जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी के घर में घुसकर बांकीपुर उपचुनाव बड़े वोटों के मार्जिन से जीत लिया है। प्रशांत किशोर ने बीजेपी को हराकर भगवा पार्टी को झटका दो दिया ही साथ ही 30 सालों में पहली बार बीजेपी यहां से हारी है। यहां से उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 वोटों के मार्जिन से हराया। यह बीजेपी की पारंपरिक सीट रही है, जहां से खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पांच बार विधायक रह चुके हैं।

 

प्रशांत किशोर ने बीजेपी का विजयी रथ रोकते हुए कुल 64,151 वोट पाए। वहीं, बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार को महज 44,827 वोट ही हासिल हो सके। बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी खिसककर तीसरे पायदान पर चली गई और उसके उम्मीदवार को 14,085 वोट मिले। प्रशांत किशोर को मिली यह जीत कोई मामूली जीत नहीं है, बल्कि यह जीत उनके लिए किसी ऑक्सीजन से कम नहीं है।

 

विधानसभा में बुरी हार मिली

 

नौ महीने पहले हुए बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज बुरी तरह से हार गई थी। पार्टी ने 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे लेकिन 236 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी। हालांकि, अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में जन सुराज को शून्य सीट भले ही मिली लेकिन उसे 3.34 फीसदी वोट मिले थे। 

 

 

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सियासी मैदान में ही डटे रहे PK

 

विधानसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार के बावजूद भी प्रशांत किशोर बिहार के सियासी मैदान में ही डटे रहे। उन्होंने राज्य की जनता को संदेश दिया कि वह भले ही चुनाव हार गए हों, मगर वह बिहार नहीं छोड़ेंगे। अपने हौसले और उम्मीद के साथ वह बिहार में हर मोर्चे पर टिके रहे।

 

 

अब शुरू होगी असली पारी

 

यह जीत प्रशांत किशोर के लिए एक ऐसी जीत है, जहां से अब उनकी असली पारी शुरू होगी। प्रशांत किशोर की जीत बिहार की सियायस में टर्निग प्वाइंट साबित हो सकती है। क्योंकि अभी तक उन्होंने देशभर में नेताओं को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनने में मदद की थी लेकिन अब वह खुद को बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होते देखना चाहते हैं। 

 

प्रशांत किशोर की जीत से क्या बदलेगा?

 

प्रशांत किशोर की इस जीत से बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। दरअसल, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रशांत नीतीश कुमार के साथ चले गए। 2015 में उन्होंने बिहार में नीतीश की वापसी कराई। इसके बाद उन्होंने ममता बनर्जी , जगन मोहन रेड्डी और एमके स्टालिन के लिए काम किया और उन्हें जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह जो स्ट्रेटजी और मीडिया मैंनेजमेंट दूसरों के लिए किया करते थे अब वही काम खुद के लिए करेंगे। खुद के लिए प्रशांत किशोर का अपना ही अनुभव काम आएगा।

 

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प्रशांत किशोर बिहार में पारंपरिक नेताओं के बीच में प्रखर आवाज बनकर उभरे हैं। वह बिहार की जातिगत राजनीति से खुद को दूर रखकर रोजगार, शिक्षा और विकास की बात करते हैं। वह नए चेहरे हैं इसलिए अब विधायक बनने के बाद वह जो भी बात बोलेंगे लोग उसे सुनेंगे। 

 

 

विधानसभा में भी बदलेगी स्थिति

 

बिहार विधानसभा में अभी दो सबसे बड़े चेहरे हैं। वह चेहरे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव हैं। जब ये दोनों बोलते हैं तो मीडिया में सुर्खियां बनती हैं। मगर, अब प्रशांत किशोर के विधानसभा पहुंचने से यह मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा क्योंकि प्रशांत किशोर भी जब बोलते हैं तो मीडिया में सुर्खियां बनती हैं। ऐसे में कभी किसी सरकार का हिस्सा नहीं रहे प्रशांत एक साथ में बीजेपी-जेडीयू और आरजेडी को एक साथ घेर सकते हैं।

 

प्रशांत किशोर के लिए यह जीत किसी ऑक्सीजन की तरह काम करेगी। उन्हें वह मंच मिल चुका है, जिसका किसी भी नेता को इंतजार रहता है। विधानसभा में बोलते हुए वह जितनी सुर्खियां बटोरेंगे, वह बीजेपी और तेजस्वी यादव के लिए खतरा बनती जाएगी। विधायकी का फायदा उठाकर प्रशांत किशोर अपने विरोधी दलों के खिलाफ माहौल बनाकर खुद को स्थापित कर सकते हैं। उनके लिए अब बिहार खुला मैदान है, जो बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी के लिए चुनौती पेश करेगा।