केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए एक सख्त कदम उठाया है। सरकार ने इलेक्ट्रीसिटी ऐक्ट के इमरजेंसी प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए 100 से ज्यादा कैप्टिव पावर प्लांट को आदेश दिया है कि वे 1 अक्टूबर से साल के अंत तक अपनी पूरी क्षमता से काम करें। यह आदेश 50 मेगावाट या उससे अधिक क्षमता वाले पावर प्लांट पर लागू होगा। इस आदेश के तहत हमें यह समझना होगा कि कैप्टिव पावर है क्या और इससे आम नागरिकों को क्या नुकसान हो सकता है?

 

दरअसल, अल नीनो प्रभाव के कारण तापमान में असामान्य बढ़ोतरी देखी जा रही है। इससे देश में बिजली की मांग में भारी उछाल आया है। इसके चलते देश के लगभग 40 फीसदी पावर प्लांट में कोयले का स्टॉक बहुत तेजी से कम हो रहा है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार को यह फैसला लेना पड़ा है।  

 

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क्या है कैप्टिव पावर?

कैप्टिव पावर बिजली उत्पादन की वह व्यवस्था है जिसमें कोई फैक्ट्री या वाणिज्यिक इकाई अपनी निजी बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए खुद का कैप्टिव पावर प्लांट स्थापित करती है। यह किसी भी बड़ी फैक्ट्री की आत्मा होते हैं। उदाहरण के लिए, एक टन एल्युमीनियम बनाने में लगभग 14,000 से 15,000 यूनिट बिजली की खपत होती है जबकि सीमेंट और स्टील बनाने में कुल उत्पादन लागत का लगभग 30% से 40% होता है। जब इस तरह के आदेश दिए जाते हैं तो इन कैप्टिव प्लांटों को लगातार अधिकतम क्षमता पर चलना पड़ता है। इसके लिए उन्हें ओपन मार्केट से महंगा कोयला खरीदना पड़ता है। 

 

भारत में उद्योगों (स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम, केमिकल्स आदि) के पास 11,000 मेगावाट से अधिक की रजिस्टर्ड कैप्टिव क्षमता केवल 50 MW से बड़े संयंत्रों की श्रेणी में ही सक्रिय है। कैप्टिव प्लांट अपनी फैक्ट्री की जरूरत पूरी करने के बाद अमूमन 15% से 25% तक बिजली बचा लेते हैं। जब इन्हें पूरी क्षमता पर चलाया जाता है तो ये रोजाना करोड़ों यूनिट अतिरिक्त बिजली ग्रिड को दे सकते हैं। उद्योग डिस्कॉम की महंगी बिजली की तुलना में कैप्टिव पावर से 30% से 40% तक लागत बचाते हैं लेकिन जब बाजार में बिजली की कमी होती है, तो वे अपनी सरप्लस बिजली पावर एक्सचेंज पर बेचकर दोहरा मुनाफा कमाते हैं।

कैसे काम करता है?

हम सबको पता है कि फैक्ट्रियां ग्रिड से बिजली खींचती हैं। लेकिन लेकिन कैप्टिव पावर का गणित इस व्यवस्था को उलट देता है। जब राष्ट्रीय ग्रिड पर दबाव बढ़ता है तो टाटा स्टील, वेदांता, हिंडालको और जेएसडब्ल्यू जैसी दिग्गज कंपनियां उपभोक्ता से सप्लायर में बदल जाती हैं। एक नया 1000 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाने में 4 से 5 साल और हजारों करोड़ रुपये लगते हैं। सरकार ने आपातकालीन धाराओं का उपयोग करके रातों-रात 112 चालू कैप्टिव प्लांटों को ग्रिड से जोड़ दिया। बिना नया पैसा निवेश किए देश को तुरंत एक वर्चुअल पावर प्लांट मिल गया। केवल इस तरह के आदेश से इस समस्या से निजात नहीं पाया जा सकता है। सरकार को इसके लिए बेहतर तरीके से काम करना चाहिए। 

 

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समस्या क्या है?

इन सबके बीच लॉजिस्टिक का सवाल बढ़ता जा रहा है। समस्या कोयले की उपलब्धता की नहीं है। खदानों के पास लाखों टन का स्टॉक है। असली पेच ट्रांसपोर्टेशन का है। एक 500 MW का कैप्टिव पावर प्लांट चलाने के लिए रोजाना कम से कम 6,000 से 8,000 टन कोयले की जरूरत होती है।  जब राष्ट्रीय स्तर पर बिजली की मांग बढ़ती है, तो रेलवे का लॉजिस्टिक्स नेटवर्क 'पावर सेक्टर पैनिक' में चला जाता है। इसमें तरजीह उन राज्यों और केंद्र के सरकारी पाव प्लांट को दी जाती है जहां ब्लैकआउट का डर होता है।  नतीजतन, उद्योगों के निजी कैप्टिव प्लांट्स की रेलवे रैक फाइलें ऑफिसों के चक्कर काटती रह जाती हैं। जब रेलवे से व्यवस्था नहीं बन पाती है तो सड़क का सहारा लिया जाता है। लेकिन लाखों टन कोयले को ट्रकों से ढोना बहुत मुश्किल है।

 

भारी उद्योगों के कुल उत्पादन लागत का 20% से 40% हिस्सा केवल ऊर्जा का होता है। अगर ऊर्जा महंगी होगी तो अंतिम उत्पाद जैसे स्टील और सीमेंट की लागत बढ़ेगी। सीमेंट और स्टील की लागत बढ़ने से हाउसिंग डेवलपमेंट, हाईवे प्रोजेक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कुल लागत खुद बढ़ जाती है। इसका बोझ आम आदमी पर सीधा पड़ेगा।  अगर आसानी से समझे तो कैप्टिव पावर केवल किसी फैक्ट्री का अपना जनरेटर नहीं है बल्कि यह भारत के पूरे ऊर्जा बाजार का वह शॉक एब्जॉर्बर बन चुका है जो अचानक आई मांग की लहर में ग्रिड को बर्बाद होने से बचाता है।