ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे आसिम वकार ने असदुद्दीन ओवैसी को बड़ा झटका दिया है। उन्होंने अपने पद और पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दिया और अब इमरान प्रतापगढ़ी के कहने पर कांग्रेस में शामिल हो गए। आसिम वकार, AIMIM के धाकड़ प्रवक्ताओं में गिने जाते थे, लेकिन अब उन्होंने इशारे ही इशारे में यह बता दिया है कि असदुद्दीन ओवैसी, भारतीय जनता पार्टी की 'टीम B' हैं। आसिम वकार का कांग्रेस में आना, समाजवादी पार्टी के लिए नुकसान का सौदा हो सकता है। 

आसिम वकार, चर्चित नेता हैं। मुस्लिम बहुल जिले बहराइच में उनकी गहरी पैठ भी है। सिर्फ बहराइच ही नहीं, अवध के मुस्लिम बहुल जिलों में लोग उन्हें जानते हैं। AIMIM जैसी पार्टी वोट प्रतिशत और लोकप्रियता में भले ही सीमित हो लेकिन मुस्लिम बहुल इलाको में इस दल की चर्चा खूब है। आसिम वकार बड़े नेता तो है तो दावेदारी भी बड़ी है। वह मटेरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं।

 

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बहराइच जिले की विधानसभा सीटों का गणित क्या है?

बहराइच जिले में 7 विधानसभा सीटें है। बलहा, नानपारा, मटेरा, महसी, बहराच, पागपुर और कैसरगंज। बलहा से सरोज सोनकर विधायक हैं। नानपारा से राम निवास वर्मा, मटेरा से मारया शाह, महसी से सुरेश्वर सिंह, बहराच सदर से अनुपमा जायसवाल, पयागपुर से सुभाष त्रिपाठी और कैसरगंज से आनंद कुमार यादव विधायक हैं। 4 सीटों पर बीजेपी, 1 पर अपना दल (एस) और 2 पर समाजवादी पार्टी है। 

बहराइच में कितना दमदार है 'शाह' परिवार?

बहराइच सदर और मटेरा विधानसभा, समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता वकार अहमद शाह का गढ़ है। यहां के सबसे रसूखदार परिवारों में से एक 'शाह' परिवार है। एक-दो नहीं, वकार अहमद शाह बहराइच सदर सीट से लगातार 5 बार विधायक रहे हैं। वह अखिलेश यादव सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुक थे। साल 2018 में उनकी मौत ब्लड कैंसर की वजह से हो गई थी। यासर शाह की मां रुबाबा, बहराइच की सांसद भी रही हैं। फरवरी 2024 में उनकी मौत हो गई थी।  

साल 2022 के चुनाव में उनके बेटे यासर शाह चुनावी मैदान में उतरे। वह अपनी सीट, अनुपमा जायसवाल के सामने हार बैठे। अनुपमा जायसवाल, योगी सरकार में मंत्री भी रहीं हैं। यासर शाह खुद मटेरा विधानसभा से दो बार विधायक चुने जा चुके हैं। 2022 में वकार अहमद तो अनुपमा जायसवाल के सामने हार गए लेकिन मटेरा सीट से उनकी पत्नी मारिया शाह चुनाव जीत गईं।

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आसिम वकार कैसे बिगाड़ सकते हैं समीकरण?

अब आसिम वकार भी बहराइच के रण में उतरना चाह रहे हैं। वह मटेरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। अगर मटेरा नहीं तो बहराइच सदर। दोनों सीटें, अहमद शाह परिवार की है। दोनों सीटों पर दावेदारी तो समाजवादी पार्टी की ही मजबूत है लेकिन इस बार भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ना चाहती हैं। कांग्रेस भी उन सीटों पर जोर दे रहा है, जहां अल्पसंख्यक वोटर मजबूत स्थिति हैं। कांग्रेस को यूपी में जिस धाकड़ अल्पसंख्यक नेता की जरूरत थी, आसिम वकार उसी मिजाज के हैं।

बहराइच में कितना दमदार है शाह परिवार?

सोचिए एक परिवार में अगर पहली और दूसरी पीढ़ी लगातार सांसद-विधायक होती रहे तो वह परिवार कितना मजबूत होगा। शाह परिवार का भी हाल ऐसा ही है। राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति, दोनों में यह परिवार शामिल रहा है। साल 1993 से 2017 तक, वकार अहमद शाह, राजनीति में सक्रिय रहे। वह जिला अध्यक्ष से लेकर विधानसभा के सदस्य तक रहे हैं। वह राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल के दौरान राज्य में कैबिनेट मंत्री भी रहे थे।

 

वाकार अहमद शाह की पत्नी रुबाब सैयदा भी बहराइच से सांसद रह चुकी हैं। उनके निधन के बाद अब उनके बेटे यासर शाह और बहू मरियम शाह भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। मरियम शाह वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्य हैं।

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  • वकार अहमद शाह: वाकार अहमद शाह का जन्म 6 जुलाई 1943 को उत्तर बहराइच के कज़ीपुरा में हुआ था। वे 1993 से 2017 तक उत्तर प्रदेश विधान सभा में अलग-अलग सीटों तक पहुंचते रहे। वह राज्य सरकार में मंत्री भी रहे, कैबिनेट मंत्री भी रहे। यूपी विधानसभा के डिप्टी स्पीकर भी रहे। आजम खान के बाद पार्टी में दूसरे नंबर के अल्पसंख्यक नेताओं में गिने जाते रहे। वाकार अहमद शाह का निधन 15 अप्रैल 2018 को लखनऊ के एक अस्पताल में ब्लैडर कैंसर की वजह से हुआ था। उनकी पत्नी ने बाद में उनकी सियासी विरासत संभाली। 

