बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है लेकिन नामांकन के पहले दिन राजनीतिक दलों की ओर से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरा। यह सन्नाटा सामान्य नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में उम्मीदवारों के चयन को लेकर गहन मंथन चल रहा है। कहीं सहयोगी दलों के बीच हिस्सेदारी का सवाल है तो कहीं परिवार और संगठन के बीच संतुलन साधने की चुनौती। 18 जून को होने वाले चुनाव से पहले बिहार की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा उम्मीदवारों की नहीं, बल्कि उम्मीदवार तय करने की जद्दोजहद की हो रही है।
विधान परिषद् की कुल 10 सीटों में से नौ सीटें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के खाते में जाने की संभावना है। इनमें से एक सीट उपचुनाव की है, जो मुख्यमंत्री के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई थी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री के पुत्र निशांत कुमार और राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश का विधान परिषद् पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है। इन दो नामों के बाद बची हुई सीटों पर दावेदारों की लंबी कतार है।
यह भी पढ़ें: विधान परिषद चुनाव में सभी सीटें जीतने की तैयारी, BJP में आने वाले हैं दो MLC?
सबकी है अपनी-अपनी चाहत
जनता दल (यूनाइटेड) के भीतर राजीव कुमार सिंह, ललन मंडल और गुलाम रसूल बलियावी जैसे नेताओं के नाम चर्चा में हैं। वहीं, बीजेपी खेमे में संजय मयूख, अमृता भूषण, प्रेम रंजन पटेल, सिद्धार्थ शंभू और अमरनाथ गामी जैसे नामों पर विचार चल रहा है लेकिन मामला सिर्फ जेडीयू और बीजेपी तक सीमित नहीं है। सहयोगी दल भी अपने राजनीतिक योगदान के अनुपात में हिस्सेदारी चाहते हैं।
चर्चा है कि चिराग पासवान और जीतनराम मांझी भी अपनी-अपनी पार्टी के प्रतिनिधियों को परिषद भेजने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) से सीमांत मृणाल का नाम भी राजनीतिक गलियारों में तेजी से उभरा है। यही वजह है कि एनडीए सार्वजनिक तौर पर भले ही एकजुटता का दावा कर रहा हो लेकिन सीटों के अंतिम बंटवारे पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
यह भी पढ़ें: UP के पंचायत चुनाव में होगी धनंजय सिंह और बृजेश सिंह की टक्कर? समझिए मामला
आरजेडी में एक सीट, दावेदार कई
दूसरी तरफ महागठबंधन के हिस्से में आने वाली एकमात्र सीट ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। सबसे ज्यादा चर्चा तेज प्रताप यादव के नाम को लेकर है। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक परिवार का एक वर्ग उन्हें विधान परिषद् भेजने के पक्ष में है लेकिन पार्टी नेतृत्व संगठनात्मक प्राथमिकताओं को भी नजर अंदाज नहीं करना चाहता। सूत्र बताते हैं कि पार्टी के भीतर यह विचार भी है कि चुनावी वर्ष में संगठन और सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता दी जाए। ऐसे में पूर्व एमएलसी सुनील सिंह का नाम भी गंभीरता से लिया जा रहा है। राजपूत समुदाय से आने वाले सुनील सिंह लंबे समय से पार्टी से जुड़े रहे हैं और नेतृत्व के भरोसेमंद माने जाते हैं।
यानी आरजेडी के सामने सवाल सिर्फ उम्मीदवार चुनने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि पार्टी परिवार को प्राथमिकता दे या राजनीतिक संदेश को।
आठ दिन का समय, बढ़ता सस्पेंस
नामांकन की अंतिम तिथि 8 जून है। चुनाव 18 जून को होगा और उसी दिन परिणाम भी घोषित कर दिए जाएंगे लेकिन उम्मीदवारों की घोषणा में हो रही देरी ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है। विपक्ष एनडीए में सीटों को लेकर खींचतान का आरोप लगा रहा है जबकि सत्ता पक्ष का दावा है कि महागठबंधन अपनी एक सीट पर भी सहमति नहीं बना पा रहा है।
यह भी पढ़ें: 'नीतीश, मांझी और नितिन नवीन के पास कैसे है घर?' RJD ने सम्राट चौधरी से पूछे सवाल
असल लड़ाई चुनाव की नहीं, संदेश की है
विधान परिषद् चुनाव में जीत-हार लगभग तय मानी जा रही है क्योंकि संख्या बल का गणित स्पष्ट है। इसलिए इस बार असली लड़ाई वोटों की नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश की है। एनडीए के लिए चुनौती सहयोगियों को संतुष्ट रखते हुए संतुलन बनाने की है जबकि आरजेडी के लिए परीक्षा यह है कि वह परिवार, संगठन और सामाजिक समीकरणों के बीच किसे प्राथमिकता देती है। उम्मीदवारों की सूची सामने आते ही यह साफ हो जाएगा कि बिहार की दोनों बड़ी राजनीतिक धुरियां आगामी विधानसभा चुनाव से पहले किस सामाजिक और राजनीतिक रणनीति पर आगे बढ़ना चाहती हैं।
