उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी (SP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच माना जा रहा है। जहां इन दोनों को एक-दूसरे का मुकाबला करना है, वहीं दोनों के साथ कुछ सहयोगी दल भी हैं जिन्हें समायोजित करना माथापच्ची वाला साबित हो रहा है। एक तरफ सपा और कांग्रेस में खींचतान हो रही है। दूसरी तरफ, बीजेपी की चिंताएं इस बार और बढ़ गई हैं। पिछले चुनाव की तुलना में बीजेपी के साथ दो और गठबंधन सहयोगी आ गए हैं। इसका असर यह हो रहा है कि ये गठबंधन सहयोगी बीजेपी पर दबाव बना रहे हैं। एक तरफ यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री लगातार अपनी ही सरकार को घेर रहे हैं। दूसरी ओर अनुप्रिया पटेल ने भी अब अपनी दावेदारी ज्यादा सीटों पर कर दी है। ओम प्रकाश राजभर और जयंत चौधरी भी लगातार शक्ति प्रदर्शन में जुटे हुए हैं।

 

2022 में बीजेपी के साथ अनुप्रिया पटेल की अगुवाई वाला अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी का गठंबधन था। तब बीजेपी ने 376 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 255 पर उसे जीत मिली थी। अपना दल (एस) ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 12 सीटों पर जीत हासिल की थी। निषाद पार्टी ने 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 6 पर उसे जीत मिली थी। इस तरह बीजेपी ने 403 सीटों का बंटवारा किया था।

 

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तब सपा ने 347 सीटों पर अपने उम्मीदवार थे और उसे 111 पर जीत मिली थी। तब सपा के साथ रहे राष्ट्रीय लोकदल ने कुल 33 उम्मीदवार उतारे थे और 8 पर उसे जीत मिली थी। उस चुनाव में सपा के साथ रही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) ने 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और 6 विधायक जीते।

क्या चाह रहे BJP के सहयोगी?

संजय निषाद योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री हैं। इसके बावजूद वह एक बार तो अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ चुके हैं। वह कई बार यह भी कह चुके हैं कि अगर बीजेपी वादे नहीं निभाएगी तो वह दूसरे दरवाजे देखेंगे। भले ही वह इनकार कर रहे हों लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि सबसे ज्यादा बेचैन संजय निषाद ही हैं। हाल ही में 21 अक्तूबर को उन्होंने दिल्ली के तालकटोर स्टेडियम में उन्होंने एक बड़ा कार्यक्रम किया। इस कार्यक्रम में उन्होंने दो टूक कह दिया कि अगर बीजेपी मछुआरों के आरक्षण को लेकर जल्द फैसला नहीं लेती है तो वह दूसरा दरवाजा देखेंगे।

 

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कहा जा रहा है कि यह ज्यादा सीटें लेने के लिए दबाव बनाने की कोशिश हैं। हालांकि, इससे बीजेपी फंसी हुई दिख रही है। अगर वह आरक्षण का मुद्दा ऐसे समय पर लाती है तब भी चुनौती बढ़ेगी। अगर वह संजय निषाद को मनाने के लिए कुछ सीटें और देती है तो बाकी सहयोगियों का दावा भी बढ़ जाएगा। संजय निषाद पहले भी कहते रहे हैं कि वह किसी की जीती हुई सीट नहीं चाहते बल्कि हारी हुई सीट ही चाहते हैं।

अनुप्रिया पटेल ने शुरू किया अभियान

अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में मंत्री हैं लेकिन वह अपनी पार्टी की इकलौती सांसद हैं। 2022 में उनकी पार्टी को 17 सीटें मिली थीं और 12 पर जीत मिली यानी स्ट्राइक रेट काफी अच्छा रहा।  2017 में अपना दल (S) ने 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 9 पर जीत हासिल की थी। 12 विधायकों के साथ अपना दल (S) प्रदेश की विधानसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। कहा जा रहा है कि हर चुनाव में अपने अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए अपना दल (S) अब 25 से 30 सीटें मांगने की तैयारी में है। यहां भी बीजेपी फंसती दिख रही है। 

 

इसी तरह SBSP और RLD ने भी ज्यादा सीटों की दावेदारी करने के संकेत दिए हैं। इस स्थिति में बीजेपी पर अपने सभी गठबंधन सहयोगियों को संतुष्ट करने और अपनी सीटें बचाए रखने की चुनौती है। बीजेपी के पास 255 मौजूदा विधायक हैं। चर्चा है कि कई विधायकों के टिकट कटने तय हैं। इस स्थिति में बीजेपी के लिए स्थिति और भयावह हो सकती है।  

 

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2027 में क्या बदल जाएगा?

2022 में RLD और SBSP सपा के साथ थे लेकिन अब इन दोनों ने पाला बदल लिया है और बीजेपी के साथ आ गए हैं। RLD ने पिछली बार 33 और SBSP ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा था। अब इन दोनों दलों ने कम से कम इतनी सीटें मिलने की उम्मीद लगा रखी हैं। इन दोनों दलों ने 14 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी कम से कम इन 14 सीटों पर तो ये दल अपना दावा नहीं छोड़ने वाले हैं। इसके अलावा, सपा के भी कुछ विधायक पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हो गए हैं। अब वे सीटें भी बीजेपी के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। 

 

साथ ही, बीजेपी अभी राजा भैया के जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के साथ भी गठबंधन की संभावनाएं देख रही है। इस कवायद का असर यह होना है कि सीटों का बंटवारा 2022 वाले फार्मूले पर तो नहीं हो पाएगा। पश्चिम में RLD और पूर्व में SBSP की दावेदारी का असर यह होगा कि बीजेपी को ही अपने खाते की सीटों में से बंटवारा होगा। अगर ऐसा होता है तो पिछली बार 376 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी कुछ कम सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस स्थिति में अगर उसकी जीत वाली सीटों की संख्या 203 के नीचे आई और NDA चुनाव जीत भी गया तो उसकी सरकार गठबंधन सहयोगियों के दबाव में आ जाएगी।