सरकार हर साल करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त राशन देती है। आंकड़ों के मुताबिक, 2026-27 के बजट में खाद्य विभाग को कुल 2,35,047 करोड़ रुपये मिले हैं, जिसमें से 97 फीसदी पैसा सिर्फ एक स्कीम पर खर्च होगा। यह स्कीम है प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY)। 2026-27 में इस स्कीम के लिए तय किया गया बजट 2025-26 के संशोधित अनुमान के मुकाबले 0.1 फीसदी कम है। पिछले साल सरकार ने इस स्कीम के लिए शुरुआत में सिर्फ 2,03,000 करोड़ रुपये का बजट रखा था, लेकिन साल खत्म होते-होते असली खर्च बढ़कर 2,27,754 करोड़ रुपये पहुंच गया। यानी तय बजट से सरकार को करीब 12 फीसदी ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ा।
बता दें कि इस योजना के तहत 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त अनाज मिलता है। इस योजना को 2029 तक जारी रखने की मंजूरी मिल चुकी है। इस योजना के तहत 2.3 करोड़ सबसे गरीब (AAY) परिवारों को 35 किलो प्रति परिवार और 18.3 करोड़ प्राथमिकता वाले (PHH) परिवारों को 5 किलो प्रति व्यक्ति हर महीने मिलता है।
फूड सब्सिडी का बिल सामान्य से ज्यादा
बता दें कि सरकार का राशन बिल अनुमान से बाहर निकलना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले साल 2020-21 से 2022-23 के बीच भी फूड सब्सिडी का बिल सामान्य से काफी ज्यादा पहुंच गया था। इसके पीछे 2 बड़ी वजहें थी, पहला सरकार ने FCI (फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) के पुराने बकाया पैसे चुकाए और दूसरा, कोविड-19 महामारी के दौरान जनता को नियमित राशन के अलावा अतिरिक्त अनाज भी मुफ्त बांटा गया।
हालांकि, इस बार शायद सरकार ने पिछले अनुभव से सबक लिया है। 2026-27 के लिए बजट बनाते वक्त सरकार ने कम अनुमान लगाने के बजाए, शुरुआत से ही 2,27,429 करोड़ खर्च तय कर दी है। यानी जितना पिछले साल असल में खर्च होने का अनुमान था, उतना नए बजट में डाल दिया गया। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मुफ्त राशन पर भारी खर्च का दबाव सरकार पर बढ़ रहा है।
जिन्हें नहीं मिलना चाहिए, उन्हें भी मिल रहा फ्री राशन
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, गरीबी घटने के बावजूद राशन योजना के लाभार्थियों की सूची अपडेट नहीं हो पाई। 2004-05 से 2011-12 के बीच ऐसे लोगों का आंकड़ा 29 फीसदी से बढ़कर 37 फीसदी हो गया था, जो पात्र नहीं थे फिर भी राशन कार्ड का फायदा उठा रहे थे। बिहार के छह जिलों में हुए एक अध्ययन (2023) में पाया गया कि जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधर चुकी है, उन्हें अब भी लाभार्थी सूची से हटाया नहीं गया है। क्योंकि इसपर नियमित सर्वे नहीं हो रहे।
इसके लिए राज्य सरकारें खुद तय करती हैं कि कौन पात्र है, जो आय, नौकरी का प्रकार, टैक्स भरना, जमीन, मकान, गाड़ी, AC जैसी संपत्ति के आधार पर तय होता है। जबकि सबसे गरीब वर्ग (AAY यानी भूमिहीन मजदूर, सीमांत किसान, झुग्गी में रहने वाले आदि) की पात्रता केंद्र सरकार तय करती है।
सरकार पर बोझ, क्या बढ़ रही है लागत?
पहले चावल 3 प्रति किलो और गेहूं 2 प्रति किलो की दर से मिलना था, यह दर लंबे समय से चला आ रहा था। जनवरी 2023 से यह कीमत शून्य कर दी गई, यानी पूरा अनाज मुफ्त में दिया जाने लगा। दूसरी तरफ सरकार को जो इकोनॉमिक कॉस्ट यानी अनाज खरीदने, रखने और पहुंचाने में असली खर्च आता है वह लगातार बढ़ रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में चावल की असली लागत 40.4 रुपये प्रति किलो और गेहूं की 28.5 रुपये प्रति किलो थी। इससे यह तो साफ कि सरकार जो मुफ्त अनाज बांट रही है और इसमें जो लागत आ रही है उसके बीच का पूरा गैप सब्सिडी के तौर पर सरकार के खजाने से भरा जा रहा है। यह लागत पिछले 10 साल में हर साल औसतन 3 फीसदी की दर से बढ़ती रही है, अनाज मुफ्त बांटने का बोझ हर साल थोड़ा-थोड़ा भारी होता जा रहा है।
