्वास्थ्य अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने में भी नाकाम रहे हैं। मासूम बच्चों की मौतें सबसे ऊंचे स्तर पर जवाबदेही की मांग करती हैं। हमारी नाकामियां सिर्फ स्वास्थ्य सेवा तक सीमित नहीं हैं। 

पीएम मोदी पर भी कसा तंज

दीपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी तंज कसा और 'हर घर नल योजना' का सवाल उठाया। एक्स पर लिखा, 'जहां हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, जिन्हें 'विश्वगुरु' कहा जाता है, ने 'हर घर नल योजना' के तहत घरों तक नल का पानी पहुंचाने की सफलता का एलान किया है, वहीं बालाघाट के कुछ हिस्सों में आदिवासी परिवार पीने के पानी के लिए अब भी नदी के पानी पर निर्भर हैं, जिससे उनकी सेहत को खतरा है।'

 

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बदहाल स्कूलों का उठाया मुद्दा

सीजेपी संस्थापक ने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाया। आरोप लगाया कि कई स्कूल जानवरों के बाड़ों में संचालित होते हैं। तंज भरे लहजे में लिखा, 'शिक्षा के क्षेत्र में भी हालात उतने ही चिंताजनक हैं। कई गांवों में स्कूल जानवरों के बाड़ों से भी बदतर हालत में हैं। बालाघाट के एक गांव में आंगनबाड़ी से लेकर पांचवीं कक्षा तक के लगभग 75 बच्चे एक ही क्लासरूम में पढ़ते हैं।

 

स्थानीय आदिवासी समुदाय की बार-बार की गुहार के बावजूद हम उन्हें स्कूल की सही इमारत नहीं दे पाए हैं। आज मैं शर्म से सिर झुकाकर कहता हूं कि 2003 से मध्य प्रदेश में बीजेपी सरकार के लगभग 21 साल रहने के बाद भी हम कई आदिवासी परिवारों को सुरक्षित पीने का पानी, सही स्वास्थ्य सेवा और अच्छी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं और सम्मान नहीं दिला पाए हैं।'