  • रुबाब सैयदा: वाकार अहमद शाह की पत्नी रुबाब सैयदा का जन्म 15 जून 1950 को मेरठ में हुआ था। वह पहले शिक्षक रहीं, फिर राजनीति में आईं। 1995 में वह बहराइच जिला पंचायत की अध्यक्ष चुनी गईं। इसके बाद 2004 में वह समाजवादी पार्टी की टिकट पर 14वीं लोकसभा के लिए बहराइच सीट से चुनी गईं। 2004 से 2009 तक सांसद रहीं। वह लोकसभा की उद्योग समिति की सदस्य रहीं और 5 अगस्त 2007 को सूचना प्रौद्योगिकी समिति की सदस्य बनाई गईं। रुबाब सैयदा का निधन 6 फरवरी 2024 को अलीगढ़ में हुआ था। उनके निधन से पहले ही उनके बेटे राजनीति में सक्रिय हो चुके थे। 

  • यासर शाह: वाकार अहमद शाह और रुबाब सैयदा के बेटे यासर शाह उत्तर प्रदेश में परिवहन मंत्री स्वतंत्र प्रभार रह चुके हैं। वह साल 2022 में बहराइच सदर से चुनावी मैदान में उतरे थे लेकिन जीत नहीं सके। अनुपमा जायसवाल सिर्फ 4,078 वोटों से जीत पाईं थीं। एक बार फिर उनकी दावेदारी मजबूत समझी जा रही है। 

  • मरियम शाह: यासर शाह की पत्नी है और बहराइच की मटेरा सीट से विधायक हैं। आसिम वकार की दावेदारी भी इसी सीट की है। इस सीट से पहले यासर शाह विधायक थे। मरियम शाह मार्च 2022 में इस सीट से चुनावी मैदान में उतरीं। उनके खिलाफ बीजेपी के अरुण वीर सिंह उतरे थे। चुनावमें मारिया शाह का प्रदर्शन इतना तगड़ा था कि 10,428 वोटों से उन्होंने प्रचंड योगी-मोदी लहर में भी हरा दिया। अब डर है कि शाह परिवार को इस सीट से समझौता न करना पड़े। 

आसिम वकार को उम्मीद से क्यों देख रही है कांग्रेस?

आसिम वकार अल्पसंख्यकों की मजबूत आवाज हैं। वह AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे और 2017 से पार्टी से जुड़े थे। बुधवार को उन्होंने AIMIM छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ली। असदुद्दीन ओवैसी एक तरफ 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटे थे, दूसरी तरफ उन्हें बड़ा झटका लग गया। आसिम वकार टीवी डिबेट में अक्सर नजर दिखते हैं,  AIMIM के प्रवक्ता के तौर पर लोकप्रिय भी थे। उन्होंने आरोप लगाया है कि AIMIM बीजेपी की बी-टीम बनकर काम कर रही है।

आसिम वकार कह रहे हैं कि वह सोचकर जुड़े थे कि AIMIM सेक्युलर पार्टी है और बीजेपी के खिलाफ लड़ रही है, लेकिन बाद में लगा कि पार्टी बीजेपी से ज्यादा अपने राजनीतिक विरोधियों से लड़ रही है। उनका मानना है कि कांग्रेस लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ रही है। जो कांग्रेस के खिलाफ काम करता है, वह असल में बीजेपी की मदद करता है। आसिम वकार, अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही समाजवादी पार्टी से की थी। 20 साल समाजवादी पार्टी के साथ रहे, फिर AIMIM और अब कांग्रेस। यूपी कांग्रेस के लिए यह बड़ा हासिल माना जा रहा है। 

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यूपी में अल्पसंख्यक वोटों का गुणा गणित, कितना मजबूत है?

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, दोनों पार्टियां, अल्पसंख्यकों के प्रति सहानुभूति रखने वाली पार्टियां रही हैं। 2011 की जनगणना के आधार पर विश्लेषण करें तो यूपी में 143 सीटें ऐसी हैं,जहां मुस्लिम मतदाता चुनाव प्रभावित करने की स्थिति में है राज्य में मुस्लिम आबादी 19 फीसदी से ज्यादा है लेकिन 70 से ज्यादा ऐसी सीटें हैं, जहां मुस्लिम मतदाता मजबूत स्थिति में हैं। 

रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बिजनौर, सहारनपुर, नगीना, मुजफ्फरनगर और कैराना जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत के पार है। रामपुर में 50 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं, मुरादाबाद में 50 फीसदी से ज्यादा और बिजनौर में 43 फीसदी से ज्यादा हैं। मुजफ्फर नगर, अमरोहा जैसे इलाकों में भी 40 फीसीदी आबादी मुस्लिम है। 

समाजवादी पार्टी के की एक प्रवक्ता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती और सिद्धार्थनगर में भी मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक है। आसिम वकार, अल्पसंख्यक राजनीति ही करते आए हैं, इसलिए मु्स्लिमों के लोकप्रिय चेहरे हैं। अब टिकट न देकर कांग्रेस उन्हें नाराज नहीं करना चाहेगी। अगर समाजवादी पार्टी उन्हें इस सीट से उतारने के लिए तैयार हुई तो 'शाह' परिवार को संतोष करना पड़ेगा।