सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने पर्यावरण से जुड़े आंकड़े जुटाने के लिए 2026 से 2030 तक की नई रणनीति जारी की है। इसके तहत सरकार जंगल, पानी, जमीन, मिट्टी और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बारे में जानकारी जुटाने और उनका हिसाब रखने पर काम करेगी। आसान भाषा में कहें तो सरकार यह जानकारी जुटाएगी कि देश में प्राकृतिक संसाधन कितने हैं, उनका इस्तेमाल कैसे हो रहा है और देश की अर्थव्यवस्था में उनकी क्या भूमिका है। यह पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए अहम कदम माना जा रहा है।

 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंत्रालय ने यह काम 2018 में शुरू किया था। इसके बाद 2022 से 2026 तक के लिए एक योजना बनाई गई। अब सरकार इसी काम को आगे बढ़ाने के लिए नई योजना लेकर आई है। यह दिसंबर 2021 में जारी की गई 2022–2026 की रणनीति की जगह लेगा। नई रणनीति में अगले 5 साल के लिए करीब 10 क्षेत्र तय किए गए हैं। 

 

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आर्थिक विकास में पर्यावरण का ध्यान रखना जरूरी

मंत्रालय का कहना है कि आर्थिक विकास की योजना बनाते समय पर्यावरण का ध्यान रखना भी जरूरी है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्राकृतिक संसाधन देश की अर्थव्यवस्था का अहम आधार हैं। अगर पर्यावरण की परवाह किए बिना विकास किया गया, तो प्रकृति को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। इसका असर आज के लोगों के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के जीवन पर भी पड़ सकता है।

 

इस रणनीति की एक प्रमुख वजह संयुक्त राष्ट्र की राष्ट्रीय लेखा प्रणाली (SNA) 2025 है। यह देशों की अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़े तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाला नया अंतरराष्ट्रीय मानक है। भारत पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध से जुड़े आंकड़े तैयार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन प्रणाली (SEEA) का इस्तेमाल करता है। 

परागण का भी होगा हिसाब

नई रणनीति में परागण का हिसाब रखना भी शामिल है। परागण वह प्रक्रिया है, जिसमें मधुमक्खी जैसे कीड़े फूलों के परागकण दूसरे फूलों तक पहुंचाते हैं, जिससे फल और बीज बनने में मदद मिलती है। इस साल की शुरुआत में MoSPI ने पहली बार परागण से मिलने वाली सेवाओं का रुपये में हिसाब जारी किया था। परागण की प्रक्रिया में फूलों के परागकण एक फूल से दूसरे फूल तक पहुंचते हैं। इससे पौधों में फल और बीज बनने में मदद मिलती है।

 

रिपोर्ट के मुताबिक, खेती से जुड़े सामान्य आंकड़ों में फसलों के उत्पादन और उनकी कीमत का हिसाब तो रखा जाता है लेकिन परागण करने वाले जीवों से खेती को मिलने वाले फायदे का अलग से हिसाब नहीं रखा जाता। जबकि फसल उत्पादन में इनकी अहम भूमिका होती है। मंत्रालय का कहना है कि परागण से जुड़े आंकड़ों से मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने और परागण में मदद करने वाले जीवों की रक्षा के लिए योजनाएं बनाने में मदद मिल सकती है।

 

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कहां कैसे होगा हिसाब?

रिपोर्ट के मुताबिक, खनिजों के खनन, भंडार में कमी और नए भंडार मिलने का हिसाब रखने से भविष्य में उनकी उपलब्धता का आकलन किया जा सकेगा। पानी से जुड़े आंकड़े पानी की कमी वाले क्षेत्रों में उपयोगी होंगे और भूजल के घटते स्तर पर नजर रखने में मदद करेंगे। वहीं जंगलों से मिलने वाले उन फायदों का भी हिसाब रखा जाएगा, जो अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में योगदान देते हैं लेकिन आमतौर पर GDP की गणना में शामिल नहीं होते।

 

नई रणनीति के दो मुख्य लक्ष्य हैं। पहला, पर्यावरण से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता, उपलब्धता और दायरा बढ़ाना और आंकड़ों की कमी दूर करना। दूसरा, नीति बनाने वालों, मीडिया और अन्य लोगों को इन आंकड़ों का महत्व समझाना। रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों में पहले भी पर्यावरण से जुड़े अध्ययन हुए हैं लेकिन अलग-अलग तरीकों और परिभाषाओं के कारण उनके आंकड़ों को जोड़कर देश का एक समान हिसाब तैयार नहीं किया जा सका।

 

इस समस्या को दूर करने के लिए सभी राज्यों से पर्यावरण लेखांकन पर अंतर-विभागीय समूह (IDG) बनाने को कहा गया है। अब तक 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ये समूह बना लिए हैं। मंत्रालय ने यह भी कहा कि पर्यावरण-आर्थिक लेखा प्रणाली (SEEA) के जानकारों की कमी दूर करनी होगी। इसके लिए केंद्र और राज्यों के सरकारी विभागों में प्रशिक्षण और विशेषज्ञता बढ़ाने की जरूरत है, ताकि स्थानीय जरूरतों से जुड़े सवालों पर भी बेहतर नीतियां बनाई जा सकें।