NEET पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया कि ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाई जाएंगी। नाम से ही स्पष्ट है कि ये ऐसी अदालतें होती हैं जो किसी भी केस को जल्द से जल्द निपटाने के लिए बनाई जाती हैं। इसमें 'तारीख पर तारीख' होती तो है लेकिन दो तारीखों के बीच अंतर बहुत कम होता है। इसके बावजूद ये फास्ट ट्रैक कोर्ट तेज न्याय की गारंटी नहीं हैं। केंद्र सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि साल भर में जितने केस फास्ट ट्रैक अदालतों के पास आते हैं उनमें से एक तिहाई में ही फैसला आ पाता है। नतीजा होता है कि त्वरित न्याय की उम्मीद में फास्ट ट्रैक कोर्ट के पास भेजे गए हजारों मुकदमे पेंडिंग में रह जाते हैं और उनमें भी एक साल से ज्यादा का समय लग जाता है।
अगर कुछ चर्चित मामलों को देखें तो पता चलता है कि जिन मुकदमों को लेकर जमकर हंगामा हुआ उन पर भी कई महीने या साल लग गए। उदाहरण के लिए बहुचर्चित निर्भया केस में ट्रायल कोर्ट ने कम समय लेकर सजा सुनाई लेकिन यह कम समय भी 9 महीने था। रोचक बात है कि ऐसे मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले के बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मामला कई साल खिंचता है। निर्भया के केस में ही आखिरी फैसला आने में 7 साल का समय लग गया।
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साल 2016 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हाइवे पर हुए गैंगरेप का केस पॉक्सो फास्ट ट्रैक कोर्ट को सौंपा दया। इस घटना के 9 साल बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सजा सुनाई और पांच लोगों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। यानी न्याय तो मिला लेकिन फास्ट ट्रैक कोर्ट में भी 9 साल लग गए। इसी तरह पश्चिम के कोलकाता में जून 2013 में हुए कामदुनी गैंगरेप और मर्डर केस में 2 साल 7 महीने के बाद सजा सुनाई। रोचक बात है कि इस केस में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 8 में 6 आरोपियों को दोषी पाया था। इनमें से 3 को फांसी और 3 को उम्रकैद की सजा हुई। बाद में हाई कोर्ट ने फांसी की सजा निलंबित करके उसे उम्रकैद में बदल दिया था। साथ ही, इस 6 में से एक दोषी को बरी भी कर दिया गया। अभी भी यह केस सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।
क्या है फास्ट ट्रैक अदालतों की हकीकत?
संसद के मौजूदा सत्र में ही लोकसभा सांसद राजकुमार चाहर और जनार्दन मिश्र ने पॉक्सो कोर्ट और फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या, उनमें चल रहे मुकदमों, खत्म हो चुके मुकदमों और अंजाम तक पहुंचे मुकदमों की जानकारी मांगी। साथ ही, यह भी पूछा कि इसके लिए सरकार ने कितने पैसे खर्च किए और इनमें कितने पद खाली पड़े हैं। इसका जवाब देश के कानून मंत्रालय की ओर से दिया गया। कानून राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने 24 जुलाई को संसद में इसका लिखित जवाब दिया है।
इस जवाब में बताया गया है कि अक्तूबर 2019 में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) बनाने की शुरुआत की गई। इसमें एक्सक्लूसिव पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं। कोशिश यह थी कि नाबालिग बच्चों से यौन उत्पीड़न के जो मामले पॉक्सो ऐक्ट के तहत दर्ज हैं उनका जल्द से जल्द निपटारा किया जा सके।
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कितने मामले पेंडिंग हैं?
30 अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, देश में कुल 775 फास्ट ट्रैक कोर्ट हैं जिसमें से 398 अदालतें सिर्फ पॉक्सो केस के निपटारे के लिए हैं। झारखंड इकलौता ऐसा राज्य है जहां एक भी फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं है क्योंकि राज्य सरकार ने 7 जुलाई 2025 को एक योजना से हटने का फैसला किया था।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि साल 2023 में 81,471 केस, 2024 में 88,902 और 2025 में 1,43,936 केस दर्ज किए गए। इसमें से 2023 में 76,319 केस खत्म हो गए और 5152 केस पेंडिंग मुकदमो की लिस्ट में शामिल हो गए। इसी तरह, 2024 में 85,595 केस खत्म हुए और 3307 केस पेंडिंग रह गए। 2024 में दर्ज हुए कुल 1,43,936 केस में से सिर्फ 66,500 केस का ही निपटारा हुआ और 77,436 केस पेंडिंग केस ही लिस्ट में शामिल हो गए।
इस तरह हर साल हजारों केस पेंडिंग रह जाने का असर है कि साल 2023 में ही पेंडिंग केस की संख्या 2,02,175 तक पहुंच गई थी। 2024 में यह संख्या 2,04,122 हुई और 2025 में यह संख्या 2,45,579 हो गई।
फास्ट ट्रैक कोर्ट पर कितना खर्च?
FTSC योजना के तहत राज्य और केंद्र दोनों सरकारें खर्च करती हैं। एक कोर्ट में आमतौर पर एक न्यायिक अधिकारी और 7 सपोर्ट स्टाफ तैनात होते हैं। राज्य या केंद्र सरकारें खर्च का जो ब्योरा देती हैं, उसी के आधार पर केंद्र सरकार उन्हें पैसे दे देती गहै। कानून मंत्रालय के मुताबिक, अभी तक कुल 1259.51 करोड़ रुपये राज्यों को दिए जा चुके हैं।
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आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन साल से हर साल 200 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की ओर से जारी किए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा पैसे उत्तर प्रदेश को मिले हैं। यूपी सरकार को 2023-24 में 47.26 करोड़, 2024-25 में 53.83 करोड़ और 2025-26 में कुल 13.29 करोड़ रुपये मिले हैं। वहीं, 16 फास्ट ट्रैक कोर्ट के बावजूद आंध्र प्रदेश को पिछले तीन साल में एक भी पैसा नहीं मिला है।
